आजकल एक प्रवृति तेजी से साथ बढ़ती देखने को मिल रही है कि हम भारतीय फेसबुक वाला फादर्स डे, मदर्स डे, वेलेन्टाइन डे और कौन-कौन सा डे मना रहे है। साथ ही भारत में वृद्धाश्रमों की तादाद भी तेजी से बढ़ रही है तो तीन वेलन्टाइन के बाद तलाक भी देखने को मिल रहा है। कई जोड़े तो एक वेलेन्टाइन के बाद ही दूसरा आईटम खोज लेते है। आखिर ये कौन से टाइप वाला प्रेम है? बड़ा सवाल है आज की उद्यात और इनोवेशन पसंद युवा पीढ़ी के सामने। उसी तरह इन डेज पर मां-बाप के जुमले पढ़ने वाले भी बढ़ रहे है बड़ी तेजी से पर न तो इनके लिए उनके सपनो का महत्व है, न आदर्शो का और न इच्छाओं का। हमारी संस्कृति में आदर्श पुत्र के बारे में गोस्वामी तुलसीदास लिखते है कि प्रातः काल उठके रघुनाथा, मात-पिता गुरू नावहि माथा। वहीं शाश्वत प्रेम के बहुतेरे उदाहरण है क्योकि भारतीय से ज्यादा प्रेमी कोई नहीं होता। हम प्रेम की संस्कृति के लोग है। वहीं हमने तमाम ऐसे नवशावकों को भी देखा है जिनके लिए मां-बाप का महत्व एटीएम मशीन से ज्यादा नहीं। परंतु यह सांस्कृतिक क्षरण आखिर क्यो? एक बड़ा सवाल है कि भविष्य का भारत भारतीय आत्मा के साथ रहेगा या पाश्चात्य कुसंस्कृति का आलिंगन करेगा।