आजकल एक प्रवृति तेजी से साथ बढ़ती देखने को मिल रही है कि हम भारतीय फेसबुक वाला फादर्स डे, मदर्स डे, वेलेन्टाइन डे और कौन-कौन सा डे मना रहे है। साथ ही भारत में वृद्धाश्रमों की तादाद भी तेजी से बढ़ रही है तो तीन वेलन्टाइन के बाद तलाक भी देखने को मिल रहा है। कई जोड़े तो एक वेलेन्टाइन के बाद ही दूसरा आईटम खोज लेते है। आखिर ये कौन से टाइप वाला प्रेम है? बड़ा सवाल है आज की उद्यात और इनोवेशन पसंद युवा पीढ़ी के सामने। उसी तरह इन डेज पर मां-बाप के जुमले पढ़ने वाले भी बढ़ रहे है बड़ी तेजी से पर न तो इनके लिए उनके सपनो का महत्व है, न आदर्शो का और न इच्छाओं का। हमारी संस्कृति में आदर्श पुत्र के बारे में गोस्वामी तुलसीदास लिखते है कि प्रातः काल उठके रघुनाथा, मात-पिता गुरू नावहि माथा। वहीं शाश्वत प्रेम के बहुतेरे उदाहरण है क्योकि भारतीय से ज्यादा प्रेमी कोई नहीं होता। हम प्रेम की संस्कृति के लोग है। वहीं हमने तमाम ऐसे नवशावकों को भी देखा है जिनके लिए मां-बाप का महत्व एटीएम मशीन से ज्यादा नहीं। परंतु यह सांस्कृतिक क्षरण आखिर क्यो? एक बड़ा सवाल है कि भविष्य का भारत भारतीय आत्मा के साथ रहेगा या पाश्चात्य कुसंस्कृति का आलिंगन करेगा।
Wednesday, 5 July 2017
Saturday, 21 January 2017
डर लगता है......
मुद्दतों बाद लिखी है कोई तराने गजल,
आजकल कलम उठाने में भी डर लगता है।
पयाम नगाहों का देखकर जरा बेसब्र हैं दिल,
आजकल नजर मिलाने में भी डर लगता है।
कोई निकाल न ले कहीं मायने खुद से ही,
अब तो अहसास बताने में भी डर लगता है।
पर कहीं ये अहसास ही बन न जाएं कातिल,
अब तो अहसास छुपाने में भी डर लगता है।
बदल गए हैं मायने कई बातों के आजकल
किसी को कोई बात बताने में भी डर लगता है।
पयाम नगाहों का देखकर जरा बेसब्र हैं दिल,
आजकल नजर मिलाने में भी डर लगता है।
मुद्दतों बाद लिखी है कोई तराने गजल,
आजकल कलम उठाने में भी डर लगता है।
पयाम नगाहों का देखकर जरा बेसब्र हैं दिल,
आजकल नजर मिलाने में भी डर लगता है।
कोई निकाल न ले कहीं मायने खुद से ही,
अब तो अहसास बताने में भी डर लगता है।
पर कहीं ये अहसास ही बन न जाएं कातिल,
अब तो अहसास छुपाने में भी डर लगता है।
बदल गए हैं मायने कई बातों के आजकल
किसी को कोई बात बताने में भी डर लगता है।
पयाम नगाहों का देखकर जरा बेसब्र हैं दिल,
आजकल नजर मिलाने में भी डर लगता है।
Monday, 9 January 2017
कल रात अनायास ही राष्ट्रवादी दल से जुड़े मुझसे कुछ कम राष्ट्रवादी मित्र फोन पर मिल गए और फिर वहीं निरर्थक संवाद लगभग आधे घंटे तक। उनके तर्क पार्टीवादी ज्यादा थे और मेरे राष्ट्रवादी ज्यादा! संवाद के कुछ अंश....
आप विचारधारा से लंबे समय से जुड़े हैं कुछ फेसबुक पर पक्ष में लिखते क्यों नही?
मेरा उत्तर- मैं राष्ट्रवादी हूं, पार्टीवादी, प्रधानमंत्री वादी या सत्तावादी नहीं। जब लगेगा की राष्ट्रहित में यह जरूरी है मैं बोलूंगा परंतु जब आप भी मानते हैं कि अभी जो हो रहा है वह अनुचित तो नहीं परंतु राष्ट्र के हित में नहीं। क्योंकि राष्ट्र की आवश्यकता दूसरी है और उनकी पूर्ति के बगैर इस एक्शन का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। इससे कालाधन तो रूकेगा नहीं परंतु राष्ट्र कई मोर्चे पर बहुत पीछे चला जाएगा।
जबतक घोर असमानता रहेगी यह संभव ही नहीं कि आप किसी को भ्रष्टाचारी बनने से रोक सके...घूस हमारी मानसिक अवस्था बन चुका है जिसके लिए मानसिक परिवर्तन जरूरी है। आप डंडे के जोर से किसी को घूस लेने से नहीं रोक सकते।
एक ओर आप बिग प्लेयर्स के हजारो करोड़ एक मिनिट में माफ कर दे रहे हैं और एक गरीब किसान, एक कामगर, एक छोटे व्यापारी के 50 हजार के कृषि लोन के बदले 01 लाख वसूल रहे हैं...आप उसको बेइ्रमान बनने से कैसे रोक सकते?
एक सामान्य कर्मचारी जिसकी पगार 50 हजार है आप उससे 01 साल में लगभग 50 हजार आयकर और वैट, सेश तथा अन्य वस्तु कर के रूप में 50 हजार वसूल रहे है यानि कुल 01 लाख रूपये। आमदनी का लगभग 18 फीसदी वह कर चुका रहा है। इसके अलावा आवास व्यय, शिक्षा व्यय, स्वास्थ्य व्यय एवं भोजन व्यय के बाद उसके पास कोइ्र जमा-पूंजी नहीं बच पा रही। अगर उसके परिवार में किसी को कोई गंभीर रोग हो जाएं तो इलाज के लिए उसको अपनी पैत्रृक संपत्ति बेचनी पड़ती है। अगर बेटी है तो उसको अच्छे से ब्याहना होता है। और आप उससे इ्र्रमानदारी की अपेक्षा करते हो! क्यो बने इ्र्रमानदार वह? मेरे एक करीबी रिश्तेदार हैं पांच बेटी हो गई थी बेचारे को पुराने दौर में। खुद क्लास 2 के इ्र्रमानदार आफिसर थे पर उच्च शिक्षित बेटियों का ब्याह आफिसर क्या सरकारी चपरासी से भी नहीं कर सके। उनकी ईमानदारी का क्या प्रतिफल? ऐसे तमाम सवाल है। दूसरे को ज्ञान देना आसान है पर जब खुद पे बीतती है तब एहसास होता है। सरकारी अधिकारियों से लेकर पांचवी पास नेताओं के बच्चे तो अफसर से ब्याहे जा रहे है न। पर अगर कोई ईमान वाला अफसर है तो अपने बच्चे को कभी अफसर से ब्याह नहीं पाता। तो आम आदमी क्या ईमानदारी को लेकर चाटे।
आप विचारधारा से लंबे समय से जुड़े हैं कुछ फेसबुक पर पक्ष में लिखते क्यों नही?
मेरा उत्तर- मैं राष्ट्रवादी हूं, पार्टीवादी, प्रधानमंत्री वादी या सत्तावादी नहीं। जब लगेगा की राष्ट्रहित में यह जरूरी है मैं बोलूंगा परंतु जब आप भी मानते हैं कि अभी जो हो रहा है वह अनुचित तो नहीं परंतु राष्ट्र के हित में नहीं। क्योंकि राष्ट्र की आवश्यकता दूसरी है और उनकी पूर्ति के बगैर इस एक्शन का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। इससे कालाधन तो रूकेगा नहीं परंतु राष्ट्र कई मोर्चे पर बहुत पीछे चला जाएगा।
जबतक घोर असमानता रहेगी यह संभव ही नहीं कि आप किसी को भ्रष्टाचारी बनने से रोक सके...घूस हमारी मानसिक अवस्था बन चुका है जिसके लिए मानसिक परिवर्तन जरूरी है। आप डंडे के जोर से किसी को घूस लेने से नहीं रोक सकते।
एक ओर आप बिग प्लेयर्स के हजारो करोड़ एक मिनिट में माफ कर दे रहे हैं और एक गरीब किसान, एक कामगर, एक छोटे व्यापारी के 50 हजार के कृषि लोन के बदले 01 लाख वसूल रहे हैं...आप उसको बेइ्रमान बनने से कैसे रोक सकते?
एक सामान्य कर्मचारी जिसकी पगार 50 हजार है आप उससे 01 साल में लगभग 50 हजार आयकर और वैट, सेश तथा अन्य वस्तु कर के रूप में 50 हजार वसूल रहे है यानि कुल 01 लाख रूपये। आमदनी का लगभग 18 फीसदी वह कर चुका रहा है। इसके अलावा आवास व्यय, शिक्षा व्यय, स्वास्थ्य व्यय एवं भोजन व्यय के बाद उसके पास कोइ्र जमा-पूंजी नहीं बच पा रही। अगर उसके परिवार में किसी को कोई गंभीर रोग हो जाएं तो इलाज के लिए उसको अपनी पैत्रृक संपत्ति बेचनी पड़ती है। अगर बेटी है तो उसको अच्छे से ब्याहना होता है। और आप उससे इ्र्रमानदारी की अपेक्षा करते हो! क्यो बने इ्र्रमानदार वह? मेरे एक करीबी रिश्तेदार हैं पांच बेटी हो गई थी बेचारे को पुराने दौर में। खुद क्लास 2 के इ्र्रमानदार आफिसर थे पर उच्च शिक्षित बेटियों का ब्याह आफिसर क्या सरकारी चपरासी से भी नहीं कर सके। उनकी ईमानदारी का क्या प्रतिफल? ऐसे तमाम सवाल है। दूसरे को ज्ञान देना आसान है पर जब खुद पे बीतती है तब एहसास होता है। सरकारी अधिकारियों से लेकर पांचवी पास नेताओं के बच्चे तो अफसर से ब्याहे जा रहे है न। पर अगर कोई ईमान वाला अफसर है तो अपने बच्चे को कभी अफसर से ब्याह नहीं पाता। तो आम आदमी क्या ईमानदारी को लेकर चाटे।
भारत कभी विश्वगुरू था, बौद्धिकता एवं ज्ञान की पावन स्थली था, ऐसा नहीं कि आज नहीं है।परंतु...............हाल में देश में बड़े स्तर पर हुए कई फैसले ऐसा आभास कराते हैं कि हम एक बौद्धिक खोखलेपन के दौर से गुजर रहे हैं। आज देश का थिंकटैंक, टैंक ज्यादा है। ये थिंकलेस टाइप वाला थिंकटैंक है। न्यायिक फैसले सदैव सम्माननीय रहे हैं परंतु एक बात समझ नहीं आती कि क्या कोई जिस्म 2 या 3,4,5 या ऐसे अनेको रिलीज होने वाली फिल्में राष्ट्रगान के बाद देखेगा! सुखद् आश्चर्य! क्या आपकी नजर में ये उचित होगा। मुझे तो नहीं लगता कि मैं राष्ट्रगान के बाद ऐसी फिल्म देखना पसंद करूं और ज्यादातर फिल्में दिखती तो ऐसी ही हैं न। दूसरा प्लास्टिक मनी, उस देश में जहां 66 फीसदी आबादी गांव में रहती है और मात्र लगभग 25 फीसदी लोग शिक्षित हैं। कई राज्यों में 25 किमी के दायरे में एटीएम क्या ग्रामीण बैंक तक नहीं। हम नकलची तो पुराने जमाने से रहे हंै पर इतने नासमझ भी होंगे कभी सोचा नहीं था। किसी गेट्स ने कह दिया कि भारत को प्लास्टिक मनी की ओर बढ़ना चाहिए और हम लगे कौवे का पीछा करने, कान पर गौर ही नहीं किया। लगता था कि भाजपा के कुछ नेता जमीनी हैं परंतु फैसले उनके भी कांग्रेस की ही तरह से आसमानी ही है। और मीडिया तो मैजिक मल्टीप्लायर हैं ही। ऐसा प्रोजेक्ट किया जा रहा है कि एक खास व्यक्ति तो कभी कोई गलती कर ही नहीं सकता। अरे भाई गलती तो भगवान् राम और कृष्ण से भी हुई थी तो क्या खास व्यक्ति भगवान से भी बड़ा हो गया। लेकिन याद रखना प्रेम अच्छा है परंतु धृतराष्ट्र जी वाला अंधप्रेम अच्छा नहीं होगा। और इतिहास जब तुम्हारी चिंदी-चिंदी उड़ायेगा तो तुम वहीं पुत्र को राष्ट्र समझने वाले ही माने जाओगे। हां, आजकल लिखने में थोड़ा डर लगने लगा है कि कहीं राष्ट्र की एबीसीडी न समझने वाला कोई बेवकूफ भी मुझे राष्ट्रद्रोही न करार दे दे। क्योंकि 13 सदीं के योरोप में स्वर्ग का सर्टिफिकेट चर्च बेच रहा था आज देश प्रेम का सर्टिफिकेट कुछ लोग वह भी FB पर। परंतु यह नहीं भूलना चाहिए कि चर्च नष्ट हो गया। आप असहमत हो सकते हैं परंतु मेरा वादा है कि मैं गलत साबित नहीं होउंगा। इंतजार करिये धीरे-धीरे हर नकाब उतर जाएगा........
मुझे शौक नहीं कि तू सराहे मेरे गजल के तरन्नुम को
ये इक दिल की दास्तां हें यूं ही निकल जाने दे बस
तेरी वजह से ही तो ये सब, अब मुमकिन हुआ है
न जगा मुझको अभी, दिन में ख्वाब सजाने दे बस
मुझे कोई शौक नहीं सनम कि हरदम जीतूं हीं मैं
किसी दिन मुझको खुद से ही तू हार जाने दे बस
आजकल ऐसे भी मेरे जीतने का चल रहा मौसम है
जरा इस बार भी मुझे दिल से आजमाने दे बस
मुझे शौक नहीं कि तू सराहे मेरे गजल के तरन्नुम को
ये इक दिल की दास्तां हें यूं ही निकल जाने दे बस
वो..........
समाया दिल में है एक ख्वाब आशियां की तरह,
अभी भी दिल में है वो मेरे बेवफां की तरह।
मेरा गुनाह मुझे पता था ऐ मेरे दुनियावालों,
वफां मिली भी मुझे तो इक बेवफां की तरह।
अभी भी दिल में है वो मेरे बेवफां की तरह।
यूं तो कहा था सभी ने कि है ये रोग बुरा,
बच के निकलना इस से इक नादिरा की तरह।
इश्क न करना कभी तुम किसी फरेबी नजर से,
वो अब भी चाहता है मुझको बेवफां की तरह।
यूं तो कहता है कि है वो भी मजबूर बड़ा,
मैं मिला भी उसे बस इक इम्तिहां की तरह।
वो चाहकर भी तो अब कदम बढ़ा नहीं सकता,
औं वो अब भी चाहता है मुझे बेवफां की तरह।
वफां मिली भी मुझे तो इक बेवफां की तरह।
सफेदी को जरा आने तो दो.......!
जवानी चार दिन की चांदनी है देखते हैं
जो एक दिन ढ़ल जाएगी तो देखते हैं
अभी तो बड़ा गुमान है नाजो-अदा पर
जब बूढ़ी हड्डियां चरमरायेंगी तो देखते हैं।
अभी बालों में काली है तो बदली लोग कहेंगे
सफेदी को जरा आने तो दो, फिर देखते हैं
अभी तो नर्म औं कमसीन, चमड़ों में रौनक है
जरा सिलवट तो आने दो फिर देखते हैं।
अभी तो हर तरफ छायी है सावन की बहार
जरा पतझड़ को आने दो, तो फिर देखते हैं
अभी गूंजती शहनाईयों के ख्वाबगाह में हो
जरा मातम तो आने दो फिर देखते हैं।
अभी तो जश्न में हो तुम्हे ख्याल कहां
कोई सवाल उठने दो, तो फिर देखते हैं
कर वजूद पे भरोसा पर कभी गरूर नहीं
जरा नीचे तो गिरने दो, तो फिर देखते हैं।
जो एक दिन ढ़ल जाएगी तो देखते हैं
अभी तो बड़ा गुमान है नाजो-अदा पर
जब बूढ़ी हड्डियां चरमरायेंगी तो देखते हैं।
अभी बालों में काली है तो बदली लोग कहेंगे
सफेदी को जरा आने तो दो, फिर देखते हैं
अभी तो नर्म औं कमसीन, चमड़ों में रौनक है
जरा सिलवट तो आने दो फिर देखते हैं।
अभी तो हर तरफ छायी है सावन की बहार
जरा पतझड़ को आने दो, तो फिर देखते हैं
अभी गूंजती शहनाईयों के ख्वाबगाह में हो
जरा मातम तो आने दो फिर देखते हैं।
अभी तो जश्न में हो तुम्हे ख्याल कहां
कोई सवाल उठने दो, तो फिर देखते हैं
कर वजूद पे भरोसा पर कभी गरूर नहीं
जरा नीचे तो गिरने दो, तो फिर देखते हैं।
जख्म पे मरहम लगा के तड़प कम न करो
हरा रहने दो इन जख्मों को अब गम न करो
कुरेंदो इनको हरदम, खूं के रिसने तलक
दर्द को दर्द ही रहने दो, इसे कम न करो
जख्म पे मरहम लगा के.........................
यूं तो काफिर तिरे अंदर औं मिरे अंदर भी छुपा
काफिरों पे कभी भूलकर भी रहम न करो
नश्तर छुपाये फिरते हैं लोग बाजार में
मासूम चेहरे को देखकर अब भरम न करो
दर्द को दर्द ही रहने दो .........................
दर्द का एहसास नफरत को हवा देगा
बढ़ने दो, एहसास को कभी कम न करो
बनाओ ताकत इन जख्मों को कुरेद कर
इनपे मरहम लगा के तड़प कम न करो
हरा रहने दो जख्मों को अब गम न करो
दर्द को दर्द ही रहने दो........................
एक मित्र की प्रेरणा से........
दूर बैठकर क्या जमाने का कहर देखिएगा
कभी आईए आप, तब हमारा शहर देखिएगा
आंखों में लिहाज, वो रवायते, वो रिवाज
जिंदादिली, वो अपनेपन भरी नजर देखिएगा
कभी आईए आप, तब हमारा शहर देखिएगा
यूं तो हर जमीं में कोई न कोई कमी हैं
गिनाईए आप फिर हमारा असर देखिएगा
हमने दिया है जवाब नई इबारत लिख के
इस बार भी चलिए आप कुछ नया देखिएगा
कभी आईए आप, तब हमारा शहर देखिएगा
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