Sunday, 18 February 2018

मुद्दे की राजनीति से दूर होते हम

मुद्दे की राजनीति से दूर होते हम
मुद्दों पर विरोध और समर्थन आज भारतीय राजनीति के लिए ईद के चांद की तरह हो गया है। समाज से लेकर सोषल मीडिया तक में अतार्किक तरीके से मोदी विरोध और भक्ति की हवा चल रही है। विष्व को धर्म से लेकर ज्ञान के विविध आयामों से परिचित कराने वाले भारत में इस तरह के अबौद्धिकता अपेक्षित नहीं थे परंतु.... नीरव मोदी के प्रकरण में प्रधानमंत्री को आरोपित करना उसी तरह से ज्ञानषून्यता का परिचायक है। यह संभव है कि निष्चित तौर पर नीरव मोदी को सत्ता से सहयोग मिला परंतु हर बात के लिए प्रधानमंत्री पर तोहमत लगाकर हम अपने महानतम् लोकतंत्र को दुनिया के सामने षर्मसार करते है। ऐसे अबौद्धिक प्रजातियों को या तो प्रधानमंत्री पद का अर्थ नहीं पता या फिर अपने राजनीतिक आकाओं के सामने वाहवाही बढ़ोरने की जुगत है। भारतीय राजनीति में सोषल मीडिया के माध्यम से इस ओछेपन को प्रारंभ करने का पूरा श्रेय माननीय अरविंद केजरीवाल को जाता है जिन्होंने अपने छिछले और टपोरी किस्म के आरोपों से एक जमाने में भूचाल ला दिया था और फिर भाजपा-कांग्रेस के सोषल मीडिया सेल ने काउंटर प्रोपेगांडा के तहत इस टपोरीपन का जवाब देना प्रारंभ कर दिया। 2010-11 का यह दौर राजनीतिक ओछेपन की षुरूआत का दौर था। और हालात यह है कि आज को अदना सा मूर्ख अपने सोषल मीडिया एकाउंट से प्रधानमंत्री और माननीय राष्ट्रपति तक पर ओछी टिप्पणी कर देता है या कर सकता है। सार्थक विमर्ष किसी लोकतंत्र की आत्मा होती है। ऐसे में वर्तमान परिदृष्य में देष की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा को इस बारे में कारगर प्रयास करने चाहिए।

Saturday, 17 February 2018

भारत के प्रेस कानून

भारत में प्रेस कानूनों का इतिहास बहुत पुराना है। जिसकी जड़े उपनिवेशिक काल में तलाशी जा सकती है। विदेशी सरकार के विरूद्ध लोगों की घ्रणा और प्रतिरोध की अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध के लिए ब्रिटिश सरकार ने कुछ  कानून और अध्यादेश लागू किये थे जिसका उद्देश्य था प्रेस पर सेंसरशिप लागू करना, प्रेस के लिए लाईसेंस को अनिवार्य बनाना और प्रेस की स्वतंत्रता का गला घोंटना। पहला नियामक प्रयास सन् 1799 में किया गया। और भारत में पहला प्रेस अधिनियम लागू हुआ। इस अधिनियम के अंतर्गत समाचार पत्रों को यह निर्देशित किया गया कि वे अपने मुद्रक, प्रकाशक और संपादक का नाम और पता अपने संस्करण में मुद्रित करे। हांलाकि इस अधिनियम को सन् 1813 में समाप्त कर दिया। सन् 1857 में सरकार ने एक कानून पारित किया जिसे गेगिंग एक्ट के रूप में जाना जाता है। इस कानून के अनुसार प्रिटिंग पे्रस को चलाने के लिए अनिवार्य रूप से लायसेंस लेने की व्यवस्था को लागू किया गया। इससे सरकार को यह शक्ति प्राप्त हो गई कि वह किसी भी समाचार पत्र के प्रकासन व प्रसार पर प्रेतिषेध लगा सके। निषेध का यह नियम पुस्तकों दूसरी मुद्रित सामग्रियों पर भी था। इसके द्वारा वे ऐसे समाचारों और कथनों के प्रकाशन और प्रसार पर प्रतिबंध लगा दिया गया जिससे घृण, विरोध या विद्वेश के फैंलने की आशंका थी या जिससे सरकार की अवमानना होती थी और सरकार के प्रति असंतोष तथा गैर कानूनी विरोध उत्पन्न होता था या फिर जो सरकार के गैर कानूनी शासन को कमजोर करती थी। हांलाकि इस कानून की भी समाप्ति जून 1858 में हो गई। दूसरा महत्वपूर्ण अधिनियम था सन् 1878 में पारित वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट 1 लार्ड रिटर्न द्वारा पारित कराया गया। यह अधिनियम भाषायी पे्रस की स्वतंत्रता पर ब्रिटिश सरकार का सबसे बड़ा आक्रमण था। इस कानून के अंतर्गत वैसे किसी लेखन के प्रकाशन पर सरकार प्रतिबंध लगा सकती थी जो विद्रोह को उकसाने वाला प्रतीत होता है और वैसे प्रकाशकों और मुद्रकों को दण्डात्मक प्रतिबंध की भी व्यवस्था थी जो इस नियम का पालन नहीं करेंगे, इस कानून के अंतर्गत कोई भी जिला दण्डाधिकारी और पुलिस कमिश्नर किसी भी समाचार पत्र की प्रकाशन या मुद्रक से सुरक्षा राशि की मांग कर सकता था, इस सुरक्षा राशि को जप्त कर सकता था और किसी भी मुद्रित सामग्री को जो संदेहास्पद हो को जप्त कर सकता था और इसके खिलाफ संबंधित पत्र कानून का सहारा नहीं ले सकता था वर्नाक्यूलर पेे्रस एक्ट का दमन तब तक चलता रहा, जब तक 1880 में लार्ड रिपन की वायसराय पद पर नियुक्ति ना हो गई। अपना कार्यकाल ग्रहण करते ही लार्ड रिपन ने जो सबसे पहला काम किया वह था अलोकप्रिय कानून को समाप्त करना। रिपन ने कई उदारवादी सुधारों को भी लागू किया और ऐसा करके उसने भारतीयों की सद्भावना अर्जित की।

सन् 1885 में इण्डियन नेशनल कंाग्रेस की स्थापना से भारतीय प्रेस की स्थापना में मील के पत्थर का काम किया। कांगेे्रस के जन्म ने समाचार पत्रों की राष्ट्रीय भावना की अभिव्यक्ति की मजबूती के साथ और पूरजोर तरीके से करने का अवसर प्रदान किया। ब्रिटिश शासन के खिलाफ राष्ट्रवादों आंदोलनों के बढ़ते प्रभाव व उसमें प्रेस की सहयोगी भूमिका ने ब्रिटिश शासन के कान खड़े कर दिये और इसका प्रतिफल इण्डियन प्रेस एक्ट 1910 के रूप में देखने को मिला। यह कानून जन माध्यमों पर सरकार के नियत्रंण को  बढ़ाने के उद्देश्य से लागू किया गया था। इस कानून के अंतर्गत पे्रस के मालिकों को सुरक्षा निधि जमा करनी पड़ती थी जो जमा राशि कभी भी जप्त की जा सकती थी। अगर उसने किसी संवेदनशील सामग्री का प्रकाशन किया और उसके खिलाफ अगली कार्यवाही भी की जा सकती थी, जिसमंे प्रेस को जब्त किया जा सकता था अगर उसने ऐसा करना जारी रखा तो इसके तहत कस्टम और डाक अधिकारियों को यह अधिकार मिला कि वह ऐसे किसी भी डाक को रोक सकते थे जिसमें संवेदनशील सामग्री होने की संभावना हो। इसके साथ ही पुलिस को जांॅच करने और जप्त की कार्यवाही करने का व्यापक अधिकार मिला। इस कानून की भयावहता का पता इस बात से पता गलता है कि मात्र 1910 से 1914 के बीच सरकार ने 355 केस दर्ज किये।
स्वतंत्रता पूर्व की अवधि में भारतीय प्रेस को इसी तरह की तमाम परेशानियों और दबाओं का लगातार सामना करना पड़ा। समाचार पत्रों और प्रेस से प्रायः ही सुरक्षा राशि या अतिरिक्त सुरक्षा राशि जमा करने को कहा जाता। साथ ही अक्सर उनके द्वारा जमा की गई सुरक्षा राशि को जप्त कर लिया जाता और कई समाचार पत्रों को इस दौरान अपने प्रकाशन बंद करने पड़े। जैसे-जैसे राष्ट्रवादी आंदोलन अनवरत बढ़ता जा रहा था, सरकार और प्रेस के रिश्ते भी धीरे-धीरे खराब होते जा रहे थे।  इसी बीच द्वितीय विश्व युद्ध आरंभ हो गया। इसके परिणाम स्वरूप नियंत्रण के लिए कई नये अध्यादेश और कानून लागू किये गये। साथ ही फ्री सेंसरशिप की व्यवस्था को फिर से लागू किया गया। राष्ट्रवादियों ने इसी दौरान महात्मा गाॅंधी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आंदोलन को फिर से आंरभ कर दिया। जिससे सरकार पर अतिरिक्त दबााव आ गया। जब 1943 में लार्ड बेबेल ने वायसराय के रूप में भारत की कमान संभाली तब यह पूर्णतः स्पष्ट हो गया था कि जल्द ही भारत को स्वतंत्रता प्रदान कर दी जायेगी और इस परिस्थति में किसी भी तरह की दमनात्मक कार्यवाही या उपाय बैकार साबित होंगे। परिणामस्वरूप जैसे ही द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति हुई सत्ता के हस्तांतरण की प्रक्रिया पूरी हो गई और प्रेस पर लगवाये गये अधिकांश नियंत्रण समाप्त हो गये।

कई ऐसे महत्वपूर्ण कानून जो ब्रिटिश व्यवस्था के अंतर्गत लागू किये गये आज भी पूर्णतः  या अंशतः प्रक्रिया में है और  स्वतंत्रता के बाद व्यवस्था के सफल संचालन के लिए कई कानून भी बनाये गये। कई ऐसे महत्वपूर्ण कानून है जिनके बारे में एक पत्रकार को जरूर जानना चाहिये।

1. मानहानिः- द्वितीय प्रेस आयोग द्वारा मानहानि कानून की विवेचना करते हुए कहा गया कि यह दो हितों की कहानी है। ये दो हित है, व्यक्ति की  प्रतिष्ठा एवं सम्मान से जुड़ा हित और समाज में सूचना के स्वतंत्र प्रभाव का हित। अपने समाचारों के संकलन के दौरान कई बार प्रेस और सरकार आमने-सामने आ जाते है साथ ही कभी-कभी व्यक्ति साख और प्रतिष्ठा की रक्षा का अधिकार और स्वतंत्र अभिव्यक्ति तथा स्वतंत्र पेे्रस का अधिकार एक-दूसरे से टकराते है। व्यक्ति की प्रतिष्ठा के संरक्षण का अधिकार मानहानि के इस कानून के दायरे में आता है। मानहानि की इस जटिल अवधारणा  को समझने के लिए सर्वप्रथम हमंे कुछ परिभाषाओं को जानना चाहियेः-
क. लाईबल:- लाईबल लिखित मानहानि को कहा जाता है। ऐसे कथन जो किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा और उसके नाम को धूमिल करते हो और उसके प्रति घृणा या विद्वेश के माध्यम से उसके व्यक्तिगत या व्यवसायिक उद्देश्यों को नुकसान पहुंचाते हो लिखित मानहानि माने जाते है इसलिये किसी भी लेखन से पूर्व यह सावधानी बरतनी चाहिये। कई मामलों में पुलिस अधिकारी किसी व्यक्ति को किसी अलग मामले के तहत हिरासत में लेता है, लेकिन जब साक्ष्यों को जाॅंच की जाती है तो साक्ष्य आरोपों की पुष्टि नहीं करते, इस कारण अधिकतर समाचार पत्रों के संपादक किसी गिरफ्तार व्यक्ति का नाम तभी प्रकाशित करना पसंद करते है जब किसी मामले के तहत आरोप दर्ज किये गये हो। दुर्भाग्य से कई बार डेडलाईन और खबरों की होड में कई समाचार पत्र किसी व्यक्ति का नाम आरोप दर्ज होने से पहले ही प्रकाशित कर देते है। इन परिस्थितियों में किसी नाम को प्रकाशित करने से पहले बहुत अधिक सावधानी बरतने  की आवश्यकता होती है। अगर किसी व्यक्ति को बलात्कार के किसी आरोप में आरोपित किया जाता है और समाचार पत्र उसे बलात्कार के अभियुक्त के रूप में प्रकाशित करता है और बाद मंे उस व्यक्ति पर लगे आरोप छेड़-छाड़ के आरोप साबित होते है तो वह व्यक्ति समाचार पत्र के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर कर सकता है।
ख. स्लेंडरः-यह मौखिक मानहानि है। हांलाकि अगर किसी व्यक्ति के खिलाफ मानहानि कारक कथन प्रसारित किया जाता है तो इसका मुकदमा लिखित मानहानि के अंतर्गत दायर होता है। जबकि तकनीकी रूप से वे कथन लिखित रूप में उपलब्ध नहीं होते है। मौखिक मानहानि के अपेक्षा लिखित मानहानि ज्यादा खतरनाक होती है और इसके बदले गंभीर दण्ड देने का प्रावधान है।
ग. लाईबल पर से:- कुछ शब्द हमेशा ही मानहानि कारक होते है। झूठे लिखित आरोप जैसे किसी व्यक्ति को चोर या जालसाझ और ढोंगी या बहरूपीया लिखना स्वतः लिखित मानहानि की श्रेणी में आता है।
घ. लाईबल पर क्वेडः- कुछ शब्द जो सामान्य रूप से पूरी तरह नासमझी से भरे होते है। किन्हीं दूसरी परिस्थितियों में मानहानि कारक होते है। रिपोर्टिंग में जैसे -यदि  गलती से ही यह लिख दिया जाये कि कल रात्रि के भोजन में श्रीमान् अशोक मांस खाते हुए दिखे थे तो यह तब तक हानिकर नहीं है, परन्तु अगर श्रीमान् अशोक वैश्विक शाकाहरी संगठन के प्रधान है तो यह बहुत ही हानिकर और मानहानि कारक साबित होगा।
मीडिया के खिलाफ लिखित मानहानि मामला चलाने से पहले निम्नांकित पांच बिन्दुओं की पुष्टि करनी होती हैः-
क. क्या कथन विशेष से उस व्यक्ति को कोई हानि या उसकी बदनामी वास्तविकता में हुई है?
ख. क्या किसी भी तरह उस व्यक्ति विशेष की पहंचान को किसी तरिके से उजागर किया गया?
ग. क्या मानहानि कारक किसी कथन से विशेष से प्रकाशित किया गया।
घ. क्या इसमें सत्य में मिडिया की गलती थी या यह जानबूझकर की गई।
ड़. क्या प्रकाशित या  प्रसारित कोई सामग्री झूठी थी ?
हालाकि प्रत्येक गलती जो प्रकाशित की जाती है या हो जाती है मानहानिकारक नहीं होती। गलती से यह लिख देना कि किसी व्यक्ति की मृत्यु हो गई, मानहानिकारक नहीं है। वास्तविक हानि तब होती है जब किसी मानहानिकारक टिप्पणी से भौतिक असुविधा, आय में हानि या किसी कार्य को करने में परेशानियों का सामना करना पड़ता है। लाईबल के अंतर्गत किसी मुकदमें को जीतने के लिए यह प्रमाणित करना होता है कि मीडिया संगठन द्वारा गलती या असावधानी की वजह से ऐसा हुआ।
ड़. लाईबल सूट डिफेंसेसः- लाईबल या लिखित तीन परंपरागत बचाव है- सत्य, विशेषाधिकार और स्वच्छ टिप्पणी या आलोचना। इनमें से प्रथम सत्य है कि, किसी भी लिखित मानहानि का सबसे बेेहतर बचाव का आधार सत्य है। हांलाकि सत्य को जानना अलग बात है और इसे प्रमाणित करना अलग। जो रिपोर्ट किया जाता है उसे सत्य प्रमाणित करना पड़ता है तब मानहानि का मामला नहीं बनता। हांलाकि इस बचाव का प्रयोग कभी-कभार ही किया जाता है क्योंकि किसी कथन की सत्यता को प्रमाणित करना बहुत ही कठिन कार्य है। दूसरा महत्वपूर्ण बचाव विशेषाधिकार है। कुछ विशेष परिस्थितियों में न्यायालय का यह मानना है कि जनता के जानने का अधिकार किसी व्यक्ति के प्रतिष्ठा के संरक्षण के अधिकार से ज्यादा महत्वपूर्ण है। न्यायालयीन प्रक्रियाएॅं गिरफ्तारी वारंट, विधायी प्रकियाएॅं ऐसी परिस्थितियों के अंतर्गत आते है जो विशेषाधिकार की श्रेणी में होते है। अगर एक रिपोर्ट इन घटनाओं की स्वच्छ एवं वास्तविक रिपोर्ट देता है तो किसी कानून के तहत उसे दण्डित नहीं किया जा सकता चाहे प्रकाशित सामग्री में मानहानिकारक कथन क्यों न हो। तीसरा महत्वपूर्ण बचाव है, स्वच्छ टिप्पणी एवं आलोचना। कोई भी व्यक्ति जो सार्वजनिक जीवन व्यतीत करता है उसकी स्वच्छ आलोचना की जा सकती है। इसका अर्थ यह है कि सरकारी अधिकारी और व हर व्यक्ति जो सार्वजनिक जीवन में हो स्वच्छ  आलोचना का पात्र है। हांलाकि यह बचाव केवल विचारों और आलोचनाओं तक ही सीमित होता है न कि तथ्यों की गलत प्रस्तुति तक इस प्रकार आप तभी तक सुरक्षित है जब तक आप उन तथ्यों के साथ छेड़-छाड नहीं करते जिन पर आपकी आलोचना या टिप्पणी आधारित है।
दण्डः- भारतीय दण्ड संहिता की धारा 500 के तहत मानहानि के लिए दण्ड का प्रावधान किया गया है। इस धारा के अनुसार अगर कोई किसी दूसरे को बदनाम करता है तो उसे दो साल सामान्य कारावास की सजा या जुर्माना या फिर सजा तथा जुर्माना दोनों दिया जाए। एक पत्रकार के लिए यह दण्ड और भी गंभीर हो सकता है क्यांेकि उसके द्वारा प्रकाशित वाक्य विस्तृत ढ़ंग से प्रचारित होते है।

न्यायालय अवमानना कानून 1971
    प्रथम पे्रस आयोग ने न्यायालय अवमानना कानून 1952 में किसी भी संस्था समिति ने अवमानना से जुड़े कानूनांे का विस्तृत अध्ययन किया इसकी संस्तुतियों के आधार पर न्यायालय अवमानना अधिनियम कानून को रद्द कर दिया गया। अवमानना कानून 1971 में पहली बार न्यायालय अवमानना की संपूर्ण परिभाषा दी गई और इसमें अनुच्छेद 2 में न्यायालयीन निर्णयों के परिणामों को सूचीबद्ध किया गया। अनुच्छेद 2 के परिच्छेद ‘ए’ के तहत अवमानना दो दो वर्गो में विभाजित किया गया है:-(1) दीवानी अवमानना (2) फौजदारी अवमानना
अनुच्छेद 2 के परिछेद ‘बी’ के अंतर्गत न्यायालय के किसी निर्णय निर्देश आदेश डिक्री रिट एवं अन्य दूसरी प्रक्रियाओं की जानबूझकर अवमानना और न्यायालय के समक्ष किए गए किसी घोषणा से मुकरना दिवानी अवमानना के अंतर्गत आता है।
अनुच्छेद 2 के परिच्छेद ‘सी’ के तहत कोई भी प्रकाशन जो न्याय के शासन या न्यायिक प्रशासन का अवमुलयन करता  है और न्यायालय के कार्यो में हस्तक्षेप करता है या करने की प्रवृत्ति है इस धारा के अंतर्गत फौजदारी अवमानना हेतु आरोपित किया जाएगा। परिच्छेद ‘सी’ अनुसार फौजदारी अवमानना से तात्पर्य ऐसे प्रकाशन चाहे वो शब्द रूप में हो, लिखित या मौखिक हो, प्रतिक के रूप में हो, दृश्य प्रतिनिधिक रूप में हो या अन्य किसी रूप में हो या कोई भी अन्य सामग्री या अन्य किसी भी कार्य जो-
1. न्यायालय की सत्ता को नाराज करती है या नाराज करने की प्रवृत्ति हो तथा न्यायालय की गरीमा को कम करती हो या कम करने की प्रवृत्ति हो।
2. और पूर्वाग्रह ग्रस्त हो या हस्तक्षेप करती हो या करने की प्रवृत्ति हो किसी भी न्यायालयीन प्रक्रिया में बाधा डालती हो या बाधा डालने की प्रवृत्ति हो, किसी भी प्रकार से न्यायालय के प्रशासन में,
    इस धारा के अंतर्गत न्यायालय की फौजदारी अवमानना के लिए आरोपित किया जा सकता है। ऐसी कोई भी सामग्री जिसका प्रशासन जनता के दिमाग में न्यायाधीशों की योग्यता, ईमानदारी, और सत्यनिष्ठा के प्रति शंका उत्पन्न करता है और कोर्ट के न्याय के प्रशासन के प्रति  किसी भी वादी के मन में अविश्वास उत्पन्न करता है, न्यायालय की अवमानना के लिए आरोपित किया जा सकता है। कोई भी प्रकाशन जो किसी न्यायाशीध के मन में अपने आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन के लिए उलझन उत्पन्न करता है, न्यायालय की अवमानना करता है। लेकिन मगर यह प्रमाणित होता हैं कि संबंधित लेखन ने न्यायालय की सत्ता एवं प्रतिष्ठा का अवमूल्यन किया है और इससे न्यायालय के प्रशासन में जनता का विश्वास कम हुआ है तब यह अवमानना का मामला बतना है। चाहे यह निदांपरक आलोचना न्यायाधीयों के गैर न्यायालयीन कार्यो से क्यों न जुड़ा हुआ हो किसी मामले में निर्णय में गलत मंशा से लांघन लगाना भी स्पष्ट रूप से न्यायालय की अवमानना है। प्रेस को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी भी आलोचना को या किसी पक्ष का समर्थन करे। न्याय के प्रशासन समेत सार्वजनिक क्षेत्र से जुड़े प्रत्येक विषय निडर और आलोचनात्मक टिप्पणी के परिक्षेत्र में आते हो। प्रेस की सार्वजनिक कार्य एवं भूमिका से यह बाध्यता भी जुुड़ी हुई है कि वह सभी का सम्मान करते हुए अपने दायित्वाऐं का निर्वाहन करें। इस प्रकार के दायित्व बोध के बिना एक स्वतंत्र प्रेस अन्याय का एक शक्तिशाली हथियार बन जाता है। न्यायालय की यह जिम्मेदारी है कि वह अपनी सत्ता को व्यवस्थित रखते हुए प्रेस की स्वतंत्रता और सार्वजनिक हित के मुद्दों पर टिप्पणी करने के प्रेस के अधिकार के बीच एक सांमजस्य स्थापित करे। क्योंकि बिना स्वतंत्र पे्रस के स्वतंत्र समाज की कल्पना नहीं की जा सकती। प्रेस की स्वतंत्रता यद्य िस्वयं में कोई लक्ष्य नहीं है। बल्कि यह स्वतंत्र समाज की स्थापना के लक्ष्य का एक साधन मात्र है। ठीक उसी प्रकार न्यायापालिका की स्वतंत्रता भी स्वतंत्र समाज की स्थापना के लक्ष्य का माध्यम है और यह सत्य है कि स्वतंत्र न्यायपालिका का सुचारू रूप से कार्य करना प्रेस की स्वतंत्रता की स्थापना के लिए एक अनिवार्य शर्त है। हांलाकि एक स्वतंत्र न्यायपालिका से अधिक स्वतंत्र प्रेस को महत्ता नहीं दी जा सकती। ठीक उसी प्रकार एक स्वतंत्र न्यायपालिका को एक स्वतंत्र प्रेस से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं माना जा सकता। इस प्रकार दोनों एक दूसरे के पूरक है। और सहयोगी है। यद्यपि न्यायाधीश भी मानव होते है और उनके मानवीय भूलों की अपेक्षा लाजमी है। अपराध से जुड़े समाचारों का प्रकाशन समाचार पत्रों की नियमित विशेषता है। इस प्रकार की सामग्री जनरूचि और जन सरोकार से जुड़ी होती है लेकि यह स्पष्ट है कि इन अपराधों पर मुकदमा जल्दी या देेरी से चलता ही है।  अपराध की एक रिपोर्ट चाहे किनती भी स्टीक क्यों न हो एक ऐसे सत्य को प्रदर्शित करता है जिस पर मुकदमें के दौरान गर्म विवाद होना लाजमी है। या चाहे पहचान का एक प्रश्न हो सकता है या एक छोटा सा संक्षिप्त विवरण हो सकता है। लेकिन कभी-कभार यह मुकदमें के रूप को पलट देता है। एक रिपोर्ट तैयार करने के लिए सामान्यतः गवाहों को साक्षात्कार करना आावश्यक होता है जिनका मुकदमें के दौरान भी बयान लिया जाता है। एक रिपोर्टर किसी घटना का पूरा  ब्यूरा प्राप्त करने में सफल हो सकता है और ऐसी महत्वपूर्ण सामग्री प्रकाशित करने की स्थिति में हो सकता है तो बाद में मुकदमें के दौरान साक्ष्य का कार्य कर सकते है। लेकिन उनमें प्रकाशन के कई खतरे भी है। खासतौर पर ऐसी स्थिति में जब अपराध में शक की सूई किसी खास व्यक्ति की ओर घुमी हो। एक आरोपी की तस्वीरों का प्रकाशन भी बहुत बारिकी का विषय हो सकता है क्योंकि कई अपराधिक मुकदमों में आरोपी की पहचान करना अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दा होता है। एक गवाह जो किसी आरोपी की अपनी याददास्त के आधार ईमानदारी से तस्वीर नहीं बनवा सकता लेकिन अगर उसने आरोपी की तस्वीर समाचार पत्रों में देखी है तो वह उसे आजादी से पहचान सकता है। हांलाकि इस प्रकार का प्रकाशन अभियोजन पक्ष के साक्षियों की पहचान के बारे में शंका उत्पन्न करा सकता है और आरोपी को खतरे में डाल सकता है दूसरी ओर वांछित व्यक्ति की तस्वीर कभी-कभी पुलिस के अनुरोध पर प्रकाशित की जाती है जिससे उसकी गिरफ्तारी में मदद मिल सके या लोगों को उसके खिलाफ सावधान किया जा सकें या फिर  दोनों ही कार्य किये जा सके। इसलिये यह प्रश्न उन तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है कि कौन सा प्रकाशन किसी खास मासले में कानून की अवमानना करता है और पत्रकार अक्सर की संभावित अपराधों, कदाचार और दुव्र्यवहार की जांच करते है और साक्ष्य इक्कठा करते है। एक ओर जहां इस तरह की सामग्रियों का प्रसारण सार्वजनिक हित में होता है वहीं यह समाचार पत्रों को अपना प्रसार बढ़ाने में मदद भी करता है। न्यायालय अवमानना कानून ऐसे किसी इक्कठा किये गये साक्ष्य के प्रकाशन में बाधा नहीं डाल सकता जिसमें आरोपी पहले ही गिरफ्तार हो चुका है और उस पर आरोप गठित हो गये है लेकिन जब न्यायिक प्रक्रिया चलती रहती है, प्रेस को साक्ष्यांे को प्रकाशित नहीं करना चाहिये। जब किसी व्यक्ति पर अपराध के लिए मुकदमा चलता है और प्रेस के पास यह साक्ष्य हो कि कोई दूसरा व्यक्ति उस अपराध के लिए दोषी है, प्रेस को उन साक्ष्यों को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना चाहिये। इस प्रकार की प्रक्रिया को अपनाते हुए प्रेस अपने इस खोजी प्रयास के लिउ क्रेडिट प्राप्त कर सकता है और अपने इस प्रयास का अपना प्रसार विशेष काॅलम का प्रकाशन कर बढ़ा भी सकता है। हांलाकि न्यायालय को नाराज करने के लिए दण्ड देने की शक्ति कोर्ट को होती है। फिर भी इसका प्रयोग बहुुत ही किफायत से ओर न्याय के शासन की मर्यादा के लिए किया जाना चाहिये। इसका प्रयोग किसी न्यायाधीश का व्यक्तिगत रूप से अपमान कर नहीं करना चाहिये। प्रमाणिक आलोचना जिसमें न्यायालयीन कार्यो की स्वच्छ और तर्क संगत आलोचना हो और जिसमें सार्वजनिक हित छुपा हो अवमानना के अंतर्गत नहीं आता है। लेकिन न्यायाधीशों के प्रति गलत उद्देश्य से आरोप लगाया जाता है तब यह प्रमाणिक माना जाता है। न्यायालय के किसी फैसले के गलत होने पर उसकी आलोचना की जा सकती है परन्तु इस फैसले के लिए किसी न्यायाधीश पर बेईमानी का आरेाप नहीं लगाया जा सकता है।
अगर कोई कथन पूर्वाग्रह से पूर्ण हो और न्याय की प्रक्रिया में हस्तक्षेप हो तब तथ्यों की सत्यता जिस पर यह टिका हुआ है कोई बचाव नहीें होता। समाचार पत्रों द्वारा ट्रायल या मिडिया ट्रायल न्यायालय के न्यायिक प्रशासन में हस्तक्षेप माना जाता है। यद्यपि न्याय की प्रक्रिया में हस्तक्षेप या बांधा डालने के लिए दण्डित किया जा सकता है, अगर ऐसा हस्तक्षेप वास्तविक तौर पर डाला गया हो उसी प्रकार एक व्यक्ति को अनभिज्ञता में किये गये प्रकाशन और उसमें वितरण के लिए न्यायालय अवमान का आरोपी नहीं बनाया जा सकता, चाहे वह मामला अपमान प्रतीत क्यों न होता हो।
न्यायालय अवमानना की सीमाएॅंः- अज्ञानता में किया गया प्रकाशन या विवतरण जो इस कानूनी की किसी भी धारा के अंतर्गत आता हो न्यायालयीन प्रक्रियाओं की स्वच्छ एवं वास्तविक रिपोर्ट विचाराधीन न्यायिक प्रक्रियाओं की स्वच्छा एवं वास्तविक रिपोर्ट को जो इस कानून की धारा 4 के अंतर्गत संरक्षित है लेकिन धारा 7 के अंतर्गत इस प्रकार के प्रकाशन पर कोई निषेध नहीं है। धारा 7 केवल उस प्रकार के प्रकाशनों पर निषेध लगाती है जब किसी न्यायालय ने उस प्रकाशन पर किसी निश्चित आधार पर प्रतिबंध लगाया हो जैसेः-
    राष्ट्र की सुरक्षा एवं सार्वजनिक आदेश से संबंधित विषय न्यायिक विधानों की स्व्च्छ  आलोचना, न्यायिक विधानों और न्यायिक फेसलों की स्वच्छ  आलोचना का प्रकाशन जो धारा 5 के अंतर्गत संरक्षित है। क्योंकि जनता का हित न्याय के सुचारू प्रकाशन से जुड़ा है। न्यायाधीश और न्यायालयों आलोचना की जा सकती है। अगर उसके लिए पर्याप्त तर्क हो कि कोई भी न्यायिक कानून विधान और जनता के हित के विरूद्ध है। इस प्रकार की आलोचना संरक्षित होती है और न्यायालय अवमान के अंतर्गत नहीं आती। किसी न्यायालय के फेसले पर स्वच्छ टिप्पणी के लिए कोई वाद लगाना उपयोगी नहीं होता। अगर यह टिप्पणी केस की सुनवाई और निर्णय से पहले की गई हो अनुच्छेद 3 के परिच्छेद ‘ए’ के स्पष्टीकरण में यह कहा गया है कि एक मामले को तब तक पूर्णतः निर्णित नहीं माना जा सकता जब तक उस फेसले के खिलाफ अपील या पुनर्विचार की अवधि समाप्त नहीं हो जाती, अगर अपील या पुनर्विचार दायर किया जा चुका है तब अपील और पुनर्विचार सुनने के बाद ही मामल पूर्णतः समाप्त माना जाता है।
    किसी की अधीनस्थ न्यायालय के अधिकारियों के खिलाफ प्रमाणिक शिकायत करना न्यायालय अवमानना के अंतर्गत नहीं आता है। कई लिखित शब्द कभी-कभी न्यायालय की अवमानना एवं मानहानि दोनों से जुड़े होते है। किसी न्यायाधीश को धोखेबाज या जालसाझ के रूप में वर्णित करना मानहानि या न्यायालय अवमानना दोनों के अंतर्गत आता है। दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 129 और 215 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय और अवर न्यायालय को यह शक्ति दी गई है कि वह किसी संस्थान, संगठन व्यक्ति या सरकारी अधिकारी को न्यायालय की अवमानना के आरोप में दण्डित कर सकता है।
दण्डः- दीवानी अवमानना के मामले में,  अवमानना के आरोपी को साधारण कैद की सजा नहीं दी जा सकती उसे किसी दीवानी जेल में 6 महीने से अधिक नहीं रखा जा सकता। सामान्यतः इस अपराध के लिए जुर्माने को पर्याप्त माना जाता है। फौजदारी अवमानना के मामले में आरोपी को अधिकतम 6 महीने साधारण कारावास की सजा दी जा सकती है या अधिकतक 2000/- रूपये का जुर्माना लगाया जा सकता है या दोनों ही लागू होते है। अगर आरोपी संतोष जनक क्षमा याचना करता है तो उसे छोड़ा जा सकता है और दिया गया दण्ड समाप्त किया जा सकता है। न्यायालय अवमानना के अंतर्गत आरोपी द्वारा किये गये अवमान के एक वर्ष के अंदर ही कार्यवाही की जा सकती है।

श्रमजीवी पत्रकार एवं समाचार पत्र कर्मी सेवा शर्त कानून 1955
    यह कानून श्रमजीवी पत्रकारों एवं समाचार प्रतिष्ठान में कार्यरत दूसरे कर्मचारियों की सेवा शर्तो को नियमित करता है। प्रथम प्रेस आयोग ने यह पाया कि पत्रकारों द्वारा प्राप्त मेहनताना पूरी तरह से असंतोषजनक है। इसमें विभिन्न वर्गो के कर्मचारियों के वेतन को तय करने के लिए विस्तृत प्रयास नहीं किये गये है लेकिन प्रयास नहीं किये गये है लेकिन इसने यह माना है कि पत्रकारों एवं अन्य कर्मचारियों के लिए न्यूनतम वेतन तय करने की आवश्यकता है और उन्हें न्यूनतम वेतन देने से संबंधित अनुसंसाएॅं की। इसके बाद 1955 में श्रमजीवी पत्रकार (सेवा शर्ते) एवं विविध प्रावधान कानून 1955 को लागू किया गया और औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 को पत्रकारों के लिए भी प्रयोजय बनाया गया है। विभिन्न वेज बोर्डो के द्वारा समय-समय पर वेतनतर के पुनरिक्षण के द्वारा, जीवन संबंधी खर्च में वृद्धि से सांमजस्य और सेवा सुरक्षा के नियम, समाचार पत्र कर्मचारियों की सेवा शर्तो एवं अवधि में वांछित सुधार आया। इस कानून के कुछ महत्वपूर्ण नियम निम्नांकित हैः-
1. यह नियम जो औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 के अंतर्गत श्रमिकों पर लागू होते है श्रमजीवी पत्रकारों पर भी लागू होंगे।
2. श्रमजीवी पत्रकारों से तात्पर्य है वैसे पत्रकार जो किसी समाचार पत्र प्रतिष्ठान में लगातार तीन वर्षो तक सेवा कर चुके है। को 15 दिन के औसत वेतन के बराबर एक वर्ष की सेवा के बदले गे्रज्यूटी प्रदान की जायेगी। हांलाकि यह ग्रेज्यूटी सेवा से इस्तीफा मृत्यु, त्याग पत्र और बर्खास्तगी पर धारा 3 के अंतर्गत जो अधिकतम 6 महीने के वेतन से अधिक नहीं होगी प्रदान की जावेगी।
3. किसी भी श्रमजीवी पत्रकार से यह चार लगातार सप्ताहों में 144 घंटे से अधिक कार्य नहीं किया जावेगा जिसमें भोजन की अवधि शामिल नहीं होगी किसी भी श्रमजीवी पत्रकार को एक सप्ताह में लगातार 7 दिन तक काम करने पर कम से कम 24 घंटे का विश्राम दिया जायेगा जिसमंे रात्रि 10 बजे से प्रातः 6 बजे तक का समय शामिल होगा।
4. प्रत्येक श्रमजीवी पत्रकार 11 दिनों के कार्य के बाद  एक दिन के अर्जित अवकाश प्राप्त करने का अधिकारी होगा और इस दौरान उसे पूर्ण वेतन प्राप्त होगा साथ ही आधे वेतन पर 18 दिन पर एक दिन स्वास्थ प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने पर अवकाश का अधिकारी होगा।
5. केन्द्रीय सरकार द्वारा वेज बोर्ड का गठन किया जावेगा जो श्रमजीवी पत्रकारों  के संशोधित वेतन दर को निश्चित करेगा इस वेज बोर्ड में -
क. समाचार पत्र कर्मचारियों के दो प्रतिनिधि शामिल होगे।
ख. श्रमजीवी पत्रकारों के दो प्रतिनिधि शामिल होंगे।
ग. तीन स्वतंत्र व्यक्ति होंगे जिसमें से एक उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश होंगे और जिनकी नियुक्ति सरकार द्वारा वेज बोर्ड के अध्यक्ष पद पर की जायेगी।
    इस कानून की धारा 12 केन्द्रिय सरकार को यह शक्ति देती है कि वह वेज बोर्ड की संस्तुतियों को लागू कराये और अगर आवश्यक हो तो इन संस्तुतियों में आवश्ययक सुधार करे।
6. धारा 13‘ए’ के अनुसार केन्द्र सरकार अतंरिम दरे वेज बोर्ड की सलाह से तय करे।

7. केन्द्र सरकार द्वारा धारा 13‘बी’ के अंतर्गत गैर पत्रकार, समाचार पत्र कर्मियों  के वेतन की दरे और भत्तों को तय एवं संशोधित करने के लिए वेज बोर्ड का गठन किया जायेगा जिसमें निम्नांकित सदस्य शामिल होंगे -
क. समाचार पत्र कर्मचारियों के दो प्रतिनिधि।
ख. गैर पत्रकार समाचार पत्र कर्मियों के दो प्रतिनिधि।
ग. तीन स्वतंत्र व्यक्ति जिनमें से एक उच्च या उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश होगा और जिसको सरकार बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त करेंगी।
8. इस कानून के नियम उन सभी समाचार पत्रों पर  समान रूप से लागू होंगे जिसमें 20 या अधिक लोग कार्य करते हों-
क. औद्योगिक रोजगार (स्टेंडिंग आर्डर) कानून 1946
ख. कर्मचारी भविष्य निधि कानून 1952
9. अगर कोई नियोक्ता किसी भी प्रावधान का उल्लंघन करता है तो उसे जुर्माने से दण्डित किया जावेगा जो रूपये 200/- से अधिक नहीं होगा यदि यह उल्लंघन दूसरी बार किया जाता है तो जुर्माने की राशि बढ़कर रूपये 500/- हो जायेगी।
विधायिका की अवमानना
    विशेषाधिकार प्रत्येक सदन के ऐसे मौखिक अधिकार है जिन्हें संवैधानिक प्रक्रियाओं के सफल संचालन के लिए सर्वमान्यता प्राप्त है। संविधान के अनुच्छेद 105 और 194 के तहत संसद और विधान मण्डलों को कुछ शक्तियाॅं, विशेषाधिकार और उनमुक्तियाॅं प्राप्त है परिच्छेद 2 संसदीय प्रक्रियाओं, पत्रों आदि के प्रकाशन से उनमुक्ति प्रदान करता है। सदन से संबंधित कोई प्रकाशन तभी किया जा सकता है जब यह कार्य सदन स्वयं करे या अपने अंतर्गत किसी को अधिकृत करें। सदन की प्रक्रियाओं से संबंधित सत्य आधारित रिपोर्ट को भी इस परिच्छेद के अंतर्गत प्रकाशन का अधिकार नहीं है।
    परिच्छेद 3 मूल रूप से उन  सभी नियमों, शक्तियों, विशेषाधिकारों और उनमुक्तियों से संबंधित है जो पूर्व के नियमों के अंतर्गत नहीं आते। जब तक कोई नया कानून, कोई नई व्याख्या नहीं करता है तब तक ये इग्लेण्ड के हाऊस आॅफ काॅमनस को मिले अधिकारों के समान और संविधान के लागे होने के वक्त मिले अधिकारों के समान अधिकार संसद को प्राप्त होगे। संविधान के  44वे संशोधन के द्वारा इस परिच्छेद में संक्षिप्त संशोधन हुआ और हाऊस आॅफ काॅमन शब्द के संदर्भ को हटा दिया गया लेकिन इस परिच्छेद का मूल अपरिवर्तित रहा। इस प्रकार स्थिति यह है कि अगर किसी से पूछा जाये कि भारत में सांसद और विधान मण्डलों को अनुच्छेद 105 और 194 के अलावा और कौन से विशेषाधिकार प्राप्त है तो उत्तर होगा कि वही विशेषाधिकार जो 26 जनवरी 1950 के दिन तक हाऊस आॅफ काॅमन को प्राप्त थे। प्रथम पेे्रस आयोग ने यह संस्तुति दी कि संसद और विधान मण्डलों को अपने विशेषाधिकार और उनमुक्तियों को जो उन्हें अवमानना के खिलाफ मिली हुई है एक विधेयक के द्वारा परिभाषित करना चाहियें। यह प्रश्न वर्षो से सार्वजनिक वाद विवाद का विषय रहा है और कुछतर विशेषाधिकारों के सूचिकरण का विरोध करते है। विशेषाधिकारों को कूटबद्ध करने के विरोध में स्थापित तर्क इस पर जोर देता है कि अगर संसद या विधान मण्डलों द्वारा इन कानूनों को कूटबद्ध किया जाता है तो यह कानून स्वतः संविधान के भाग 3 में वर्णित मूल अधिकारों का विषय बन जाता है और न्याय संगत विषय बन जाता है। न्यायालय को विशेषाधिकारों के प्रश्न पर निर्णय देने की शक्ति प्रदान करना संसद की प्रतिष्ठा एवं गरिमा को कम करना है। ऐसा कहा गया कि इन विशेषाधिकारों का संहिताकरण संसद और राज्य विधान मण्डलों को इसके प्रतिकूल संगठन, न्यायपालिक के सामने अनावरत करना होगा। द्वितीय प्रेस आयोग ने यह वर्णन किया कि न्याय पालिका संविधान की अनुसंगी है जिस प्रकार सांसद और राज्य विधान मण्डल, ऐसे में भारतीय संविधान के अंतर्गत ये एक- दूसरे के प्रतिकूल संगठन नहींे है। सत्य में, संसद और विधान मण्डलों द्वारा बनाये गये कानून कई  अवसरों पर न्यायालय द्वारा प्रभावित किये जाते है जब वे संवैधानिक नियमों द्वारा प्रमाणित ठहराये जाते है और इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि इससे संसद  या विधान मण्डल की प्रतिष्ठा प्रभावित नहीं होती उसी तरह से उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशोें को कार्यपालिका द्वारा नियुक्त किया जाता है और इस तर्क के आधार पर कोई यह नहीं कह सकता कि उनकी स्वतंत्रता प्रतिष्ठा प्रभावित होती है। वे इसे प्रेस स्वतंत्रता के नजरिये से देखते है। यह अनिवार्य है कि सांसद और विधान मण्डलों के विशेषाधिकारों का जितनी जल्दी हो सके संहिताकरण किया जाना चाहिये। एक पत्रकार या संपादक को कारावास चेतावनी, भत्र्सना और धिक्कार के माध्यम से सांसद के विशेषाधिकारों के लिए दण्डित किया जा सकता है। सदन के प्रक्षेप में उसके प्रवेश के विशेषाधिकार और संसदीय प्रक्रियाओं को कवर करने की उसकी सुविधाएॅं समाप्त की जा सकती है या उससे क्षमा याचना प्रकाशित काने के लिए कहा जा सकता है। यद्यति इसके तहत किसी तरह के जुर्माने का प्रावधान नहीं है। अवमान विशेषाधिकार भंग करने की अपेेक्षा ज्यादा विस्तृत होता है। अवमानना को एक कानून के माध्यम से और एक अभिव्यक्ति के माध्यम से जो सदन की प्रतिष्ठा का अवमूल्यन करती हो बिना इसके विशेषाधिकारों का हनन करते हुए परिभाषित किया जा सकता है लेकिन सदन की कार्यवाही का निष्पक्ष सत्य एवं दुर्भावना से परे रिपोर्ट प्रकाशित करना चाहे यह मानहानि, बगावती या अश्लील प्रकृति का क्यों न हो, संसदीय विशेषाधिकारों का उल्लंघन नहीं है। ऐसी रिपोर्ट के प्रकाशन पर किसी सक्षम न्यायालय  में कोई दीवानी या फौजदारी वाद नहीं चलाया जा  सकता जब तक यह शासकीय गुप्त बात अधिनियम, मानहानि, राजद्रोह, अश्लीलता या दण्डसंहिता के अंतर्गत किसी दण्डात्मक अपराध के अंतर्गत न आता हो, भारत में विधायिका ने अपने विशेषाधिकारों से संबंधित किसी भी कानून को संहिताबद्ध नहीं किया है क्योंकि ऐसा कोई भी कानून नागरिकों के अधिकार, मौलिक अधिकार के कारण न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ जायेगा। हांलाकि संसदीय कार्यवाही का अपुष्ट, विकृत, अस्वच्छ, स्वेच्छाचारी, प्रस्तुतिकरण के खिलाफ कार्यवाही की जा सकती है।

भारत की प्रमुख समाचार समितियां

यूनेस्को के अनुसार एक समाचार एजेंसी एक ऐसा अनुक्रम या व्यवसाय है जिसका मुख्य उद्देष्य है समाचार एकत्रित करना एवं समाचार सामग्री इक्ट्ठा करना। जिसका प्राथमिक उद्देष्य है, तथ्यों की प्रस्तुति एवं अभिव्यक्ति और इससे समाचार उद्योग के समूह के बीच वितरित करना है। और विष्ेाष परिस्थिति में निजी उपभोक्ताओं को एक निष्चित राषि के बदले उनको सम्पूर्ण एवं जहां तक संभव है, निष्पक्ष सेवा प्रदान करना। ऐसी परिस्थिति मंे जो व्यापारिक कानूनों एवं नियमों के अनुकूल हो। टेलीग्राफ, टेलीप्रिटंर और दूसरी तकनीकी सेवाओ के अविष्कार ने समाचार एजेसियों की महत्ता को बढाया। इन अविष्कारों की वजह से लम्बी दूरी के प्रसारण एवं त्वरित प्रसारण संभव हो सके। इन अविष्कारों ने समाचार संग्रहण की लागत को भी कम किया। एक समाचार एजेसी सामान्यतः समाचारों के कवरेज से संबंधित है इसमे विष्लेषण के साथ स्थान विषेष से महत्वपूर्ण राजनीतिक , आर्थिक घटनाओं का कवरेज षामिल है। यद्यपि इसका प्रभाव सीमित है परन्तु समाचार एजेसी महत्वपूर्ण राष्ट्रीय और अन्तर्रराष्ट्रीय महत्व के मसलों पर जनमत निर्माण मेे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। एक समाचार एजेंसी प्रत्यक्ष रूप से जनता से सम्बन्धित नही होते है। यह जनता से जनसंचार के दूसरे माध्यमों की सहायता से सम्पर्क मे होती है। जैसे. प्रेस, रेडियो औार टेलीविजन। मूल रूप से यह समाचारों के थोक आपूर्तिकर्ता की भूमिका का निर्वहन करती है। अपनी आर्थिक आवष्यकताओं की वजह से जनमाध्यम समाचार समितियों द्वारा प्रदत्त सामग्री पर निर्भर होते है। क्योंकि व्यापक स्तर पर कवरेज के लिए एक समाचार पत्र को स्टाफ रिर्पोटर संवाददाओं, ब्यूरो कार्यालय का एक मंहगा नेटवर्क बनाना होगा। और वैष्विक स्तर पर टेलीकम्युनिकेषन उपकरणों की उपलब्धता करानी होगी। हम सभी यह जानते हैं कि हमारे देष के बहुत सारे समाचार पत्र और तीसरी दुनिया के लगभग अधिकांषतः समाचार पत्र अपने ही देष में संवाददाताओं का उचित संजाल नही बना पाते। मात्र कुछ एक समाचार पत्र इस प्रकार के निवेष  और खर्च को वहन करने में सक्षम है। अधिकांष समाचार माध्यमों के लिए समाचार एजेंसी समाचार आपूर्ति का महत्वपूर्ण स्रोत है। समाचार एजेंसियों के उपभोक्ताओ में दैनिक समाचारपत्र, रेडियो, टीवी स्थानीय समाचारपत्र एवं पत्रिकाएं, विविध संस्थान और खासतौर पर सरकारी एजेंसियां, सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र के बड़े निगम, बैंक और वाणिज्यिक प्रतिष्ठान षामिल है।
एक दैनिक समाचारपत्र में प्रकाषित कुल सामग्रियों में समाचार एजेंसियो द्वारा प्रदत्त विषयवस्तु का हिस्सा लगभग 40 से 50 फीसदी तक होता है। बहुत सारे जनमाध्यम और छोटे समाचारपत्र बाहरी स्थानों पर संवाददाताओं का खर्च वहन नहीं कर सकते, समाचार एजेंसिया उन्हें थोक में समाचार उपलब्ध कराती है, जिसमें कभी-कभी षत-प्रतिषत समाचार एजेंसियो द्वारा ही प्रदत्त होते है।  आॅल इंडिया रेडियो द्वारा प्रसारित समाचारों में लगभग 40 फीसदी हिस्सा एजेंसी से प्राप्त समाचारों का ही होता है और बाकि उनके अपने संवाददाताओं से प्राप्त समाचारों का। कोई भी समाचार संगठन समाचार समितियों द्वारा प्राप्त समाचारों के बिना कार्य ही नहीं कर सकता।

विष्व की पहली समाचार समिति की स्थापना जुलियस रायटर के द्वारा 1850 में जर्मनी में की गई थी, जिसे बाद में जर्मनी से लंदन लाया गया। वर्तमान में रायटर समाचार सेवा एक वैष्विक संगठन बन चुका है जो विभिन्न देषों के हजारों समाचार पत्रों को अपनी सेवाएं उपलब्ध कराता है। दूसरी तीन अंतर्राष्ट्रीय समितियां है एजेंसी फ्रांस प्रेसे (ए. एफ. पी), एसोसिऐटेड प्रेस (ए. पी), और यूनाइटेड प्रेस इंटरनेषनल (यू. पी. आई)। इनके अलावा अन्य महत्वपूर्ण समाचार समितियां जापान की क्योदो और जर्मनी की डचसे प्रेस एजेंन्टूर (डी. पी. ए.) है।
प्रेस ट्रस्ट आॅफ इंडिया (पी. टी. आई)
    भारत की सबसे बड़ी समाचार समिति पी. टी. आई अति. एक गैर लाभ वाली सहकारी समिति है जो देश के समाचार पत्रों के स्वामित्व है। इसका उद्देश्य अपने उपभोक्ताओं को निष्पक्ष और बेहतर समाचार उपलब्ध कराना है। सन् 1948 में भारत में प्रकाशित कुछ महत्वपूर्ण दैनिक पत्रों के संपादकों ने मिलकर पी.टी. आई. को हस्तगत कर लिया। पी.टी.आई. 27 अगस्त 1947 से अस्तित्व में आई अैर 1 फरवरी 1949 से इसने कार्य करना प्रारंभ किया। इसने एसोशियटिड प्रेस आॅफ इण्डिया और रायटर के भारतीय व्यापार को अपने हाथों में ले लिया। यह समाचार समिति सायरो से सिंगापुर तक समाचारों का संलकन करती है। समिति की महत्वपूर्ण सेवाएॅं विभिन्न संपादकों के अधीन निर्देशित होती है। इसके कुल कर्मचारियों की संख्या 1600 है जिसमेें लगभग 400 पत्रकार शामिल है। संपूर्ण देश में इसके 100 से अधिक ब्यूरो और देश के बाहर 10 ब्यूरो कार्य कर रहे है। इस समिति के साथ लगभग 300 स्ट्रींगर जुड़े है जो लगभग पूरे देश में फेले हुए है समिति 1200 बीट पर सेकेण्ड (400 शब्द) की स्पीड से सेटेलाईट डेटा चेनल और टिकर लाईन के माध्यम से सेवाएॅं उपलब्ध कराती है। कार्यदक्षता की दृष्टि से इसने संपूर्ण देश को चार क्षेत्रों मंे बांट रखा है जिनके कार्यालय क्रमशः दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता, चेन्नई में क्षेत्रीय मुख्यालयों के रूप में कार्यरत है। दिल्ली में इसके अलग-अलग राजनैतिक, आर्थिक और खेल ब्यूरो स्थापित किये गये है। पी.टी.आई. द्वारा प्रदान की जा रही प्रमुुख सेवाएॅं है-
अंग्रेजी समाचार सेवाः पी.टी.आई. की अंगे्रजी समाचार सेवा दो रूपों में उपलब्ध है। कोड सेवा के तहत अलग-अलग तरह की दो वर्गीकृत सेवाएॅं प्रदान की जाती है जिसमें से किसी भी समूह से कोई समाचार पत्र अपनी पंसद की सामग्री ले सकता है। यह विविध समूह है। राष्ट्रीय/क्षेत्रीय समाचार, आर्थिक/वाणिज्यिक समाचार, अंतराष्ट्रीय और खेल समाचार। कोर सेवा के तहत लगभग 40 हजार शब्द एवं पूर्ण सेवा के तहत लगभग एक लाख शब्द प्रतिदिन उपलब्ध कराये जाते है।
भाषाः-  भाषा की शुरूआत सन् 1986 में हुई जो पी.टी.आई. का हिन्दी संस्करण है। इसकी हिन्दी भाषा समाचार सेवा का हिन्दी भाषी राज्यों में अपना नेटवर्क है। भाषा लगभग 40 हजार शब्द प्रतिदिन के हिसाब से सेवा उपलब्ध कराती है।
फोटो सेवाः- पी.टी.आई. फोटो सेवा की शुरूआत सन् 1987 में हुई जिसके माध्यम से भारतीय मिडिया में बहुतायत में तस्वीरें उपलब्ध कराई जाती है। इस सेवा का प्रसारण सेटेलाईट को माध्यम से होता है। पूरे देश में उपलब्ध पी.टी.आई.की मान्यता के साथ उपलब्ध कराई जाती है।
आर्थिक सेवाः- एक पाक्षिक आर्थिक जर्नल भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में विश्लेषणात्मक रिपोर्ट और उद्यतन तथ्यों के साथ पी.टी.आई.उपलब्ध कराती है।
विज्ञान सेवाः- एक पाक्षिक मेलर के माध्यम से भारत और विदेशों में भारत और विदेशों में हुए वैज्ञानिक एवं तकनीकी विकास से संबंधित रिपोर्ट पी.टी.आई.अपने उपभोक्ताओं को उपलब्ध कराती है।

पी.टी.आई.फीचरः- इस सेवा के तहत चार साप्ताहिक फीचर का पैकेज जो किसी निश्चित राष्ट्रीय अंतराष्ट्रिय और सामान्य घटना से जुड़ा होता है। पी.टी.आई. द्वारा उपलब्ध कराया जाता है।
पी.टी.आई. मेैग:- इसके तहत 10 विशेष खबरे जो कला से लेकर व्यापार और विज्ञान के विषय से संबंधित होती है। साप्ताहित मेलर पैकेज के माध्यम से उपलब्ध कराई जाती है। यह पी.टी.आई.की वायर सेवा पर भी उपलब्ध होती है।
ग्राफिक्स सेवाः- पी.टी.आई. ग्राफिक्स सेवा के तहत आर्थिक, खेल और चुनाव से संबंधित क्षेत्रों में हुए महत्वपूर्ण परिवर्तन के बारे में साप्ताहिक मेलर के पेकेज के माध्यम से 14 ग्राफिक्स उपलब्ध कराये जाते है। बजट जैसे खास अवसरों पर पी.टी.आई. फोटो सेवा के साथ ही ग्राफिक्स सेटेलाईट के माध्यम से प्रसारित किये जाते है।
न्यूज स्केनः- इसके तहत देश एवं विदेश की महत्वपूर्ण घटनाओं को कवर किया जाता है। यह समाचार केप्सूल के रूप में विडियों मानीटर पर प्रदर्शित किया जाता है।
स्टाॅक स्केनः- इसके तहत स्टाॅक मार्केट से जुड़ी सूचनाएॅं विडियों टर्मिनल के माध्यम से समूह में प्रदर्शित की जाती है। स्टाॅक स्केन सिलेक्ट आॅफ इनडिविजूूवल यूजर इस सेवा का इन्टरक्टीव प्रारूप है।
एशिया पल्सः- यह पी.टी.आई. द्वारा  एशियाई देशों में उपलब्ध व्यापारी अवसरों और आर्थिक विकास का आॅनलाईन डेट बैंक है। पी.टी.आई. और चार अन्य एशियाई मिडिया संगठनों द्वारा स्थापित एशिया पल्स सिंगापुर में एक कंपनी के रूप में निबंधित है।
पी. टी. आई. टीवी:- पी.टी.आई. टी.वी. स्थान विशेष और वृत चित्रात्मक शैली में टेलीविजन के लिए उपलब्ध सेवा है। पी.टी.आई.टी.वी. के कुछ महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में मनीमेटर्स और ताना बाना शामिल है।

निर्गुट देशों की समाचार समिति :- नैनाप सन् 1976 में अस्तित्व में आया।  पी.टी.आई. विश्व के गुटनिरपेक्ष देशों के समाचारों का एक पुनः वितरण केन्द्र है जो गुट निरपेक्ष देशों के समाचार समितियों के समाचारों का अदान-प्रदान करती है।
आर्गेनाईजेशन आॅफ एशिया पेसिफिक न्यूज एजेंसीज (व्ण्।ण्छण्।ण्)ः- ओ.ए.एन.ए. एशिया प्रशांत क्षेत्र के 30 समाचार समितियों का एक संगठन है। जिसमंे भारत से पी.टी.आई. और यू.एन.आई. शामिल है। इसकी स्थापना सन् 1961 में हुई। यह समाचारांे के अदान-प्रदान के एक फोरम के रूप में कार्य करता है। पी.टी.आई. ने अपने स्थापना के 50 वर्ष पूरे कर लिये है और आज इसकी सेवाएॅं इंटरनेट पर भी उपलब्ध है।

यूनाईटेड न्यूज आॅफ इण्डिया
    यू.एन.आई. की स्थापना स्वयं समाचार पत्रों द्वारा की गई जिससे दो समाचार समितियों के बीच प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित किया जा सके। इसने मार्च 1961 से काम करना शुरू किया। सन् 1968 के बाद इस समाचार समिति ने अपनेे संचार नेटवर्क को और अधिक विस्तृत बनाया और आज विकासशील देशों में टेलीपिं्रटर नेटवर्क का सबसे बड़ा जाल है। इसके उपभोक्ताओं की संख्या लगभग 7 गुना बढ़ गई और यह टेलीप्रिंटर के माध्यम से लगभग 1100 उपभोक्ताओं को सेवा उपलब्ध कराता है। इनमें से दर्जनों खाड़ी देशों से है जो यू. एन.आई. एक विशेष सेटेलाईट चेनल के माध्यम से जुड़े हुए है। इस समिति के लगभग 400 रिपोर्टर छोटे बड़े शहरों मंे है जिनकी सहायता के लिए 300 स्टाॅकर्स तथा 400 स्ट्रींगर कार्यरत है। आज कल यू.एन.आई. की समाचार सेवा सिंगापुर और माॅरिशस तक उपलब्ध है। एजेंसी की खाड़ी समाचार सेवा सन् 1980 में शुरू की गई जो यू.ए.ई., बहरीन, कतर, कुवैत, ओमान और साउदी अरब से समाचारों का कवरेज करती है। मई 1982 में यू.एन.आई. ने यूनिवार्ता नाम से अपनी हिन्दी सेवा की शुरूआत की। आज हिन्दी समाचार पत्रों के समाचार काॅलम खासतौर पर हिन्दी राज्यों और हैदराबाद, अहमदाबाद और कलकत्ता जैसी जगहों पर यूनिवार्ता की खबरों से भरे होते है। इस सेवा ने बहुत ही तेज गति से विकास किया और मात्र 15 सालों में हिन्दी भाषी राज्यों के 60 केन्द्रों से प्रकाशित 250 समाचार पत्र इसके ग्राहक बन गये। इनमें से 100 से अधिक समाचार पत्र पूरी तरह यूनिवार्ता के समाचारों पर ही निर्भर है। यू.एन.आई. के अंतराष्ट्रीय समाचार मुख्यतः ऐसोशिएटेड प्रेस आॅफ अमेरिका से प्राप्त होते है जिसके साथ यू.एन.आई. ने अपने स्थापना के समय से ही सहयोग समझौता कर रखा है।
    यू.एन.आई. की दूसरी प्रमुख विदेशी साझेदार जर्मनी की एजेंसी डी.पी.ए. है। इसके साथ ही यू.एन.आई. ने 15 अन्य वायर सेवा प्रदाताओं से समझौता कर रखा है जिनमें से अधिकांश खाड़ी देशों की समाचार समितियाॅं है। विदेशों से यू.एन.आई. के अपने संवाददाता भी समाचार भेजते है। नेपाल ऐसा पहला देश है जहां यू.एन.आई. ने सन् 1968 मंे अपना संवाददाता नियुक्त किया आज पांच महाद्वीपों के लगभग 20 देशों में फैले 22 यू.एन.आई. संवाददाता इसे विदेशी रिपोर्ट नियमित रूप से भेजते है।

साईकल से सेटेलाईट तक:- प्रारंभ में यू.एन.आई. नई दिल्ली के अपने उपभोक्ताओं के पास साईकल के माध्यम से समाचार उपलब्ध कराता था। आज यू.एन.आई. के समाचार उसके अपने टेलीपिं्रटर नेटवर्क, जो लगभग 85 हजार किलो मीटर में फैला है और जिससे भारत के 100 से अधिक शहर और नगर जुड़े है, के माध्यम से उपलब्ध कराता है। साथ ही आज यू.एन.आई. की सेवा इंटरनेट के माध्यम से भी उपलब्ध है। यू.एन.आई. देश की पहली समाचार समिति है जिनसे सेटेलाईट सेवा का उपयोग शुरू किया था। एसोशिएटेड प्रेस की समाचार सेवा प्राप्त करने के लिए यू.एन.आई. ने बाम्बे न्यूयार्क सेटेलाईट चेनल की 6 जून 1979 में शुरूआत की। एक विशेष यू.एन.आई. बाम्बे दुबई चेनल 1 अप्रेल 1981 को प्रारंभ किया गया। यू.एन.आई. ने महानगरीय केन्द्रों में अपने समाचार सेवा को पूर्णतः कम्प्यूटराईज कर लिया है, और पूरे देश भर में स्टेट आॅफ आर्ट तकनीक के माध्यम से अपनी पूरी व्यवस्था को उन्नत बनाने में लगा है। वर्तमान में यू.एन.आई. द्वारा प्रदान की जा रही प्रमुख सेवाएॅं है। वायर सर्विस, यू.एन.आई. सामान्य सर्विस, यू.एन.आई. विदेश सेवा, यू.एन.आई. वित्तीय सेवा, यू.एन.आई. बैंकिंग सेवा, यू.एन.आई. स्टाॅक एक्सचेंज सेवा, यू.एन.आई. भाषा सेवा (यूनिवार्ता), यू.एन.आई. वल्र्ड टी.वी. समाचार सेवा (न्छप्ैब्।छ) और उर्दु सेवा इत्यादि।

मेलर सर्विसः- इसके तहत यू.एन.आई. बेक ग्राउंडर सर्विस साप्ताहिक रूप में, साप्ताहिक यू.एन.आई. कृषि सेवा, सप्ताह मंे दो बार यू.एन.आई. एनर्जी सेवा और साप्ताहिक आर्थिक सेवा आदि शामिल है। अपनी पुस्तक डायनामिक्स आॅफ माॅस कम्यूनिकेशन से जोसेफ आर. डोमेनिक ने कहा, अगली बार  जब आप अपने स्थानीय समाचार पत्र को पढ़ रहे हो तो आप जरूर ध्यान देना कई समाचारों की डेट लाईन में आपको स्त्रोत के रूप में ए.पी.या यू.पी.आई. का नाम मिलेगा। ए.पी. एसोशिएटेड प्रेस का संक्षिप्त रूप है और यू.पी.आई. यूनाईटेड प्रेस इंटरनेशनल का संक्षिप्त रूप से इन दोनों संस्थाओं को वायर सेवा कहा जाता है और ये आपको आपके स्थानीय समुदाय से बाहर की दुनिया में जो कुछ  भी चल रहा है उससे संबंधित सारे समाचार उपलब्ध कराते है। ये वायर सेवाएॅं स्थानीय समाचार पत्रों और प्रसारण केन्द्रों के लिए आंख और कान का काम करती है जो पूरे देश में अपने संवाददाताओं को खर्च वहन करने में सक्षम नहीं है। वायर सेवाएॅं इंटरनेट के माध्यम से कार्य करने के लिए अपनी सामग्रियों को नई तकनीक के माध्यम से इंटरनेट पर व्यवस्थित कर रही है जो अब सेटेलाईट  के माध्यम से प्रसारित किया जाता है। शोर करने वाले टाईपराईटर और टेली टाईप्स की जगह कम्प्यूटर ले चुका है और यह कई अन्य दूसरें कम्प्यूटर सजालों से जुड़ा है जो टेली टैक्सट सेवा उपलब्ध कराती है।
हिन्दुस्तान समाचार भारत की एक प्रमुख बहुभाषी समाचार संस्था है। इसकी स्थापना सन् १९४८ में दादा साहेब आप्टे ने की थी। इस समय यह भारत की प्रमुख समाचार संस्था बन चुकी है और हिन्दीमराठीगुजरातीअसमियाओड़ियाकन्नडबांग्लासिन्धी और नेपाली आदि कई भाषाओं में समाचार उपलब्ध कराती है। इस दृष्टि से यह संस्था भारतीय भाषाओं की आवाज है।
१५० से अधिक समाचारपत्र इस संस्था के समाचार के ग्राहक हैं। सभी राज्यों की राजधानियों एवं भारत के प्रमुख शहरों में इसके ब्यूरों हैं।


भारत के मान्य प्रेस संगठन

प्रेस परिषद्: नई दिल्ली में कुछ वर्ष पहले प्रेस काउंसिल पर तीसरा अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित हुआ था। सम्मेलन में यह निर्णय हुआ कि प्रेस परिषदों को एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन बनाया जाए।  भारत और स्वीडन ने मतदान से अलग रहना स्वीकार किया यद्यपि इन्होंने इस प्रस्ताव को अनुमोदित भी नहीं किया था। स्वीडन ने इस आधार पर मतदान से दूर रहने का फैसला किया कि टीम के सदस्यों के पास मतदान करने का अधिकार था ही नहीं। जबकि भारत ने दूसरे कारणों से मतदान से खुद को अलग रखा। भारतीय प्रेस परिषद ने यह महसूस किया कि एक औपचारिक संगठन से एक अनौपचारिक संगठन ही बेहतर है। इस कारण से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सव्रमान्य आचार संहिता बनाने को प्रसताव वापस ले लिया गया तथा इसके बदले सदस्य देशों से कहा गया कि वे अपने स्वयं के नियम बनाएं।
सर्वप्रथम प्रेस काउंसिल की स्थापना स्वीडन में 1916 ई. में की गई थी जिसे कोर्ट आॅफ आॅनर के नाम से जाना जाता था। आज 40 से अधिक देशों में प्रेस परिषदों की स्थापना की जा चुकी है। इटली और हाॅलैंड को छोड़कर, इन सभी देशों में प्रेस परिषदो की स्थापना स्वैच्छिक रूप से हुई। एक देश से दूसरे देश के प्रेस परिषद् की कार्यप्रणाली में बहुत सारे अंतर होते है। सन् 1953 में ब्रिटेन में प्रेस परिषद् अस्तित्व में आया और इसने कई दूसरे देशों के लिए एक माॅडल का काम किया। भारत में यह स्वायत्त, गैर सरकारी परंतु एक वैधानिक निकाय है। प्रथम प्रेस आयोग ने 1954 ई. में एक वैधानिक प्रेस परिषद् के गठन का प्रस्ताव दिया था जो कि समाचार पत्रों की संपादकीय स्वतंत्रता की देखरेख कर सके। समाचारों की वस्तुनिष्ठता, प्रस्तुति और आलोचनाओं के स्वच्छता की जांच कर सके।



प्रेस आयोग के अनुसार यह प्रेस काउंसिल भारत में प्रेस के विकास को प्रोत्साहित करेगा और बाहरी दबाव से इसे संरक्षण प्रदान करेगा एवं प्रेस के कार्य-व्यवहार तथा चरित्र को नियमित करेगा। इन संस्तुतियों के आलोक में भारत सरकार द्वारा प्रेस परिषद् का गठन प्रेस परिषद् अधिनियम 1965 के तहत सन् 1966 में किया गया। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति जे. आर. मधोलकर को इसका प्रथम अध्यक्ष बनाया गया। बाद में प्रेस परिषद् अधिनियम को संशोधित किया गया। प्रथम अध्यक्ष न्यायमूर्ति मधोलकर के बाद परिषद् की कमान न्यायमूर्ति एन. राजागोपाल अयंगर के हाथों में आ गई। परिषद् के पुनर्गठन के बाद, न्यायमूर्ति ए. एन. ग्रोवर, न्यायमूर्ति ए. एन. सेन, न्यायमूर्ति आर. एस. सरकारिया, न्यायमूर्ति पी. बी. सावंत जैसे कई प्रख्यात नाम प्रेस परिषद् के साथ अध्यक्ष के रूप में जुड़े। परिषद् के वर्तमान अध्यक्ष न्यायमूर्ति मार्कण्डेय काटजू है। आंतरिक आपातकाल के दौरान 31 दिसंबर 1975 को प्रेस परिषद् को भंग कर दिया गया और प्रेस परिषद् अधिनियम को रद्द कर दिया गया। इसे रद्द करते हुए यह कहा गया कि परिषद् अपने कार्यों को प्रभावशाली तरीके से करने में सक्षम साबित नहीं हुई है, जिससे यह अपने स्थापना के उद्देश्यों को प्राप्त कर सके। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने अपने 1975-76 की वार्षिक रिपोर्ट में कहा कि अपने 9 वर्षो के अस्तित्व के दौरान परिषद् उन प्रवृतियों पर अंकुश लगाने में असफल रही है और प्रेस के उत्तेजक एवं अनियंत्रित लेखन को नियंत्रित नहीं कर सकी है। यह संपादको के लिए आचरण के नियम बनाने में भी असमर्थ रही है और इसने छोटी-छोटी शिकायतों पर अपना ध्यान केन्द्रित किया है। इस प्रकार से 31 दिसंबर 1975 को कार्यकाल समाप्ति के बाद 1 जनवरी 1976 को परिषद् को भंग कर दिया गया। सन् 1978 में प्रेस परिषद् के गठन के लिए नई सरकार ने एक नया विधेयक पारित किया जो 1 मार्च 1979 को लागू हुआ। पुनर्गठित प्रेस परषिद् के उद्देश्य थे-ः
प्रेस की स्वतंत्रता का संरक्षण करना।


देश में समाचार पत्रों एवं समाचार समितियों की गुणवत्ता एवं स्तर में सुधार लाना।
प्रेस परिषद् का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है प्राप्त शिकायतों की जांच करना और समाचार पत्रों, समाचार समितियों और पत्रकारों के लिए उच्च मापदंडो वाली आचार संहिता का निर्माण करना।
कार्यकाल: प्रेस परिषद् के सदस्यों का कार्यकाल 3 वर्षों का होता है और तीन वर्षो के बाद परिषद् में नए सदस्य नियुक्त किए जाते है।
प्रेस परिषद् की संरचना:
                       कुल सदस्य-ः 28।
                           अध्यक्ष-ः 01।
अध्यक्ष का मनोनयन एक समिति के द्वारा किया जाता है जिसमें राज्यसभा के उपसभापति, लोकसभा के अध्यक्ष और परिषद् के सदस्यों का एक निर्वाचित प्रतिनिधि शामिल होता है। परिषद् का अध्यक्ष उच्चतम न्यायालय का सेवानिवृत्त न्यायाधीश ही होता है। परिषद् के 28 सदस्यों में-
विभिन्न समाचार पत्रों के संपादक 06
संपादक के अलावा श्रमजीवी पत्रकार 07
बड़े, मध्यम एवं छोटे समाचार पत्रों के प्रबंधन के प्रतिनिधि 06
समाचार समितियों के प्रतिनिधि 01
अध्यक्ष द्वारा मनोनित संसद सदस्य (3 लोकसभा एवं 2 राज्यसभा से) 05
विभिन्न विशिष्ट क्षेत्रों से जुड़े प्रख्यात एवं विषय विशेषज्ञ
अ. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा नामित विज्ञान या शिक्षा से जुड़ी हस्ती।
ब. बार काउंसिल आॅफ इंडिया द्वारा नामित कानून या साहित्य विशेषज्ञ।
स. साहित्य अकादमी द्वारा नामित संस्कृति से जुड़ी हस्ती। 03

प्रेस परिषद् अधिनियम के अनुसार, परिषद् को अपने कार्यों के संपादन एवं शिकायतो की जांच करने के लिए भारत की दीवानी अदालतांे के ही समान अधिकार एवं शक्तियां सिविल प्रोसिजर कोड 1908 के अनुरूप प्राप्त है। इस प्रकार से परिषद् किसी भी व्यक्ति को सम्मन जारी कर सकता है, उसको अपने समक्ष उपस्थित होने का आदेश दे सकता है, किसी व्यक्ति या संस्था से घोषणापत्र भरवा सकता है, किसी व्यक्ति या संगठन से दस्तावेजोें की मांग कर सकता है, सार्वजनिक दस्तावेजों की किसी सरकारी कार्यालय या न्यायालय से मांग कर सकता है, किसी भी व्यक्ति या संगठन के दस्तावेज की जांच कर सकता है और कुछ भी ऐसा कर सकता है  जो अधिनियम में वर्णित है। यद्यपि इस अधिनियम के अंतर्गत पत्रकारों को अपने सूचना स्रोत को प्रकट करने से संरक्षण  प्राप्त है। अपनी पुस्तक जर्नलिस्ट हैंडबुक में एम. वी. कामथ लिखते हैं कि यह याद रखना बहुत ही महत्वपूर्ण है कि प्रेस परिषद् कोई न्यायालय नहीं है। इसके फैसले न्यायिक घोषणा की श्रेणी में नहीं आते है इसलिए नियम विरूद्ध कार्य करने वाले किसी पत्रकार या समाचार पत्र को दंडित करने का प्रश्न ही नहीं उठता है। ठीक उसी तरह से परिषद् किसी भी पीड़ित व्यक्ति को हर्जाना भी नहीं दे सकता। जैसा कि न्यायमूर्ति मधोलकर ने कहा कि परिषद् का एकमात्र हथियार इसका नैतिक प्रभाव है। इसकी संपूर्ण ताकत अंतरात्मा और विवके पर टिकी है। परिषद् में कोई भी व्यक्ति किसी भी समाचार पत्र या फिर पत्रकार के खिलाफ शिकायत दर्ज करा सकता है। हालांकि परिषद् किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा दर्ज कराएं गए शिकायतों पर ही निर्भर नहीं है बल्कि यह किसी भी मामले पर स्व विवेक के आधार पर स्वतः संज्ञान ले सकता है। यहां यह भी जरूरी नहीं कि शिकायतकर्ता का शिकायत से किसी प्रकार का व्यक्तिगत हित जुड़ा होना चाहिए। शिकायतकर्ता को अगर यह लगता है और यह मानने के पर्याप्त कारण है कि किसी समाचार पत्र ने पत्रकारिता आचार संहिता के मानदंडों का उल्लंघन किया है या जनरूचि का तिरस्कार किया है।



या फिर किसी संपादक या श्रमजीवी पत्रकार ने कोई गलत व्यवसायिक आचरण किया है या पत्रकारिता की आचार संहिता को तोड़ा है तो वह शिकायत दर्ज करा सकता है।

प्रेस परिषद के उद्देश्य एवं कार्य:
प्रेस परिषद के प्रमुख उद्देश्यों की चर्चा करना यहां प्रासंगिक होगा। इसमें से सबसे महत्वपूर्ण है कि परिषद् प्रेस की स्वतंत्रता का संरक्षण एवं उसकी रक्षा करेगा और भारत में समाचार पत्र एवं समाचार समितियों की गुणवत्ता एवं उनके स्तर में सुधार करेगा।
समाचार पत्रों एवं समाचार समितियों को अपनी स्वतंत्रता को कायम रखने में हर संभव सहायता प्रदान करना।
उच्च व्यवसायिक गुणवत्ता एवं स्तर के अनुरूप समाचार पत्रों, समाचार समितियों एवं पत्रकारों के लिए आचार संहिता का निर्माण करना।
यह सुनिश्चित करना कि समाचार पत्र, समाचार समिति एवं पत्रकार जनरूचि के उच्चतर स्तर के अनुरूप कार्य कर रहे है या नहीं। नागरिक एवं नागरिकता के अधिकार एवं दायित्वों के पालन की प्रवृति एवं भावना को प्रोत्साहित करना।
पत्रकारिता के व्यवसाय से जुड़े सभी लोगों के बीच दायित्वबोध एवं जनसेवा की भावना को बढ़ाना।

भाषाई प्रेस और राष्ट्रीय विकास

बीसवीं सदी के अंत में, भारत में भाषाई प्रेस का विकास देश की धनी भाषाई और सांस्कृतिक विरासत की विविधता एवं अनेकता को प्रदर्शित करता है। भारतीय संविधान में 19 अधिकारिक भाषाएं होने के साथ ही 1971 की जनगणना भारत के सांस्कृतिक प्रचुरता एवं विविधता को अभिव्यक्त करती है। आधुनिक जनमाध्यमों में और साथ ही पारंपरिक संचार में भी विविध भाषाओं की उपलब्धता फायदेमंद है। इंटरनेशनल कमिशन फाॅर दी स्टडी आॅफ कम्यूनिकेशन प्राॅब्लमस जिसे मेनी वायसेज वन वल्र्ड के नाम से भी जाना जाता है, ने 16 ऐसी भाषाओं को अपनी सूची में शामिल किया जिसे 50 मिलियन से ज्यादा लोग बोलते है। इनमें से पांच ऐसी भाषाएं है जिनमें भारत में समाचारपत्र प्रकाशित किए जाते है। ये पांच भाषाएं है-हिंदी, बंगाली, उर्दू, तेलगू तथा तमिल। जिला केन्द्रों से निकलने वाले छोटे समाचारपत्र और जिनका जमीनी स्तर पर संबंध होता है, ज्यादातर हिंदी और भारतीय भाषाओं में प्रकाशित होते है। भारतीय प्रेस का एक दूसरा महत्वपूर्ण अनुभाग है। इन समाचारपत्रों की आकांक्षा और मांग सुस्पष्ट होती है और ये अपने पाठको की कठिनाइयों और समस्याओं से जुड़े रहते है। इस प्रकार से ये पाठक के साथ मजबूत भावनात्मक संबंध बनाते है। भारतीय भाषाई पत्रकारिता ने केवल देश में पत्रकारिता के विकास एवं उत्थान में ही महती भूमिका नहीं अदा की है बल्कि स्वतंत्रता संग्राम में भी अभूतपूर्व भूमिका निभाई। उन्नीसवीं सदी के प्रारंभिक दशकों में स्वयं को सामाजिक सुधारों एवं उस समय की धार्मिक समस्याओं से भी जोड़ा।


भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में महात्मा गाांधी के आगमन के बाद और उनके असहयोग आंदोलन को भी भाषाई प्रेस ने अपना नैतिक समर्थन प्रदान कर मजबूत बनाने का कार्य किया। अपनी पुस्तक जर्नलिज्म इन इंडिया में रंगास्वामी पार्थसारथी ने भाषाई पत्रकारिता के गौरवपूर्ण योगदान को रेखांकित करते हुए लिखा है कि बगैर किसी साधन के या कम साधनों में लगभग तीन दशकों तक विदेशी शासकों के प्रतिबंधों, प्रताड़ना और अत्याचारों के बीच उन्होंने अपने अस्तित्व को बचाएं रखा और बहुत सारे ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अपने न्यून जीवन एक ऐतिहासिक अध्याय को लिखा और नष्ट हो गए। जिन्होंने इन पत्रों को संचालित किया या इसके साथ जुड़े हुए थे, उन्होंने देशभक्ति, साहस और बलिदान की एक मिशाल कायम की। वे एक निश्चित कारण के लिए पूर्णतः समर्पित थे और कोई भी बाधा उन्हें इस मिशन को पूरा करने से नहीं रोक सकती थी। उन्हें हानि भी उठानी पड़ी और दरिद्रता में भी जीना पड़ा। कई को भयानक कैद से गुजरना पड़ा और इतनी कुर्बानी से जीती जंग के फायदे लेने के लिए आज वो हमारे साथ नहीं है परंतु उनकी आत्मा इसी लड़ाई के मैदान के आस-पास भटकती होगी जहां उन्होंने अपनी शहादत दी, हमे खुशी देने के लिए। स्वतंत्रता संग्राम में हिंदी और उर्दू पत्रकारिता का अवदान और जनता में राजनीतिक जागरूकता के प्रसार में उनकी भूमिका अविस्मरणीय है।

पूर्व और उत्तर-पूर्व के भाषाई प्रेस की एक अनुपम विशेषता थी कि ये त्योहारो और खासतौर पर दुर्गापूजा, रंगोली और बिहू के अवसर पर अपने विशेष अंक प्रकाशित करते थे। बंगाली, उड़िया और असमिया प्रेस की यह खास विशेषता थी। ये विशेष अंक बड़ी संख्या में निकाले जाते थे जिनमें लघु कथाएं, कविताएं, सृजनात्मक लेख और उपन्यास प्रकाशित होते है। ये समाचारपत्र पाठकों को उत्कृष्ट कोटि के साहित्यिक एवं सांस्कृतिक सौंदर्यबोध से रूबरू कराते और उनके विचारों को परिष्कृत करते थे। भाषाई प्रेस के उड़ीसा में अवदान की चर्चा करते हुए भट्ट ने लिखा कि उड़ीसा के विकास एवं खासतौर पर इसके सांस्कृतिक पुनर्निमाण में पत्रकारिता ने महती भूमिका निभाई। प्रेस ने साहित्य को कुलिन वर्गो से आम जन के बीच पहुंचाया और इसका परिणाम सभी के सामने स्पष्ट है कि उड़ीया साहित्य ने अपनी कविताओं एवं दूसरी साहित्यिक कृतियों के लिए प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त किया। उड़ीसा का प्रजामित्र समूह अपने अंग्रेजी साप्ताहिक दी ईस्टर्न टाइम्स और अपने मासिक झंकार में गुणवत्तापूर्ण साहित्यिक सामग्री प्रकाशित की एवं वह पुरस्कृत लेखकों को इसके लिए पुरस्कार प्रदान करती थी।

दक्षिण भारत का भाषाई प्रेस का इतिहास भी बहुत ही उज्जवल एवं आकर्षक रहा है। कुछ समाचारपत्रों और खासतौर पर आंध्रप्रदेश का ईनाडु तथा केरल में मलयाला मनोरमा ने विविधतापूर्ण पत्रकारिता की एक नई विधा का सूत्रपात किया। तेलगू दैनिक ईनाडु का प्रकाशन सन् 1974 में विशाखापट्टनम से प्रारंभ किया गया और बाद में हैदराबाद से तथा उसके बाद आंध्रप्रदेश के प्रत्येक जिले से इसके संस्करण प्रकाशित होने लगे। क्रमशः इसका प्रसार 4 लाख की सीमा को पार कर गया। जनता की सूचना प्राप्ति की बढ़ती मांग ने ईनाडु की सफलता का मार्ग प्रशस्त किया। ईनाडु के संस्थापक रामोजी राव ने 1983 में एन टी रामाराव की तेलगूदेशम पार्टी के विजय में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। इस समाचारपत्र ने अपने दायरे को और अधिक विस्तृत करते हुए अपना स्वयं का क्षेत्रिय टेलीविजन चैनल प्रारंभ किया और हैदराबाद से अंग्रेजी दैनिक न्यूजटाइम्स की प्रकाशन में सहायता की। कुछ अन्य भारतीय भाषाई समाचारपत्रों ने भी आर्थि विकास के विविध आयामों के सृजन, समाजिक जागरूकता एवं सांस्कृतिक नवोत्थान में महत्वपूर्ण एवं निर्णायक भूमिका का निर्वहन किया। यहां पर भारतीय भाषाई प्रेस के विकास पर एक संक्षिप्त चर्चा प्रस्तुत की गई है जिसके बारे में बीबीसी के प्रख्यात पत्रकार मार्क टुली ने अपनी पुस्तक राज टू राजीव में 1989 में लिखा कि एक तरफ जहां भारतीय प्रेस तीसरी दुनिया का सबसे अधिक स्वतंत्र एवं  जीवंत प्रेस है। यह सरकार पर हमेशा ही पैनी नजर रखें रहती है जो लोकतंत्र के लिए अनिवार्य है और अगर भारत में लोकतंत्र को अस्तित्व में रहना है तो भी।





पिछले 15 वर्षों में भारत में अंग्रेजी एवं भाषाई समाचारपत्रों एवं पत्रिकाओं की बाढ़ सी आ गई है और पत्रकारिता बहुत अधिक सशक्त हुई है। देश के प्रत्येक भाग के लाखों लोगों तक पहुंचने के भाषाई प्रेस सबसे महत्वपूर्ण साधन है। यह जमीनी स्तर पर आम जनता योजनाकारों और प्रशासकों के बीच संबंध की एक महत्वपूर्ण कड़ी है और यह साक्षरता के प्रचार-प्रसार, सामाजिक जागरूकता एवं विकास का एक व्यवहारिक माध्यम है। यद्यपि यह बड़े ही स्पष्ट तौर पर कहा जा सकता है कि भाषाई प्रेस अपने अस्तित्व के संघर्ष में कभी-कभी सत्यता और उत्तरदायित्व, वस्तुनिष्ठता एवं निष्पक्षता जैसे पत्रकारिता के मूल्यों से विमुख हो जाता है। विकास और साक्षरता से जुड़ी हुई खबरें दूर-दूर तक उनके दिमाग में नहीं होती है। उनका मूल उद्देश्य अपनी बिक्री बढ़ाना होता है। इन समाचारपत्रों की सामग्री और प्रस्तुति में मनोरंजन, नकारात्मक समाचारों, हिंसा से परिपूर्ण खबरों, चोरी, राजनीतिक अस्थिरता और घोटाले को ज्यादा तरजीह दी जाती है। इसमें कोई शक नहीं कि इस प्रकार के समाचारों को भी बड़े स्तर पर प्रसारित किया जाना चाहिए परंतु मानव जीवन एवं समाज के सकारात्मक पहलुओं से संबंधित समाचारों का कवरेज भी जरूर होना चाहिए।

भाषाई प्रेस की समस्याएं:

भाषाई प्रेस को कुलिन वर्ग एवं सरकार द्वारा मात्र उपेक्षित ही नहीं किया गया बल्कि तिरस्कृत भी किया गया। ऐसा प्रतीत होता है कि भाषाई प्रेस को अंग्रेजी और राष्ट्रीय दैनिकों के साथ भारतीय प्रेस का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनने के लिए लगातार कई वर्षों तक सतत् संघर्ष करना पड़ा। भाषाई प्रेस की रिपोर्टिंग एवं कवरेज के दौरान कई ऐसी समस्याएं प्रकट होती है क्योंिक उनका मुख्य सरोकार स्थानीय होता है और कुछ हद तक क्षेत्रिय और राष्ट्रीय। ऐसे में छोटे लक्षित पाठक समूह, आर्थिक समस्याएं, सूचनाओं की उपलब्धता एवं उनकी प्रामाणिकता, संरचनात्मक सुविधाएं, जोखिम और भय वह भी खासतौर पर जाति, धर्म समुदाय एवं गुटबाजी के कारण इनको कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। भाषाई प्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती है, उन उच्च वर्गीय पाठकों को विकासात्मक मुद्दों के प्रति संवेदनशील बनाना जो भारतीय जनता को प्रभावित करते है। जिसका अधिकांश भाग अब भी गांवों में निवास करता है। विकासात्मक योजनाओं पर अपना ध्यान केन्द्रित कर के भाषाई प्रेस के द्वारा निरक्षरता, गरीबी और खराब स्वास्थ्य का संबंध आसानी से तोड़ा जा सकता है। स्वयंसेवी संगठनों को प्रोत्साहित कर के विकास एवं कल्याणकारी योजनाओं पर से प्रशासनिक बंधनों की गांठ को खोला जा सकता है। ऐसा देखा गया है कि भाषाई प्रेस में काम करने वाले पत्रकारों में इस बहुआयामी जिम्मेदारी को निभाने के लिए आवश्यक प्रशिक्षण का आभाव पाया जाता है।



ऐसे में अगर भाषा संस्थानों एवं कृषि संस्थानों के द्वारा इनके प्रशिक्षण के लिए प्रशिक्षण पाठ्यक्रम चलाएं जाएं तो भाषा संबंधी इन कमियों को आसानी से दूर किया जा सकता है। भाषाई प्रेस पोषण, स्वास्थ्य और स्वास्थ्य विज्ञान संबंधी शिक्षा, परिवार नियोजन, साक्षरता, उन्नत कृषि और अन्य विकास संबंधी योजनाओं के प्रसार का सबसे सशक्त एवं बेहतर माध्यम है। इस प्रकार यह अत्यंत ही महत्वपूर्ण है कि भाषाई प्रेस के अस्तित्व एवं विकास हेतु विविध उपाय किए जाने चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण है कि भाषाई प्रेस को भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल बनाया जाएं। वर्तमान में इसमें न तो भारतीय संस्कृति के विविध पहलुओं के दर्शन होते है और न ही ग्रामीण जनता और परित्यक्त जनों की आवाज को प्रतिनिधित्व मिल पाता है। आज ये वक्त की आवश्यकता है कि इसके द्वारा प्रकाशित सामग्रियों में  एक शिल्पकार की जीवनी, एक किसान के सफलता की कहानी, अशिक्षित महिलाएं, साक्षरता से जुड़े कर्मियों, कृषि उत्पादों के विपणन में होने वाली समस्याओं, सामाजिक अंधविश्वासों और कुप्रथाओं, आर्थिक वृद्धि और उत्पदकता जैसे विषयों को शामिल किया जाना चाहिए। इस प्रकार का भाषाई प्रेस भारतीय जनता के वास्तविक जीवन आईना नहीं हो सकता और न ही उनका सही चित्रण कर सकता है। भाषाई प्रेस को समाज के विविध आयामों को स्थान देना चाहिए और योजनाकारों एवं नीति नियंताओं को साक्षरता एवं विकास के माध्यम से जनता के जीवन स्तर को सुधारने के लिए मार्ग सुझाना चाहिए। अब वक्त आ गया है कि जब भाषाई प्रेस को सूचना केन्द्र की भूमिका को ग्रहण करना चाहिए और सरकार की विभिन्न योजनाओं, नियमों, प्रोजेक्ट, मौसम पूर्वनुमान की रिपोर्ट और ऋण, साख, बीज, उवर्रक, नए विकास प्रोजेक्ट और सूदूर क्षेत्र में सड़क और पुल के निर्माण से संबंधित मसलों को स्थान देना चािहए।

विकास एवं साक्षरता के लिए भाषाई प्रेस को प्रोत्साहन:

कुछ महत्वपूर्ण नीतियां एवं उपचारात्मक उपाय निम्नांकित है जो भाषाई प्रेस के अस्तित्व एवं उत्थान में सहायक साबित हो सकते हैं-
स्थानीय समाचार पत्रों को सरकारी प्रेस में सरकारी दर पर मुद्रण की अनुमति प्रदान की जाएं।
बड़े समाचार पत्रों की ही तरह से भाषाई पत्रों के संपादको को निःशुल्क बस एवं रेलवे पास की सुविधा उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
भाषाई समाचार पत्रों के पत्रकारों को निःशुल्क बीमा एवं न्यायिक संरक्षण उपलब्ध कराया जाना चाहिए। उनके लिए उचित पुलिस संरक्षण की भी व्यवस्था की जानी चाहिए।
इन समाचार पत्रों को कागज का कोटा सरकार को रियायती दर पर उपलब्ध कराना चाहिए।
दूसरे अन्य कुटिर उद्योगों की ही तरह से इनको सरकार की विभिन्न योजनाओं के तहत ऋण उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
विभिन्न सरकारी विभागों, बैंको, सार्वजनिक क्षेत्र के निकायों के विज्ञापन डी. पी. आर. ओ. के माध्यम से दिए जाने चाहिए, जिसको समुचित ढ़ंग से एवं अनुपातिक तरीके से स्थानीय प्रेस के बीच वितरीत किया जाना चाहिए।
स्थानीय प्रशासन के द्वारा स्थानीय समाचार पत्रों को हतोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए बल्कि उनके कवरेज को समुचित महत्व दिया जाना चाहिए। उनको प्रोत्साहित करना और समय-समय पर वर्कशाॅप, कैंप आयोजित करने के लिए उन्हें सकारात्मक निर्देश देना चाहिए।
यह भाषाई प्रेस का प्रयास होना चाहिए कि वह भारतीय समाज व्यवस्था में अंतर्गत कार्यरत विभागों एवं संगठनों से स्वयं को जोड़ सके।
भाषाई प्रेस को स्थानीय निकायो जैसे ग्राम पंचायत, प्रखंड आदि से स्वयं को जोड़ना चाहिए और नजदीकी संबंध स्थापित करना चाहिए, साथ ही उसको ग्रामीण क्षेत्र के मत निर्माताओं से संबंध बनाना चाहिए जिससे भारतीय परिस्थितियों में विकास को प्रोत्साहित किया जा सके।
भारतीय भाषा प्रेस आयोग की स्थापना की जानी चाहिए जो भाषाई प्रेस की संपूण्र कार्यप्रणाली को देख और समझ सके तथा कुछ मूर्त संस्तुतियां प्रदान कर सके।
भाषाई प्रेस का लक्ष्य समुदाय की सेवा एवं उसका विकास होना चाहिए और इसे समकालिन समाज के वास्तविक जीवन का आईना बनना चाहिए। इसे सरकार और नीति नियंताओ के लिए जनता का फीडबैक प्राप्त करने का वास्तविक स्रोत बनना चाहिए लेकिन एक ही साथ अगर हम भाषाई प्रेस से इतनी अपेक्षाएं पालते है तो प्रेस की भी यह अपेक्षा होती है कि सरकार एवं जनता से उसको बृहत स्तर पर  सहयोग मिलना चाहिए।

स्वतंत्रता संग्राम और भारतीय प्रेस

भारतीय स्वाधीनता संग्राम को मजबूत बनाने और इसको पुरजोर समर्थन प्रदान करने में भारतीय प्रेस की भूमिका इसके उद्भव एवं विकास के इतिहास का एक गौरवशाली अध्याय है। सन् 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना ने भारतीय जनता की राष्ट्रवादी आकांक्षाओं को आगे और अधिक बल प्रदान किया। कांग्रेस के महत्वपूर्ण सदस्य या तो प्रखर पत्रकार थे या फिर समाचारपत्रों के संपादक। इसमें दादा भाई नौरोजी, जस्टिस रानाडे, नरेन्द्रनाथ सेन जैसे महानतम् व्यक्तित्व शामिल थे। भारतीय भाषाई प्रेस सरकार के खिलाफ अपने विचारों को अभिव्यक्त करने के मामले में सबसे आगे था। भाषाई प्रेस नेे सामाजिक सुधारों को भी प्राथमिकता के आधार पर प्रोत्साहित किया।
भारत के सभी महानतम् समाज सुधारकों, नेताओं और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने अपने विचारों एवं मुद्दों को उठाने के लिए प्रेस का सहारा लिया। इनमे से कुछ प्रमुख थे- अरविंदो घोष, एनी बेसेंट, लाजपत राय, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी, बालगंगाधर तिलक और महात्मा गांधी। तिलक ने प्रेस के माध्यम से देश की स्वतंत्रता के संघर्ष को आगे बढ़ाने का कार्य किया। उन्होंने मराठी साप्ताहिक केसरी और अंग्रेजी साप्ताहिक मराठा के माध्यम से जनता को जागरूक एवं शिक्षित बनाने के लिए सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक मसलों पर जमकर लिखा। तिलक ने पत्रकारिता का प्रयोग लोकप्रिय शिक्षा एवं जन आंदोलन के लिए किया।




गांधी-एक महान् संचारक एवं पत्रकार:
भारतीय राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम में गांधी जी के आगमन ने भारतीय इतिहास के संपूर्ण चरित्र को ही बदल दिया। उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन को एक नई दिशा दी और इसके स्वरूप को परिवर्तित किया साथ ही विभिन्न मुद्दों पर जनता के मत को प्रभावित किया। चलपति राव के अनुसार गांधीजी संभवतः सर्वकालिक महानतम् पत्रकार थे और जिन साप्ताहिकों को उन्होंने प्रारंभ किया या संपादित किया वे साप्ताहिक दुनिया में ज्ञात महानतम् साप्ताहिक समाचारपत्र थे। उन्होंने विज्ञापन प्रकाशित नहीं किए परंतु वह यह भी नहीं चाहते थे कि उनका अखबार घाटे में चले। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में पर्याप्त अनुभव अर्जित किए, जहां उन्होंने 1904 ई. में इंडियन ओपिनियन का संपादकत्व ग्रहण किया और इसे अंग्रेजी, तमिल और गुजराती में प्रकाशित कराया। यंग इंडिया और हरिजन, प्रत्येक विषय पर उनके विचारों की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बना। वह बहुत ही सामान्य, स्पष्ट लेकिन प्रभावशाली तरीके से लिखते थे। जैसा कि उन्होंने कहा कि समाचारपत्र का पहला महत्वपूर्ण उद्देश्य हैं कि वह लोकप्रिय भावनाओं को समझे और उसे अभिव्यक्ति दे। दूसरा कि वह जनता के बीच कुछ वांछनीय भावनाओं का उद्रेक करें और तीसरा कि वह बिना किसी भय के कमियों को उजागर करें। हालांकि गांधीजी के समाचारपत्रों ने कोई भी विज्ञापन प्रकाशित नहीं किया फिर भी उनका प्रसार बहुत अधिक था। पत्रकारिता के प्रति उनका दृष्टिकोण था कि यह महत्वांकांक्षाओं से परे होनी चाहिए। उनके लिए पत्रकारिता जीविका कमाने का पेशा नहीं है, यह जनता की सेवा करने का एक माध्यम है। यंग इंडिया में उन्होंने 2 जुलाई 1925 में लिखा कि मैने पत्रकारिता को उसकी वजह से नहीं अपनाया बल्कि एक सहायक के रूप में अपनाया जो मेरे जीवन के लक्ष्यों की प्राप्ति मे सहायक बन सकें। मेरा मिशन है उदाहरणों के माध्यम से लोगों को शिक्षित करना और कठिनतम परिस्थितियों में भी सत्याग्रह रूपी शस्त्र का प्रयोग करना जो अहिंसा का प्रत्यक्ष सहयोगी है।



इसी कारण मैं न तो कभी क्रोध में लिखता हूं और न ही किसी दुर्भावना के साथ और न मैं मात्र लोगों की भावनाओं को उद्वेलित करने के लिए लिखता हूं। गांधीजी का यह स्पष्ट मानना था कि पत्रकारिता जनता की सेवा का एक माध्यम है जैसा कि उन्होंने अपनी जीवनी में लिखा हैः पत्रकारिता का एकमात्र और अंतिम उद्देश्य जनता की सेवा है। समाचारपत्र एक महानतम् शक्ति है, परंतु जैसे अनियंत्रित जल का प्रवाह अपने किनारे और आस-पास की फसलों को तो नष्ट करता हैं, ठीक उसी प्रकार एक अनियंत्रित कलम विध्वंस का कार्य करती है। अगर नियंत्रण बाहर से लगा होता है तो यह नियंत्रण की हाच से ज्यादा जहरीला होता है। यह तभी फायदेमंद हो सकता है जब नियंत्रण अंदर से ही हो। अगर यह तर्क उचित है तो विश्व के कितने ऐसे समाचारपत्र है जो इस मानदंड पर खड़े उतरते हैं।
महात्मा गांधी एक राष्ट्रीय नेता और समाज सुधारक होने के साथ-साथ एक महान् संचारक भी थे। उनका यह दृढ़ मत था कि संचार जनमत निर्माण एवं जनता को गतिशीन बनाने का सबसे प्रभावशाली उपकरण है। वे सफल हुए क्योंकि उनके अंदर संचार की अंतर्निहित क्षमता थी जो दक्षिण अफ्रीका में वकालत करने के दौरान और अधिक उभर कर बाहर आई। लोगों से संचार और संवाद करने का अभ्यास तो उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में ही प्रारंभ कर दिया था जिसने उनको इतना बल प्रदान किया कि जब वे वापस भारत आएं तो उन्होंने लाखों देशवासियों को संगठित किया। गांधीजी कुल छः पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े थे जिनमें से दो के वे स्वयं संपादक थे। उनका पहला समाचारपत्र इंडियन ओपिनियन दक्षिण अफ्रीका में प्रारंभ हुआ। भारतीयों की समस्याओं और मांगों को अभिव्यक्त करने के लिए तथा जनमत को उन मांगों के पक्ष में संगठित करने के लिए गांधीजी ने समाचारपत्रों को साक्षात्कार देना एवं उनके लिए लिखना प्रारंभ किया।



प्रारंभ में उन्होंने खुले पत्रों और संपादक के नाम पत्र के माध्यम से अपनी मांगों को रखा परंतु उन्हें जल्दी ही इस बात का एहसास हो गया कि कभी-कभार लिखने से उन्होंने जिस राजनीतिक अभियान को प्रारंभ किया है, को कोई विशेष लाभ नहीं मिलनेवाला है साथ ही यह अपर्याप्त भी है। उन्होंने लोगों तक अपनी बात को पहुंचाने के लिए एक मुखपत्र की आवश्यकता का अनुभव किया, इस कारण जून 1903 में इंडियन ओपिनियन की शुरूआत की। इसने एक साप्ताहिक न्यूज लेटर के उद्देश्यों को भी पूरा किया जो भारतीय समुदाय के बीच सप्ताह भर की खबरों को पहुचाता था। एक जनता की शिक्षा का भी एक बंहतर माध्यम साबित हुआ। समाचारपत्र के काॅलम के माध्यम से गांधीजी पाठकों को साफ-सफाई, स्व अनुशासन और अच्छा नागरिक बनने के लिए शिक्षित करते थे।

गांधीजी ने जलियांवाला बाग हत्याकांड एवं राॅलेट एक्ट के खिलाफ सत्याग्रह की शुरूआत की। उन्होंने अपने दक्षिण अफ्रीका प्रवास के दौरान ही यह जाना था कि राजनीति में जनमत और प्रेस की कितनी महत्वपूर्ण भूमिका है और उन्होंने स्वयं प्रयास कर के ही यह सीख लिया था कि लिखित शब्दों को कैसे प्रभावशाली तरीके से लिखा जाएं। यंग इंडिया और नवजीवन को प्रयोग उन्होंने अपने विचारों को अभिव्यक्त करने और जनता को सत्याग्रह के लिए शिक्षित करने के लिए किया। सन् 1933 में गांधीजी ने अंग्रेजी में हरिजन, गुजराती में हरिजनबंधु एवं हिन्दी में हरिजनसेवक की शुरूआत की। ये समाचारपत्र छूआछूत और ग्रामीण क्षेत्रों में फैली गरीबी के खिलाफ उनके अभियान के साधन बनें। यद्यपि इन समाचारपत्रों में कोई विज्ञापन प्रकाशित नहीं होता था परंतु इनका प्रसार बहुत ही व्यापक था। बलिदान एवं अवज्ञा के बारे में उनके विचार ने प्रेस को सत्याग्रह के एक शस्त्र के रूप में उभरने को प्रेरित किया।





वर्तमान में जब चारो तरफ मीडिया पर बाजार की ताकतों के प्रभाव की चर्चा हो रही है और यह खेद जताया जा रहा है कि अब पत्रकारिता समाज सेवा का पेशा नहीं है। गांधीजी ने कहा था कि ऐसा प्रायः माना जाता है कि समाचारपत्र वैसी कोई भी सामग्री प्रकाशित करते है जो उनके पास उपलब्ध होता है, मात्र स्थान को भरने के लिए। इसका कारण यह है कि ज्यादातर अखबारों की नजर लाभ पर टिकी हुई है। पश्चिमी देशों मे ऐसे कई समाचारपत्र हैं जो बकवास से इतने ज्यादा पटे रहते है कि उनको छूना भी पाप की तरह है। ऐसे में वे अलग-अलग परिवारों और समुदायों के बीच कटुता शत्रुता उत्पन्न कर रहे है। इस प्रकार समाचारपत्र मात्र इस आधार पर आलोचना से नहीं बच सकते कि वे लोगों की सेवा का कार्य करते है।

द्वितीय विश्वयुद्ध ने अखबारों के प्रति सरकार के नजरीए में परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया। क्योंकि पहली बार सरकार ने समाचारपत्र संगठनों द्वारा स्व-नियंत्रण लागू करने पर अपनी सहमति प्रदान की, जिससे उस कटुता को नियंत्रित किया जा सके जो सरकार के नियंत्रण के कारण उत्पन्न होती है। समाचारपत्रों के दो महत्वपूर्ण संगठनों की स्थापना की गई जो थे-इंडियन एण्ड ईस्टर्न न्यूजपेपर सोसायटी तथा आॅल इंडिया न्यूजपेपर एडिटर्स कान्फ्रेंस। ए आई एन ई सी की सहायता से एक प्रेस सलाहकार समिति का गठन किया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि प्रेस पर पिछले कुछ वर्षो से जिस प्रकार के प्रतिबंध लागू थे अब वे इन प्रेस नियामक संस्थाओं और अन्य स्वायत्त निकायों के द्वारा सरकार के स्थान पर स्वयं देखें जाने लगे। अगस्त 1947 में भारत स्वतंत्रता अधिनियम के पारित होने के बाद प्रेस की भूमिका पूरी तरह बदल गई। अब उसके कंधो पर राष्ट्र के पुनर्निमाण की महती जिम्मेदारी आ गई। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू प्रेस की स्वतंत्रता के स्वयं बहुत बड़े पौरोकार थे।


भारतीय प्रेस को सशक्त बनाने में पंडित नेहरू की भूमिका एवं महत्व के बारे में एम. चलपति राव ने लिखा कि स्वतंत्रता के बाद के दौर में नेहरू ने प्रेस के बारे में लोगों की विचारधारा के निर्माण में महती भूमिका अदा की, जैसा कि गांधीजी ने स्वतंत्रता के पूर्व किया था। हालांकि प्रेस के एक प्रभावशाली गुट ने उनका विरोध किया लेकिन वे आगे बढ़ते रहे क्योकि वह एक निर्वाचित सरकार के मुखिया थे और जनता के बीच बहुत अधिक लोकप्रिय थे जबकि प्रेस अभी भी समाज के एक छोटे से वर्ग की विचारधारा का प्रतिनिधित्व कर रहा था। उन्होंने हमेशा ही प्रेस के साथ सहिष्णुता स्थापित करने का प्रयास किया और यह स्वीकार किया कि एक सशक्त प्रेस लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण भाग है। ऐसा माना जाता है कि पंडित नेहरू का प्रेस के प्रति हमेशा ही सद्भावपूर्ण रूख रहा क्योंकि वे स्वयं भी एक पत्रकार थे। 
हाल के वर्षो में, भारत में प्रिंट मीडिया ने बहुत ही तेज गति के साथ विकास किया हैं और अब इसकी तुलना विश्व के किसी भी सर्वोत्कृष्ट देश की मीडिया से की जा सकती है। प्रेस की स्वतंत्रता अब हमारा एक मौलिक अधिकार भी है क्योंकि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 क के तहत इसे मान्यता प्रदान की गई है और लोगों ने संविधान प्रदत्त इस अधिकार का निर्बाध प्रयोग किया है। प्रिंट मीडिया ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भी बहुत ही निर्णायक एवं महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। भारत की मुख्यधारा की पत्रकारिता ने मुद्दों पर आधारित अन्वेषनात्मक, व्याख्यात्मक और विकास रिपोर्टिंग में हमेशा ही अग्रणी रहा है।

भारत में प्रिंट मीडिया I


भारतीय पत्रकारिता के उद्भव एवं विकास का इतिहास बहुत ही संर्घषपूर्ण एवं उज्जवल रहा है। भारत में पत्रकारिता, ब्रिटिष राज के लंबे समय से चले आ रहे दमनकारी नीतियों के खिलाफ संघर्ष का एक सह-उत्पाद थी। भारत में पत्रकारिता का उद्भव 1780 में जेम्स आगस्टस हिक्की द्वारा प्रारंभ बंगाल गजट के साथ हुआ। हालांकि जेम्स हिक्की को बाद में भारत छोड़कर वापस जाने के रूप में इसकी कीमत चुकानी पड़ी। बंगाल गजट या कलकत्ता जेनरल एडवरटाइजर को भारत के प्रथम समाचार पत्र होने को इस प्रकार गौरव प्राप्त हुआ। यहां से षुरू होकर भारतीय पत्रकारिता अपने अंतिम दौर यानि स्वतंत्रता संग्राम के दौर में पहुंची। जब भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान तमाम महत्वपूर्ण समाचारपत्रों के प्रेस की मषीने और उनके द्वारा जमा की गई सुरक्षा राषि ब्रिटानी सरकार द्वारा जब्त कर ली गई और उन खिलाफ बहुतेरे दमनकारी कानून लगाएं गए।

भारतीय पत्रकारिता कई महान्तम लोगों द्वारा उनके खून-पसीने से सिंची गई। इनमें से अधिकतर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, समाज सुधारक, बौद्धिक वर्ग और देष का विद्वत समुदाय के लोग थे। उन्होंने भारतीय पत्रकारिता के संरक्षण, संवर्धन एवं विकास के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के कुछ महानतम् प्रणेता जिनमें महात्मा गांधी, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, समाज सुधारक एवं उदारवादी नेता राजा राममोहन राय, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी और गोपाल कृष्ण गोखले आदि थे, ने या तो अपना स्वयं का अखबार प्रारंभ किया या फिर अग्रणी पंक्ति के संपादको में षुमार थे। इस कारण से यह माना जाता है कि भारतीय पत्रकारिता का गहरा संबंध राष्ट्रीय चेतना एवं स्वतंत्रता संग्राम के साथ है।



दूसरे षब्दों मे अगर कहें तो जहां एक ओर भारतीय प्रेस पत्रकारिता ने देष में राष्ट्रीय चेतना को जाग्रत करने में एवं स्वतंत्रता संग्राम को मजबूती प्रदान की वहीं स्वतंत्रता आंदोलन के द्वारा स्वयं भी सिंचित की गई।

भारतीय पत्रकारिता के प्रणेता:
भारत में वर्तमान पत्रकारिता, जिसका प्रारंभ अठारवीं सदी के उत्तरार्ध में हुआ था, ने प्रारंभ से ही सरकार का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया था। सर्वप्रथम कलकत्ता में समाचार-पत्र प्रारंभ करने का प्रयास विलियम बोल्ट नामक एक कंपनी कर्मचारी ने 1776 ई. में किया था। ईस्ट इंडिया कंपनी के अंतर्गत कर्मचारियों के निजी व्यापार पर रोक संबंधी कानून के बाद बोल्ट ने कंपनी की नौकरी से इस्तीफा दे दिया। उसने कंपनी के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करने और अपने हितों की रक्षा करने के लिए समाचार-पत्र प्रकाषन के अनछुएं क्षेत्र में प्रवेष करने का विचार किया। हालांकि कंपनी को उसकी योजना का पूर्व में ही पता लग गया था और समाचार-पत्र प्रारंभ करने के उसके प्रयास को कंपनी ने अस्वीकार कर दिया तथा उसको वापस यूरोप जाने का आदेष जारी किया गया। इस प्रकार भारत में प्रथम समाचार-पत्र के प्रारंभ का प्रयास बिना फलीभूत हुए ही समाप्त हो गया।

भारत में प्रेस का उद्भव:
जेम्स आगस्टस हिक्की ने बंगाल गजट या कलकत्ता जेनरल एडवरटाइजर के प्रारंभ के साथ ही भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में एक नए युग का सूत्रपात किया और 29 जनवरी 1780 को भारत से पहला समाचार-पत्र प्रकाषित हुआ। बंगाल गजट के प्रथम अंक में हिक्की ने अपना परिचय माननीय कंपनी के प्रथम एवं पूर्व मुद्रक के रूप में दिया, हालांकि यह प्रतीत होता है कि कंपनी में उसकी कोई खास अहमियत नहीं थी।



अपने इस साहसिक कार्य के बारे में उसने कहा कि मुझे समाचार-पत्र प्रकाषित करने का न तो कोई खास जूनून है और न ही कुछ नया करने की चाह। और न तो मैं इस कठिन काम की गुलामी भरी जिंदगी के लिए लालायित हूं। परंतु फिर भी आत्मा एवं अपने मष्तिष्क की स्वतंत्रता के लिए अपने षरीर को गुलाम बनाने में मुझे आनंद मिलता है। अखबार ने अपने परिचय एवं नीति को स्वयं ही स्पष्ट किया था-यह एक राजनीतिक एवं वाणिज्यिक समाचार पत्र है, जो सबके लिए खुला है परंतु किसी से प्रभावित नहीं है। यह 12 Û 8 आकार में प्रकाषित होता था जिसमें प्रत्येक तरफ तीन काॅलम होते थे। इसमे प्रकाषित सामग्रियों में अंग्रेजी समाचार-पत्रों से अंत......., मुफस्सिल और स्थानीय पाठकों के पत्र एवं भारत में रहने वाले योरोपियन समुदाय से जुड़े गाॅसिप तथा स्कैंडल प्रमुख होते थे। सभी सामग्रियां रूल्स एवं स्टारर्स से अलग-अलग बांटी गई होती थी। समाचार-पत्र के प्रत्येक में पठनीय सामग्रियों से ज्यादा विज्ञापन होते थे। समाचार भी ज्यादातर व्यक्तियों की निजी जिंदगी से जुड़े होते थे। अखबार में हिक्की स्वयं भी एक काॅलम लिखता था, जिसके माध्यम से वह अपने पाठकों के साथ प्रत्यक्ष संवाद किया करता था। जल्दी ही बंगाल गजट एक विटी और स्कूपलस अखबार में रूप में जाना जाने लगा और गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्ज तथा मुख्य न्यायाधीष सर एलिजा एम्पे या एक प्रकार से पूरे कंपनी प्रषासन की षत्रुता मोल ली। इस प्रकार से मात्र कुछ ही सप्ताहों में हिक्की गजट ने अच्छी-खासी लोकप्रियता अर्जित कर ली। हालांकि जिन व्यक्तियों की अखबार में पोल खोली जाती थी वह तो नाराज होते थे परंतु अन्य सभी लोग खुष होते थे। इसके पाठको में व्यापारी और गैर-षासकीय योरोपियन समुदाय के लोग ज्यादा थे। हिक्की गजट के कुछ प्रमुख नियमित काॅलम थे-पोएटर्स कार्नर, बाॅन-टाॅन और विमेन काॅलम जिसमें फैषन और नए तौर-तरीकों के बारे में ज्यादातर लिखा जाता था।




समाचार-पत्र में प्रकाषित समाचार कभी राजनीतिक, कभी व्यक्तिपरक तो कभी स्थानीय मौसम या फिर इंग्लैंड से आनेवाली किसी खूबसूरत महिला से संबंधित होते थे। साथ ही समाचार पत्र में ब्रिटिष संसद में होने वाले परिचर्चाओं का ब्यौरा और सेना की गतिविधियों एवं षासकों से संबंधित संपादकीय लेख तथा संपादक के नाम पत्र आदि भी जगह पाते थे। ऐसा प्रतीत होता है कि हिक्की को अपने पाठकों की अभिरूचि के बारे में स्पष्ट तौर पर पता था। उसके योरोपियन पाठकों को व्यक्तिगत जीवन से जुड़ी मषालेदार खबरें ज्यादा पसंद थी। ऐसे में हिक्की का मूल जोर ऐसी खबरें परोसना था। उसके अपने अनौपचारिक स्रोत थे जो इस प्रकार की खोजपरक रिपोर्टिंग किया करते थे।
उसी वर्ष में इंडियन गजट नामक अखबार का प्रारंभ हुआ जो हिक्की गजट का प्रतिस्पद्धी बना और इसके बाद जेम्स हिक्की के भाग्य के सितारे गर्दिश में जाने लगे। धीरे-धीरे बंगाल गजट अपनी लोकप्रियता एवं पाठक दोनों ही खोने लगा। हालांकि इंडियन गजट हिक्की गजट की अपेक्षा बहुत ही बेहतर समाचार-पत्र था। यह 16 इंच लंबा था और तीन काॅलम में बंटा था। संपूर्ण पृष्ठ अच्छी तरह से मुद्रित एवं सुसज्जित दिखता था। इस पत्र के प्रकाशक मेस्सिींक और रीड थे जिन्होने जेम्स हिक्की के अनुभवों का बखूबी फायदा उठाया। जब हिक्की को लगने लगा कि इंडियन गजट के कारण उसके पाठक उसका साथ छोड़ रहे है तब हिक्की ने इंडियन गजट के मालिकों पीटर रीड और नमक एजेंट बी. मेस्सिींक पर लगातार हमले करने लगा। साथ ही हिक्की ने रंगकर्मी जाॅन जेड. कियरनान्डर, जिसके बारे में हिक्की का मानना था कि वह उसके प्रेस टाइप इंडियन गजट को छिपाकर पहुंचाता है, पर भी जोरदार हमले शुरू कर दिए। हिक्की ड्रोन्ज़ के खिलाफ भी हो गया जो इंडियन गजट के प्रचार का काम देखता था। परंतु सबसे ज्यादा हिक्की तब कुपित हुआ जब कि कंपनी सरकार ने इंडियन गजट को मुफ्त डाक सेवा देना स्वीकार कर लिया और बंगाल गजट को सेवा प्रदान करने से इंकार कर दिया।


मुफ्त डाक सेवा के मुद्दे पर हिक्की ने गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्ज की पत्नी लेडी हेस्टिंग्ज की कथित भूमिका पर जोरदार हमले किए। हिक्की ने यह प्रचारित किया कि इस सेवा के लिए श्रीमती हेस्टिंग्ज ने वारेन हेस्टिंग्ज पर दबाव डाला है और पत्नी प्रेम में गवर्नर जनरल ने यहकार्य किया है। हिक्की के लेडी हेस्टिंग्ज पर इन हमलों ने गवर्नर जनरल को कुपित कर दिया और हिक्की ने कंपनी प्रशासन की बेवजह शत्रुता मोल ली। हालांकि इससे पूर्व हिक्की और वारेन हेस्टिंग्ज के बीच न मित्रता थी और न ही शत्रुता। जबकि हिक्की कंपनी अधिकारियों, कर्मचारियों, व्यापारियों एवं व्यवसायियों के बीच अलोकप्रिय बन गया था।
कलकत्ता के योरोपीय समुदाय के सामाजिक जीवन को हिक्की जिस प्रकार से प्रचारित करता था, वह कपटपूर्ण एवं परिहासपूर्ण था। विवाह समारोह और सगाई से जुड़े इस प्रकार के समाचारों का प्रयोग हिक्की अपने विरोधियों पर तीखे हमले करने के लिए करता था। इस प्रकार से अगर देखें तो हिक्की ने अपनी मिशनरी पत्रकारिता को पीत पत्रकारिता का रूप दे दिया था। हिक्की की कारगुजारियों से जून 1781 तक गवर्नर जनरल का सब्र भी जवाब दे चुका था। इसी बीच भारत के मुख्य न्यायाधीश सर एलिजा एम्पे ने 400 सैनिकों को हिक्की को पकड़ने और उसके प्रेस के टाइप को जब्त करने के लिए भेजा। हालांकि हिक्की ने किसी भी प्रकार से सैनिको को टाइप नहीं ले जाने दिया। हिक्की को अरेस्ट कर और 80 हजार के मुचलके पर उसको जमानत देने का फैसला किया गया। क्योंकि हिक्की ने जमानत की राशि जमा नहीं की ऐसे में उसे एक वर्ष के कारावास एवं 2 हजार रूपये जुर्माने की सजा सुनाई गई। हिक्की जेल से ही बंगाल गजट को प्रकाशित, संपादित करता रहा और लेख लगातार लिखता रहा क्योंकि उस समय ऐसा कोई कानून नहीं था। जिससे उसके लेखन एवं संपादन पर रोक लगाई जा सके। इस दौरान यद्यपि उसके कई लेख चैंकाने वाले और निन्दात्मक भी थे तथापि उसने कई गलत कार्यों के खुलासे भी किए। परंतु जेम्स आगस्टस हिक्की के बुरे दिन शुरू हो चुके थे और उसने कई दुश्मन इकठ्इे कर लिए थे।



मार्च 1782 में वारेन हेस्टिंग्ज ने चार महत्वपूर्ण कार्रवाईयो को अंजाम दिया और सबसे पहले हिक्की के प्रिंटिंग प्रेस को जब्त कर लिया गया। हिक्की के समस्त प्रयास एवं अनुरोध व्यर्थ गए। साथ ही हिक्की ने पूर्व में सरकार के जो मुद्रण कार्य किए था उसका बकाया पैसा भी सरकार ने देने से मना कर दिया। पहले तो कंपनी से पैसे देने में बहुत ही समय लगाया और जब पैसे दिए भी तो वह बहुत ही कम थे। इस प्रकार हिक्की घोर गरीबी के जाल में जकड़ गया। उसकी दयनीय दशा का विवरण उस पत्र से मिलता है जिसमें उसने गवर्नर जनरल से गुहार लगाते हुए अपनी दशा का वर्णन किया है। हिक्की लिखता है कि मैं और मेरे बच्चे किस विपत्ति में है, इसका एक विस्तृत विवरण पढ़ना आपके लिए बहुत ही कष्टकर होगा। आपके लिए यह जानना उपयुक्त होगा कि मेरे पास अब तक जो कुछ भी था, वह सब मैं या तो बेच चुका हूं या फिर गिरवी रख चुका हूं अपने उस परिवार के लिए जिसको मैं कभी खुशी दे ही नहीं सका। और हमें और भगवान को छोड़कर और कोई नहीं जान सकता कि हम किस प्रकार की विपत्ति से गुजर रहें है।
ऐसे में हिक्की के बारे में सच ही कहा जाता है कि वह दगाबाज था, वह रंगीन था, वह गैरजिम्मेदार था, वह किसी दबाव में आने वाला नहीं था, वह क्रोधी और अविवेकी था, वह नवोन्मेषी था, वह बहादुर था परंतु वह दुर्भाग्यशाली था। वह एक ऐसा योद्धा था जो पतन के गर्त में चला गया। पैसे में उसकी कोई रूचि नहीं थी। उसके अंदर अपने लेखन और कार्यों के परिणाम का सामना करने को साहस था। प्रेस की स्वतंत्रता का बचाव उसने जिस शब्दों के माध्यम से किया, वह एक योद्धा पत्रकार का घोषणापत्र था। जो आज के पत्रकारिता के लिए प्रेरक एवं मार्गदर्शक है। हिक्की का मानना था कि प्रेस की स्वतंत्रता अतिशय महत्वपूर्ण है अंग्रेजो के अस्तित्व एवं स्वतंत्र सरकार के लिए। जनता को पूर्ण स्वतंत्रता होनी चाहिए कि वह अपने नियमों एवं सिद्धांतों को निर्धारित कर सके और अपना मत व्यक्त कर सके।


वैसा प्रत्येक कृत्य जो इस स्वतंत्रता के मार्ग को अवरूद्ध करता है, वह निरंकुश एवं समाज के लिए खतरनाक है। भारतीय पत्रकारिता के एक अन्य युगपुरूष जेम्स सिल्क बकिंघम थे, उनका जन्म इंग्लैंड में 1786 ई. में हुआ था। बकिंघम पूरे कलकत्ता में सिद्धांत वाले व्यक्ति के रूप में ख्यातिप्राप्त थे। गवर्नर जनरल एवं बिशप भी उनको ऐसा मानते थे। पंडित जवाहर लाल नेहरू ने बकिंघम को भारत में प्रेस की स्वतंत्रता के प्रारंभिक हिमायती माना है, जिन्हें आज भी इस देश में सम्मान के साथ याद किया जाता है। वह सन् 1818 में कलकत्ता क्रानिकल के संपादक के रूप भारत आएं, जिसकी शुरूआत कलकत्ता के एक बड़े व्यापारी ने अपने विचारों के प्रचार-प्रसार एवं अपने व्यापारिक हितों के संरक्षण के लिए किया था। बकिंघम ने अखबार की कमान संभालते ही यह स्पष्ट कर दिया कि यह राजनीतिक, वाणिज्यिक और साहित्यिक समाचारों एवं विचारों का क्राॅनिकल होगा और कलकत्ता क्राॅनिकल पर एक योग्य संपादक की छाप स्पष्ट तौर पर दिखने लगी। उन्होंने आरोप-प्रत्यारोप, आक्षेप-प्रतिक्षेप, घोटाले, षड्यंत्र और छिछोरेपन भरे माहौल में स्वच्छ हवा का मानो प्रवेश करा दिया। बकिंघम ने समस्त अरब देशों की यात्राएं की। वह एक उच्चकोटि के विद्वान और अध्ययनशील प्रवृति के व्यक्ति थे जिनकी मानवशास्त्र एवं साहित्य के साथ-साथ विज्ञान और खासतौर पर वाष्पशक्ति आधारित परिवहन, अश्व विहीन परिवहन और त्वरित परिवहन के लिए हवा भरे बैलून जैसे विषयों में खासी दिलचस्पी थी। वे अपने आस-पास के माहौल के रीति-रिवाजों, प्रथाओं एवं लोगों की आदतो का गहराई से सूक्ष्म अवलोकन करते थे। उन्होंने अपने पाठकों के बीच बाॅयरन और वाल्टर स्काॅट तथा वाशिंगटन इरविन के विचारों को प्रस्तुत किया और लोकप्रिय बनाया। उनके द्वारा अक्टूबर 1818 में कलकत्ता जर्नल की शुरूआत की गई जो आठ पन्नों का द्वि-साप्ताहिक समाचार-पत्र था। इस अखबार के संपादक के कार्यों को आलोचक बताया गया जिसका मानना था कि संपादक का कार्य है कि गवर्नर को उसकी कमियों के बारे में तत्परता से बताया जाएं और वैसे सत्य को भी उजागर किया जाएं जिससे सब सहमत नहीं हो।

कुल मिलाकर संपादक एक वाॅच डाॅग की भूमिका में होगा जो सरकार एवं व्यवस्था को गलत करने से रोके। इस अखबार को काॅरेस्पाॅन्डेंस काॅलम प्रत्येक उस व्यक्ति के लिए खुला था जो अपनी बात पत्र के माध्यम से रखना चाहता था। इस ने कलकत्ता की पत्रकारिता में एक नवीन मापदंड का सृजन किया। इस पत्र में स्थानीय रिपोर्ट के साथ संवाददाताओं के पत्र भी होते थे। इन पत्रों में हिक्की के दौर के कलकत्ता के समाज में आएं बदलावों का खुलासा होता था। उसकी आलोचनाएं प्रायः निर्देशात्मक होती थी और इस दृष्टि से वह हिक्की के एकदम उलट था। बकिंघम के समाचार-पत्र की मूलतः अभिरूचि बंगाल सरकार के कानूनो एवं नीतियों, डाक सेवा, पुलिस, सेना से जुड़े मसलों एवंज न सरोकार से जुड़े विभिन्न मुद्दों के प्रति सरकार के दृष्टिकोण में थी। बकिंघम ने उस समय वर्तमान भयानक कुप्रथा सती प्रथा की जमकर आलोचना की और इस पर नियंत्रण में सरकार की नाकामी की भत्र्सना की। बकिंघम का मुख्य जोर स्थानीय परिस्थितियों से जुड़े समाचारों के कवरेज पर था न कि फैशन जैसे विषयों पर। बंगाली और फारसी जर्नलों में प्रकाशित समाचारों एवं विचारों को वह महत्ता देता था और अपने पत्र में उनके सारांश भी प्रकाशित करता था। वह भाषाई प्रेस का समर्थक और मित्र था और उसने भाषाई प्रेस के अस्तित्व के अधिकार का समर्थन किया साथ ही भारतीय जनमानस के मत और आवाज को भी बुलंद करने का कार्य किया। इस प्रकार से यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि बकिंघम भारतीय पत्रकारिता के विकास के लिए एक प्रेरणास्रोत की तरह से था। उसको सत्य में भारतीय पत्रकारिता का जनक कहा जा सकता है ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार से एलेन ओक्टेवियन ह्यूम को भारतीय राष्ट्रवाद का जनक कहा जाता है। जिन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की थी। भारत में बकिंघम के आगमन के साथ ही प्रेस में जन सरोकार से जुड़े हुए प्रश्नों पर वास्तविक बहस और विमर्श की शुरूआत हुई। भारतीय पत्रकारिता में एक छोटी अवधि में ही सही बकिंघम ने एक नई शुरूआत की नींव रखी।


वह प्रशासकों एवं अधिकारियों के सार्वजनिक आचरण पर, राज्य की कार्यकारिणी इकाइयों पर और शिक्षित जनमत पर विशेष ध्यान देता था। बकिंघम का यह दृढ़ मत था कि सुचारू रूप से व्यवस्थित कार्य करने वाला प्रेस अज्ञानता के निवारण एवं ज्ञान के प्रसार के लिए अनिवार्य आवश्यकता है। उसने लिखा कि अगर ज्ञान एक वरदान है और अज्ञानता एक अभिशाप, एक सुव्यवस्थित प्रेस जहां अज्ञानता को मिटाता है वही ज्ञान को बढ़ावा देता है। ठीक उसी प्रकार से जिस तरह स्कूल और दूसरी सामाजिक संस्थाएं समान उद्देश्यों की पूर्ति करती है। चूंकि यह सभी एक ही वृक्ष की विभिन्न शाखाएं है। यद्यपि प्रेस का प्रभाव अन्य संस्थाओं की अपेक्षा ज्यादा विस्तृत और सार्वभौमिक हो सकता है चाहें दोनों को एक समान व्यवस्थित क्यों न किया जाएं। प्रेस अन्य से ज्यादा प्रभावशाली औजार साबित हो सकता है। हालांकि दोनो का एक साथ सम्मिलन किसी भी राष्ट्र के लिए बहुत ही लाभकर हो सकता है।
वह प्रेस की स्वतंत्रता का प्रबल समर्थक था और उसको कुछ मायनों में क्रांतिकारी भी माना जा सकता है। वह लिखता है कि अगर किसी निरंकुश सत्ता या शक्ति, जो समस्त शक्तियों को संचालित करती है, से उसकी सम्मिश्रित बुराईयों को नियंत्रित करने की ऐसी कोई भी संभावित दवा नहीं है जिसकी तुलना एक स्वतंत्र प्रेस से की जा सके। बकिंघम के नेतृत्व में कलकत्ता जर्नल को एक सम्मानित समाचार पत्र का स्थान, मात्र उत्कृष्ट सामग्री ही नहीं बल्कि बेहतर प्रस्तुति के लिए भी प्राप्त हो सका। समाचार पत्र की व्यवसायिक सफलता उसका स्वयं का अपनी इमारत खड़ी हो सकी और एक बेहतर गुणवत्ता की प्रेस इंगलैंड से आयात की जा सकी। सन् 1822 में कलकत्ता जर्नल का बाजार मूल्य 40 हजार पौंड था जिसमें तीन-चैथाई हिस्सा संपादक का और एक-चैथाई हिस्सा इसके शेयर धारकों का था। सिल्क बकिंघम की अपनी सलाना आय लगभग 8 हजार पौंड थी। बकिंघम ने अपने समाचार पत्र का संचालन बिना किसी गंभीर समस्या के सफलतापूर्वक किया।



जहां उसे एक ओर कलकत्ता के सभी व्यापारिक समुदायों का संरक्षण प्राप्त था वहीं दूसरी ओर हिन्दू बौद्धिक वर्ग का समर्थन भी प्राप्त था। साथ ही उसने गवर्नर जनरल लार्ड हेस्टिंग्ज के साथ भी समन्वय स्थापित कर रखा था। ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों के साथ बकिंघम के प्रथम विवाद की शुरूआत तब हुई जब उसने 20 वीं रेजिमेंट के कर्नल रूबिसन के दमन की आलोचना की। इसके बाद इस प्रकाशन पर सवाल उठाएं गए और अभियोजन चलाएं गए। हालांकि इस मामले में बकिंघम के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई लेकिन कर्नल रूबिसन को 24 घंटे के अंदर भारत छोड़ने का हुक्म दिया गया क्योंकि ऐसी मान्यता बनी की सभी समस्याओं की जड़ में कर्नल है। हेस्टिंग्ज ने उदारवादी नीति का अनुसरण किया और उसने बकिंघम के निर्वासन के मार्ग को हमेशा अवरूद्ध किया। या एक प्रकार से कहा जाएं तो बकिंघम को संरक्षण प्रदान किया। जाॅन एडम ने बकिंघम के लेख खिलाफ आपराधिक मानहानि का मुकदमा दायर किया, जिसमें उसने लिखा था कि उन समस्याओं पर कभी ध्या नही नहीं दिया जाता है जिनको सरकार के समक्ष प्रेस के माध्यम से उठाया जाता है जबकि उनको जिनको सचिवों एवं अधिकारियों का वरदहस्त प्राप्त है, को ही मात्र औषधि मिलती है। हालांकि इस मामले में बकिंघम बरी तो हो गया परंतु इसके बदले उसके 600 रूपये खर्च हुए। एडम के बकिंघम के खिलाफ अभियान के बावजूद भी हेस्टिंग्ज ने अपने उदारवादी रवैये को नहीं छोड़ा। जब बकिंघम ने डाॅ. जेमसन की भारतीयों के लिए स्थापित मेडिकल स्कूल के अधीक्षक पद पर नियुक्ति की आलोचना की, जो कि पूर्व से ही अन्य तीन पदों पर कार्य कर रहे थे। डाॅ. जेमसन बहुत ही नाराज हुआ और एडम चाहता था कि बकिंघम को निर्वासित कर दिया जाएं। बकिंघम का अपराध बस इतना ही था कि वह उन मुद्दों के बहुत ही करीब था जो प्रशासन को जड़ों को छूती थी। कंपनी के आधिकारिक कदाचार से संबंधित उसके लगातार खुलासे और इसके बाद हुई हानि का हर्जाना भरकर माफी प्राप्त करने में सफलता ने ईस्ट इंडिया कंपनी और इसकी साख को खतरे में डाल दिया।


बकिंघम द्वारा स्थापित किए गए साहस के उदाहरण ने एक परंपरा स्थापित की और इसका बार-बार सामना सरकार की दमन और उदारवाद की नीति से हुआ। जो दोयम व्यवहार पूरे ब्रिटिश शासन के दौरान लगातार चलता रहा। इंगलैंड में बकिंघम ने ओरिएंटन हेराल्ड की शुरूआत की जिसमें वह लगातार भारत के प्रशासन की कलई खोलता रहा। उसने हर्जाने के लिए हाउस आॅफ कामन्स में मुकदमा भी दायर किया। बकिंघम ने भारत में निर्वाचित विधायिका की भी वकालत की जिसमें समान संख्या में भारतीय और अंग्रेज हो। साथ ही उसने भारतीय नागरिक सेवा में मनोनयन के बजाएं खुली प्रतियोगिता की भी वकालत की। वह प्रखर प्रभुत्ववादी और दृढ़ था, वह साहसी था और उसकी सोच उसके दौर से बहुत आगे की थी। भारतीय पत्रकारिता में बकिंघम के महत्वपूर्ण योगदान को निम्न बिंदुओं के माध्यम से अभिव्यक्त किया जा सकता है- उसने समाचार-पत्र को जनता का आईना बनाया। उसने जांच-परख और स्वस्थ आलोचना की शुरूआत की और उसने प्रेस की नेतृत्व की गुणवत्ता बतायी। उसको निर्वासित कर के प्रशासन ने दूसरों के लिए भी चेतावनी दी थी परंतु वह उस चिंगारी को धधकने से रोक नहीं सकी जो बकिंघम ने सुलगाई थी। वह उन पत्रकारों में से एक था जो जन्म से ही पत्रकार होते है न कि बनाएं जाते है।

राजा राममोहन राय, जिन्हें पंडित जवाहर लाल नेहरू ने भारतीय पत्रकारिता का जनक माना है, एक बहुभाषाविद्, विद्वान-राजनीतिज्ञ, सामाजिक सुधारक और उदारवादी विचारक थे। वह प्रेस की स्वतंत्रता के घोर समर्थक थे। राजनीतिक-धार्मिक और सामजिक सुधार के मिशन में अपने उदारवादी विचारों के प्रचार-प्रसार के माध्यम के रूप में उन्होंने मुद्रित माध्यमो की शक्ति एवं महत्व को पहचाना। एक सामाजिक सुधारक के रूप में उन्होंने सती प्रथा की कुरीति के खिलाफ अभियान छेड़ा और कानून के माध्यम से इसको समाप्त करने के लार्ड विलियम बेंटिक के प्रयासों को प्रोत्साहित किया।


उन्होंने अपनी सशक्त लेखनी का प्रयोग हिंदू समाज में व्याप्त सामाजिक कुरीतियों, यथा जाति प्रथा, मूर्ति पूजा, पशु बलि आदि के उन्मूलन के लिए किया। राय ने अंग्रेजी में ब्रह्मानिकल मैगजीन 1821 ई., बंगाली में संवाद कौमुदी 1821 ई., और फारसी में मिरात उल अखबार को प्रकाशन किया। ब्रह्मानिकल मैगजीन कुछ अंको के प्रकाशन के बाद ही बंद हो गया। संवाद कौमुदी राजनीतिक, साहित्यिक, धार्मिक और सामाजिक मुद्दों से जुड़ा एक साप्ताहिक समाचार पत्र था।
यह पत्र उदारवादी विचारधारा का समर्थक था और कानून के शासन तथा नागरिक स्वतंत्रता का कट्टर समर्थक था। इसने नस्लीय भेदभाव और अंग्रेजों के अहंकारपूर्ण व्यवहार का ख्ुालकर विरोध किया। अखबार का यह विचार था कि शिक्षा समाजिक बेहतरी और जागरूकता के लिए होनी चाहिए और इसके लिए इसने पश्चिमी चिकित्सा विज्ञान, तकनीक एवं नारी शिक्षा के प्रसार का समर्थन किया। संवाद कौमुदी जनवरी 1830 में द्वि-साप्ताहिक समाचार पत्र के रूप में प्रकाशित होने लगा और 33 वर्षों तक प्रकाशित होता रहा।
राजा राममोहन राय ने फारसी में मिरात उल अखबार का प्रकाषन आरंभ किया। इसका उद्देष्य था कि जनता के सामने ऐसे विद्वतापूर्ण लेख प्रस्तुत करना जो उनके ज्ञान एवं अनुभव में वृद्धि कर सके और उनका सामाजिक उत्थान कर सके। यद्यपि राय ने मिरात उल अखबार का प्रकाषन 1823 के अध्यादेष और कलकत्ता जर्नल के संपादक बकिंघम के साथ हुए अन्याय के खिलाफ अपना विरोध दर्ज करने के लिए बंद कर दिया। यहां यह याद करना प्रासंगिक होगा जो प्रेस की स्वतंत्रता के बारे में कहा गया है। किसी भी षासक को अपने बड़े साम्राज्य को व्यवस्थित करने की महानतम जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक होना चाहिए और इसके लिए उसे हमेषा ही उत्सुक होना चाहिए कि जिस कार्य में उसके हस्तक्षेप की आवष्यकता हो, वह करने को सदैव ही तत्पर हो। इस महानतम लक्ष्य को हासिल करने के लिए स्वतंत्र प्रकाषन बहुत ही प्रभावषाली माध्यम है जिसका प्रयोग करना चाहिए।


उन्होंने गवर्नर जनरल जाॅन एडम के 1823 के प्रेस अध्यादेष का भी मजबूती के साथ विरोध किया। इस अध्यादेष के अनुसार किसी भी समाचार पत्र के प्रकाषन से पूर्व गवर्नर जनरल से लायसेंस प्राप्त करना अनिवार्य कर दिया गया। अध्यदेष का पूरे बंगाल में जोर-षोर से विरोध हुआ। राममोहन राय ने इस अध्यादेष के खिलाफ पिटिषन दिया जिस पर द्वारिकानाथ टैगोर समेत उस समय के राजनीतिक रूप से जागरूक नेताओं के हस्ताक्षर थे। राय द्वारा तैयार किया गया यह मसौदा एक यादगार दस्तावेज है, जिसे भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज कहा जा सकता है। बंगाल भारत में पत्रकारिता और भाषाई पत्रकारिता दोनों की ही जन्मस्थली रहा है। किसी भारतीय भाषा में प्रकाषित पहला पाक्षिक दिग्दर्षन था, जो बंगाली में छपता था। इसका मासिक अंक सर्वप्रथम अप्रैल 1818 ई. में निकला। इसने विभिन्न विषयों जैसे, राजनीति, इतिहास, विज्ञान, व्यापार और अर्थषास्त्र से संबंधित आलेख प्रकाषित किए। साप्ताहिक समाचार दर्पण जो बंगाली में प्रकाषित होता था और बाद में बंाग्ला और अंग्रेजी दोनो भाषाओं में प्रकाषित होने लगा, 1818 में षुरू होकर 1890 तक प्रकाषित होता रहा।
हालांकि ये दोनो ही समाचारपत्र कलकत्ता की बैपटिस्ट मिषनरी ने प्रकाषित किए, जिनका उद्देष्य मिषनरी द्वारा धार्मिक प्रचार-प्रसार करना था। इसने नारी शिक्षा की पुरजोर वकालत की और काफी लोकप्रियता हासिल की। धीरे-धीरे कई समाचारपत्र बंबई, कलकत्ता और मद्रास से प्रकाशित होने प्रारंभ हुए। इस दौरान बंबई एक महत्वपूर्ण वाणिज्यिक केन्द्र बनकर उभरा जहां विदेशी और तटीय जहाज विभिन्न वस्तुओं का परिवहन करते थे। बंबई के भारतीय व्यापारी ज्यादातर गुजरात के थे जो विभिन्न वस्तुओं के मूल्य और जहाजों के बारे में जानने को बहुत ही उत्सुक रहते थे। उनकी जरूरतों को देखते हुए कई अंग्रेजी समाचारप़त्रों ने 1797 से गुजराती में विज्ञापन प्रकाशित करने प्रारंभ कर दिए।



सन् 1822 ई. में मर्जबान ने गुजराती साप्ताहिक बांबे समाचार का प्रकाशन प्रारंभ किया जिसमें वाणिज्यिक एवं व्यापारिक गतिविधि से संबंधित समाचारों को जगह दी जाती थी। इसको किसी भारतीय भाषा का सबसे पुराना अखबार माना जाता है जो अब तक प्रकाशित हो रहा है। इस प्रकार भारतीय पत्रकारिता के उद्भव की अवधि 19 वीं सदी के दूसरे और तीसरे दशक को माना जा सकता है। ये भाषाई पत्र बंगाली और गुजराती भाषा में शुरू किए गए। हालांकि जहां एक ओर राजा राममोहन राय का लक्ष्य जनता को हिंदू धर्मा के बारे में शिक्षित करना, सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ लोगों को जागरूक बनाना और सामाजिक सुधारों का प्रचार-प्रसार करना था वहीं मर्जबान का उद्देश्य व्यापारिक हितों के लिए कार्य करना था। इस प्रकार कहा जा सकता है कि भारत में भाषाई प्रेस के उद्भव एवं विकास के पीछे सामाजिक सुधार और व्यापारिक हितों को सहायता पहुंचाना था।

दमनकारी नीतियों के खिलाफ संघर्ष:

उन्नीसवीं सदी के प्रारंभिक दशक में भारतीय प्रेस हमेशा ही सरकार के दमनकारी अध्यादेशों के खिलाफ संघर्ष करता हुआ प्रतीत होता है जो प्रेस की स्वतंत्रता को बाधित करते थे। सर्वप्रथम प्रेस की स्वतंत्रता पर खतरा तब दिखने लगा जब लार्ड वेलेजली ने 13 मई 1799 को कलकत्ता से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्रों के लिए गाइडलाइन जारी किया, जिसके अनुसार प्रत्येक मुद्रक को अपना नाम समाचारपत्र के नीचे लिखना अनिवार्य कर दिया गया और समाचारपत्रों पर पूर्व सेंसरशिप लगा दिया गया। इस कानून के उल्लंघन पर तात्कालिक निवर्सन का दण्ड निर्धारित किया गया। इस सेंसर के द्वारा पब्लिक क्रेडिट से जुड़े विषयों के प्रकाशन पर प्रतिबंध लगा दिया गया। प्रेस के उपर एक विस्तृत अध्यादेश 1823 में कार्यकारी गवर्नर जनरल जाॅन एडम द्वारा लगाएं गए, जिसके तहत लगाएं गए प्रतिबंध बहुत अधिक कठोर थे। 


इन अध्यादेशों ने किसी भी मुद्रण और प्रकाशन से पूर्व लायसेंस प्राप्त करना अनिवार्य बना दिया। एडम ने प्रेस की स्वतंत्रता को ब्रिटिश शासन के लिए एक भयानक खतरा माना। इस अध्यादेश के अनुसार सरकार किसी भी प्रिंटिंग प्रेस से लायसेंस वापस ले सकती थी और बिना लायसेंस के प्रिंंिटंग प्रेस को जब्त या बंद कर सकती थी। यह अध्यादेश और खास तौर पर प्रकाशन पूर्व लायसेंस के नियम की बहुत ही भत्र्सना हुई परंतु यह तब तक जारी रहा जब तक चाल्र्स मेटकाफ ने प्रेस कानूनों को पुनः संशोधित नहीं किया। इन प्रतिबंधों के बावजूद भी भारत में प्रेस फलता-फूलता रहा लेकिन सच्चाई यह थी कि किसी प्रकार की पत्रकारी स्वतंत्रता नहीं थी। सरकारी कर्मचारियों पर प्रेस से किसी प्रकार का संबंध रखने पर प्रतिबंध था। भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में चाल्र्स मेटकाफ का नाम बड़े ही सम्मान के साथ लिया जाता है क्योकि वह एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने उस प्रभुत्ववादी और निरंकुशता के युग में प्रेस के महत्व को समझा था। उनका मानना था कि प्रतिबंध विहीन प्रेस मात्र सूचनाओं को संप्रेषित करने का ही कार्य नहीं करती सरकार की स्वस्थ आलोचना के माध्यम से मार्गदर्शन भी करती है।

मेटकाॅफ एक राजनीतिज्ञ नहीं था और वह ईस्ट ंइडिया कंपनी का एक नियमित कर्मचारी था। वह मात्र 19 वर्ष की आयु में जनरल लेक के साथ मराठा अभियान के समय में भारत आया था। विभिन्न पदों पर उत्कृष्टता के साथ कार्य करते हुए सन् 1827 में वह गवर्नर जनरल की काउंसिल का सदस्य बना और उसने कुछ समय के लिए गवर्नर जनरल के रूप में भी कार्य किया। यह आसानी से कहा जा सकता है कि उसने ही भारत में प्रेस को स्वतंत्र बनाया और अंग्रेजी को आधिकारिक भाषा बनाया। उसने प्रेस की स्वतंत्र बनाने के लिए अभूतपूर्व प्रयास किए और प्रेस की स्वतंत्रता के लार्ड विलियम बेंटिक के विचारों को अमली जामा पहनाया।



गवर्नर जनरल लार्ड बेंटिक ने भी न केवल प्रेस के प्रति सहिष्षणुता की नीति अपनायी बल्कि सक्रिय रूप से सहयोग भी किया। जब 1835 ई. में भारतीय और यूरोपीय प्रेस के नेताओं ने प्रेस पर से प्रतिबंध हटाने के लिए बेंटिक को अनुरोध पत्र दिया, तो उन्होंने यह आश्वासन दिया कि जल्दी ही ऐसी व्यवस्था की जाऐगी, जिसके तहत प्रत्येक उस व्यक्ति को सुरक्षा मिलेगी जो स्वच्छ लोक विमर्श में शामिल होगा। बेंटिक ने कहा कि सरकार की ऐसी कोई मंशा नहीं है कि वह उनकी स्वतंत्रता पर अंकुश लगाएं। उसके बाद ही जब मेटकाॅफ एक छोटे समय के लिए गवर्नर जनरल बना तो इसी ज्ञापन के आधार पर उसने प्रेस कानून को संशोधित किया। मेटकाॅफ द्वारा प्रेस कानूनों में संशोधन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू था कि उसने एडम अध्यादेश 1823 के प्रकाशन पूर्व लायसेंस को समाप्त कर दिया और इसके बदले निबंधन कराना अनिवार्य बना दिया। जिसके तहत प्रत्येक व्यक्ति बगैर पूर्व अनुमति के प्रकाशन के लिए स्वतंत्र था लेकिन उसे दंडित किया जाएगा अगर वह बगावती या मिथ्या आरोप वाले प्रकाशन करता है।
मेटकाॅफ ऐसा एकमात्र अंग्रेज था जिसने गवर्नर जनरल के रूप में प्रेस पर लगाएं गए समस्यत प्रतिबंधात्मक अध्यादेशों, यथा 1823, 1825 और 1827 को समाप्त कर दिया। उसके इस महान्तम कार्य के लिए उसको भारतीय प्रेस के विमोचक की उपाधि से विभूषित किया जाता है। मेटकाॅफ ने प्रेस कानूनों को संशोधित करने का प्रश्न, जिसमें लायसेंस के बदले निबंधन को लागू करना था, लाॅ काउंसलर जाॅन मैकाले के पास अग्रेसित कर दिया। मैकाले ने कंपनी राज्य की संपूर्ण सीमा में एकीकृत कानून की वकालत की जिसके तहत पत्रकार बिना किसी पूर्व आज्ञा के कुछ भी प्रकाशित करने के लिए स्वतंत्र थे लेकिन उनको किसी भी उपद्रव फैलाने वाले और मानहानिपरक सामग्री के प्रकाशन पर दंडित किया जाएगा। इससे संबंधित कानून मेटकाॅफ ने लागू करके भारतीय पत्रकारिता के स्वयं के प्रति कृतज्ञ बनाया।



मेटकाॅफ का कहना था कि-
1. कानून की पुस्तकों में ऐसे कठोर कानूनों की कोई उपयोगिता नहीं है जिनका आज तक कभी प्रयोग ही नहीं किया गया।
2. उन्होंने अज्ञानता के स्थायीकरण की अपेक्षा ज्ञान के प्रसरण को प्रोत्साहित किया। उनका कहना था कि चाहें हम कुछ भी क्यों न करें ज्ञान के प्रसार को नहीं रोक सकते। इसलिए यह हमारा दायित्व है कि हम इसको प्रोत्साहित करें, चाहें परिणाम जो भी हो।
3. उसने भारतीय भाषाई प्रेस पर विशेष निगरानी के अपने सहयोगियों की सलाह को खारिज कर दिया और कहा कि अंग्रेजी और भारतीय समाचारपत्रों के बीच किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए।
4. उसकी यह दृढ़ मान्यता थी कि कोई भी शासन जो जनमत को दबाने के प्रयास में लगा रहता । कभी भी चिरस्थायी नहीं हो सकता। क्योंकि ऐसा शासन दूषित और सड़ा हुआ होता है और ऐसे प्रयास हमेशा ही असफल साबित होते है।
5. उन्होंने कहा कि प्रेस को सर्वथा स्वतंत्र होना चाहिए और इससे भारतीय साम्राज्य के स्थायित्व को कोई खतरा नहीं होगा।
6. मेटकाॅफ ने हमेशा ही प्रेस के स्वतंत्रता की वकालत की क्योंिक उसका मानना था कि इसके फायदे हमेशा ही नुकसान से ज्यादा होते है।
7. उसने यह भी कहा कि प्रेस की स्वतंत्रता को भी नागरिकों की अन्य स्वतंत्रताओं की तरह स्थगित किया जा सकता है जब प्रेस की सुरक्षा के लिए इस प्रकार का बलिदान आवश्यक हो।  परिणामस्वरूप नहीं परंतु मैं स्वीकार करता हूं कि वर्तमान उदाहरण को एक अपवाद माना जाना चाहिए, न कि सरकार का रोजाना का कार्य-व्यवहार।



8. अगर राज्य पर कोई आपदा आती हो तो मेटकाॅफ ने प्रेस स्वतंत्रता पर नियंत्रण का समर्थन किया है। मैं सोचता हूं कि विचार और मतों के प्रकाशन को दबाने से बेहतर है कि वाल्व को खुला रखा जाएं, जिससे बुरी अफवाहें बाहर निकल सकें।
9. मनुष्य को सोचने और महसूस करने से रोकना असंभव है और मेरा मानना है कि उनके तात्कालिक क्रोध को बाहर निकलने देना चाहिए, अखबारों में छपे गुमनाम पत्र के रूप में, जिसके लेखक गुमनाम ही रहना चाहते है। अगर उनके क्रोध को उनके सीने में नरम होने के लिए दबाया जाता है तो वही क्रोध स्थायी बन जाता है। जो कभी भी फटने के लिए तैयार रहता है। जो सरकार अपनी खुशी से दखल देती है वह उस सभी के लिए जिम्मेदार होती है, जिसके प्रकाशन की अनुमति देती है।
10. उन्होंने कहा कि यह बेहतर है कि सेंसरशिप या किसी निश्चित नियम का धीरे-धीरे प्रयोग किया जाएं और सरकार की मनमानी इच्छा का यदा-कदा हस्तक्षेप हो।

प्रेस पर प्रतिबंधों को हल्का करने बाले कानून की घोषणा कर, जो 1856 ई. तक लागू रहा, मेटकाॅफ ने इंगलैंड में बोर्ड आॅफ डायरेक्टर्स की नाराजगी मोल ली। जिन्होंने उस पर पुराने निर्देशों के खिलाफ कार्य करने के लिए आरोपित किया। परंतु मेटकाॅफ थोड़ा भी नरम नहीं हुआ और उसने स्थायी गवर्नर जनरल बनने का मौका खो दिया। उसको पदावनत करके पहले उत्तर-पश्चिम प्रोविंस और फिर मद्रास का गवर्नर बनाया गया। उसने अपने करियर का बलिदान दे दिया परंतु भारतीय पत्रकारिता को लंबी और गौरवपूर्ण यात्रा के लिए तैयार कर दिया।




उसने प्रेस के लिए पांच अधिनियम बनाएं जो निम्नांकित हैं-
1. उसने कहा कि मुद्रक और प्रकाशक को घोषणा करनी चाहिए अपने नाम, निवास स्थान और प्रेस के स्थान की।
2. अगर नाम या फिर पता में कोई परिवर्तन होता है तो पुनः एक घोषणापत्र भरा जाना चाहिए।
3. घोषणापत्र नहीं भरने पर 5 हजार रूपये का जुर्माना तथा दो साल कैद की सजा का प्रावधान किया गया।
4. कोई भी एक साधारण घोषणापत्र के माध्यम से अपने प्रेस को बंद कर सकता है।
5. जहां तक कंपनी के कर्मचारियों या अधिकारियों पर प्रेस से संबंध का प्रश्न था मेटकाॅफ ने इसको केवल कमिशन प्राप्त कर्मियों तक ही सीमित कर दिया। भारत सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया था कि यह प्रतिबंध मात्र कंपनी के अनुबंधित एवं कमिशन प्राप्त कर्मियों पर ही लागू होगा जिनको कोर्ट आॅफ डायरेक्टर्स की बगैर सहमति के नहीं हटाया जा सकता है।

कोर्ट आॅफ डायरेक्टर्स मेटकाॅफ से नाराज था क्योंकि उसने उनकी बिना सहमति के पुराने कानून के बदले नए प्रेस कानून को लागू कर दिया था। हम यह मानने को मजबूर है कि यह कार्य बहुत अधिक अन्यायपूर्ण हैं और इसे एक अस्थायी सरकार द्वारा अधिरोपित किया गया है और वह भी उस समय में जब तीन प्रेसिडेन्सी के लिए कानून बनाने के लिए एक कमिशन की स्थापना की जा चुकी है, जो अपनी महत्वपूर्ण सुनवाई प्रारंभ ही करने जा रही है। कोर्ट आॅफ डायरेक्टर्स मेटकाॅफ को यह भी याद दिलाना नहीं भूला कि उसका यह कार्य न तो कभी भूला जा सकता है और न ही माफ किया जा सकता है।



प्रेस को पूर्व के तमाम प्रतिबंधों से आजाद करने के परिणामस्वरूप प्रसार में बहुत तेजी के साथ वृद्धि हुई और भारतीय तथा अंग्रेजी भाषा के समाचारपत्रों की संख्या, जो 1824 में 11 थी, 1830 के अंत तक 68 और 1856 ई. तक बढ़कर 104 हो गई।
इस तरह से, चाल्र्स मेटकाॅफ प्रेस की स्वतंत्रता का सबसे बड़ा हिमायती बन गया और उसने अपने पूर्व के प्रेस स्वतंत्रता के सभी हिमायतियों जैसे राजा राममोहन राय और सिल्क बकिंघम को पीछे छोड़ दिया।  उसने कभी भी अपने कल्याण की फिक्र नहीं की बल्कि भारतय प्रेस को पूर्व के शासकों द्वारा आरोपित कठोर प्रतिबंधों की जंजीर से मुक्त करने का कार्य किया। एक ब्रिटिश गवर्नर जनरल के रूप में चाल्र्स मेटकाॅफ ने, भारतीय प्रेस की संरचना में आमूल-चूल परिवर्तन को दिशा देने में निर्णायक एवं अग्रणी भूमिका निभाई।
सन् 1857 ई. में भारतीय स्वतंत्रता के प्रथम संग्राम के दौर में गवर्नर जनरल लार्ड कैनिंग ने 1857 का अधिनियम लागू किया जिसको गलाघोंटू कानून भी कहा जाता है। इस कानून के द्वारा 1823 के एडम अधिनियम को फिर से लागू कर दिया गया और इसके तहत प्रिंंिटग प्रेस को कार्य करने लिए या फिर समाचारपत्र या पुस्तक प्रकाशित करने के लिए लायसेंस प्राप्त करना अनिवार्य बना दिया गया। सरकार को यह शक्ति मिल गई कि वह किसी भी समाचारपत्र, पुस्तक या प्रकाशित सामग्री के प्रसार एवं प्रकाशन पर प्रतिबंध लगा सकती थी। यह कानून अंग्रेजी और भाषाई प्रेस दोनों पर ही समान रूप से लागू किया गया। कानून लगभग एक वर्ष तक लागू रहा। इसके तहत कई समाचार पत्रों पर मुकदमा चलाया गया और उनको दंडित किया गया। यद्यपि यह गलाघोटू कानून भारतीय प्रेस को और अधिक नुकसान पहुंचाता, यह कानून स्वतः समाप्त हो गया और भारतीय प्रशासन 1 नवंबर 1858 को रानी विक्टोरिया के हाथों मे चला गया। इस प्रकार, सन् 1776 ई. से लेकर, जब कलकत्ता में पहली बार विलियम बोल्ट द्वारा समाचारपत्र प्रारंभ करने का प्रयास किया गया।



सन् 1857 तक, जब महान् स्वतंत्रता सेनानी अजीमुल्ला खान ने पयाम-ए-आजादी की शुरूआत की, जिसने मजबूती के साथ और प्रखरता से ब्रिटिश शासन के खिलाफ लिखा। साथ ही इसने राष्ट्रीय आंदोलन को दिशा प्रदान की। ब्रिटिश सरकार के पास इसकी आवाज को बंद करने के असफल प्रयास के आलावा कोई और चारा भी नहीं था। प्रथम स्वाधीनता संग्राम की असफलता ने भारत पर ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के अध्याय का पटाक्षेप कर दिया और ब्रिटिश क्राउन ने इस वादें के साथ भारत के शासन के बागडोर संभाली कि वह धार्मिक सहिष्णुता और प्रेस के स्वतंत्रता को संरक्षण एवं बढ़ावा देंगे। भारत में राजनीतिक पत्रकारिता का प्रारंभ 1861 ई. से माना जा सकता है, जब इंडियन काउंसिल ऐक्ट ने सरकार को यह अधिकार प्रदान किया कि वह विधायिका में प्रख्यात भारतीयों को मनोनित कर सकती है। कई महानतम् भारतीय समाचारपत्र जो आज तक अस्तित्व में हैं, इसी अवधि के दौरान शुरू किए गए थे। सन् 1861 में दी टाइम्स आॅफ इंडिया और 1861 में ही दी पायोनियर, सन् 1875 में दी स्टेट्समैन और सन् 1878 में दी हिन्दू की स्थापना हुई।
इस अवधि के दौरान भाषाई पत्रकारिता ने भी तेजी के साथ उड़ान भरी। प्रत्येक प्रमुख भारतीय भाषा में किसी न किसी समाचारपत्र का प्रारंभ हुआ। लगभग इसी दौरान सरकार ने सन् 1878 में वर्नाकुलर प्रेस कानून की घोषणा प्रेस को नियंत्रित करने के लिए की। इस कानून के अनुसार, भारतीय भाषाई समाचारपत्रों के मुद्रक एवं प्रकाशकों को एक बांड भरना अनिवार्य था कि वे ऐसी कोई भी सामग्री प्रकाशित नहीं करेंगे जो सरकार के खिलाफ असंतोष की भावना को उकसावा या बढ़ावा देता हो। कानून के तहत, जिला मजिस्ट्रेट या पुलिस कमिशनर किसी भी समाचारपत्र के प्रकाशक या मुद्रक को ऐसी किसी सामग्री के प्रकाशन के लिए रोक सकता था। वह मुद्रक या प्रकाशक से सुरक्षा राशि की मांग कर सकता था और ऐसे किसी भी मुद्रित सामग्री को जब्त कर सकता था जो आपत्तिजनक प्रतीत होती हो। सन् 1878 को वर्नाकुलर प्रेस एक्ट प्रेस की स्वतंत्रता के लिए सबसे बड़ा खतरा था और भाषाई समाचारपत्रों को इसके कारण तमाम परेशानियों का सामना करना पड़ा।