भारतीय स्वाधीनता संग्राम को मजबूत बनाने और इसको पुरजोर समर्थन प्रदान करने में भारतीय प्रेस की भूमिका इसके उद्भव एवं विकास के इतिहास का एक गौरवशाली अध्याय है। सन् 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना ने भारतीय जनता की राष्ट्रवादी आकांक्षाओं को आगे और अधिक बल प्रदान किया। कांग्रेस के महत्वपूर्ण सदस्य या तो प्रखर पत्रकार थे या फिर समाचारपत्रों के संपादक। इसमें दादा भाई नौरोजी, जस्टिस रानाडे, नरेन्द्रनाथ सेन जैसे महानतम् व्यक्तित्व शामिल थे। भारतीय भाषाई प्रेस सरकार के खिलाफ अपने विचारों को अभिव्यक्त करने के मामले में सबसे आगे था। भाषाई प्रेस नेे सामाजिक सुधारों को भी प्राथमिकता के आधार पर प्रोत्साहित किया।
भारत के सभी महानतम् समाज सुधारकों, नेताओं और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने अपने विचारों एवं मुद्दों को उठाने के लिए प्रेस का सहारा लिया। इनमे से कुछ प्रमुख थे- अरविंदो घोष, एनी बेसेंट, लाजपत राय, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी, बालगंगाधर तिलक और महात्मा गांधी। तिलक ने प्रेस के माध्यम से देश की स्वतंत्रता के संघर्ष को आगे बढ़ाने का कार्य किया। उन्होंने मराठी साप्ताहिक केसरी और अंग्रेजी साप्ताहिक मराठा के माध्यम से जनता को जागरूक एवं शिक्षित बनाने के लिए सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक मसलों पर जमकर लिखा। तिलक ने पत्रकारिता का प्रयोग लोकप्रिय शिक्षा एवं जन आंदोलन के लिए किया।
गांधी-एक महान् संचारक एवं पत्रकार:
भारतीय राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम में गांधी जी के आगमन ने भारतीय इतिहास के संपूर्ण चरित्र को ही बदल दिया। उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन को एक नई दिशा दी और इसके स्वरूप को परिवर्तित किया साथ ही विभिन्न मुद्दों पर जनता के मत को प्रभावित किया। चलपति राव के अनुसार गांधीजी संभवतः सर्वकालिक महानतम् पत्रकार थे और जिन साप्ताहिकों को उन्होंने प्रारंभ किया या संपादित किया वे साप्ताहिक दुनिया में ज्ञात महानतम् साप्ताहिक समाचारपत्र थे। उन्होंने विज्ञापन प्रकाशित नहीं किए परंतु वह यह भी नहीं चाहते थे कि उनका अखबार घाटे में चले। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में पर्याप्त अनुभव अर्जित किए, जहां उन्होंने 1904 ई. में इंडियन ओपिनियन का संपादकत्व ग्रहण किया और इसे अंग्रेजी, तमिल और गुजराती में प्रकाशित कराया। यंग इंडिया और हरिजन, प्रत्येक विषय पर उनके विचारों की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बना। वह बहुत ही सामान्य, स्पष्ट लेकिन प्रभावशाली तरीके से लिखते थे। जैसा कि उन्होंने कहा कि समाचारपत्र का पहला महत्वपूर्ण उद्देश्य हैं कि वह लोकप्रिय भावनाओं को समझे और उसे अभिव्यक्ति दे। दूसरा कि वह जनता के बीच कुछ वांछनीय भावनाओं का उद्रेक करें और तीसरा कि वह बिना किसी भय के कमियों को उजागर करें। हालांकि गांधीजी के समाचारपत्रों ने कोई भी विज्ञापन प्रकाशित नहीं किया फिर भी उनका प्रसार बहुत अधिक था। पत्रकारिता के प्रति उनका दृष्टिकोण था कि यह महत्वांकांक्षाओं से परे होनी चाहिए। उनके लिए पत्रकारिता जीविका कमाने का पेशा नहीं है, यह जनता की सेवा करने का एक माध्यम है। यंग इंडिया में उन्होंने 2 जुलाई 1925 में लिखा कि मैने पत्रकारिता को उसकी वजह से नहीं अपनाया बल्कि एक सहायक के रूप में अपनाया जो मेरे जीवन के लक्ष्यों की प्राप्ति मे सहायक बन सकें। मेरा मिशन है उदाहरणों के माध्यम से लोगों को शिक्षित करना और कठिनतम परिस्थितियों में भी सत्याग्रह रूपी शस्त्र का प्रयोग करना जो अहिंसा का प्रत्यक्ष सहयोगी है।
इसी कारण मैं न तो कभी क्रोध में लिखता हूं और न ही किसी दुर्भावना के साथ और न मैं मात्र लोगों की भावनाओं को उद्वेलित करने के लिए लिखता हूं। गांधीजी का यह स्पष्ट मानना था कि पत्रकारिता जनता की सेवा का एक माध्यम है जैसा कि उन्होंने अपनी जीवनी में लिखा हैः पत्रकारिता का एकमात्र और अंतिम उद्देश्य जनता की सेवा है। समाचारपत्र एक महानतम् शक्ति है, परंतु जैसे अनियंत्रित जल का प्रवाह अपने किनारे और आस-पास की फसलों को तो नष्ट करता हैं, ठीक उसी प्रकार एक अनियंत्रित कलम विध्वंस का कार्य करती है। अगर नियंत्रण बाहर से लगा होता है तो यह नियंत्रण की हाच से ज्यादा जहरीला होता है। यह तभी फायदेमंद हो सकता है जब नियंत्रण अंदर से ही हो। अगर यह तर्क उचित है तो विश्व के कितने ऐसे समाचारपत्र है जो इस मानदंड पर खड़े उतरते हैं।
महात्मा गांधी एक राष्ट्रीय नेता और समाज सुधारक होने के साथ-साथ एक महान् संचारक भी थे। उनका यह दृढ़ मत था कि संचार जनमत निर्माण एवं जनता को गतिशीन बनाने का सबसे प्रभावशाली उपकरण है। वे सफल हुए क्योंकि उनके अंदर संचार की अंतर्निहित क्षमता थी जो दक्षिण अफ्रीका में वकालत करने के दौरान और अधिक उभर कर बाहर आई। लोगों से संचार और संवाद करने का अभ्यास तो उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में ही प्रारंभ कर दिया था जिसने उनको इतना बल प्रदान किया कि जब वे वापस भारत आएं तो उन्होंने लाखों देशवासियों को संगठित किया। गांधीजी कुल छः पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े थे जिनमें से दो के वे स्वयं संपादक थे। उनका पहला समाचारपत्र इंडियन ओपिनियन दक्षिण अफ्रीका में प्रारंभ हुआ। भारतीयों की समस्याओं और मांगों को अभिव्यक्त करने के लिए तथा जनमत को उन मांगों के पक्ष में संगठित करने के लिए गांधीजी ने समाचारपत्रों को साक्षात्कार देना एवं उनके लिए लिखना प्रारंभ किया।
प्रारंभ में उन्होंने खुले पत्रों और संपादक के नाम पत्र के माध्यम से अपनी मांगों को रखा परंतु उन्हें जल्दी ही इस बात का एहसास हो गया कि कभी-कभार लिखने से उन्होंने जिस राजनीतिक अभियान को प्रारंभ किया है, को कोई विशेष लाभ नहीं मिलनेवाला है साथ ही यह अपर्याप्त भी है। उन्होंने लोगों तक अपनी बात को पहुंचाने के लिए एक मुखपत्र की आवश्यकता का अनुभव किया, इस कारण जून 1903 में इंडियन ओपिनियन की शुरूआत की। इसने एक साप्ताहिक न्यूज लेटर के उद्देश्यों को भी पूरा किया जो भारतीय समुदाय के बीच सप्ताह भर की खबरों को पहुचाता था। एक जनता की शिक्षा का भी एक बंहतर माध्यम साबित हुआ। समाचारपत्र के काॅलम के माध्यम से गांधीजी पाठकों को साफ-सफाई, स्व अनुशासन और अच्छा नागरिक बनने के लिए शिक्षित करते थे।
गांधीजी ने जलियांवाला बाग हत्याकांड एवं राॅलेट एक्ट के खिलाफ सत्याग्रह की शुरूआत की। उन्होंने अपने दक्षिण अफ्रीका प्रवास के दौरान ही यह जाना था कि राजनीति में जनमत और प्रेस की कितनी महत्वपूर्ण भूमिका है और उन्होंने स्वयं प्रयास कर के ही यह सीख लिया था कि लिखित शब्दों को कैसे प्रभावशाली तरीके से लिखा जाएं। यंग इंडिया और नवजीवन को प्रयोग उन्होंने अपने विचारों को अभिव्यक्त करने और जनता को सत्याग्रह के लिए शिक्षित करने के लिए किया। सन् 1933 में गांधीजी ने अंग्रेजी में हरिजन, गुजराती में हरिजनबंधु एवं हिन्दी में हरिजनसेवक की शुरूआत की। ये समाचारपत्र छूआछूत और ग्रामीण क्षेत्रों में फैली गरीबी के खिलाफ उनके अभियान के साधन बनें। यद्यपि इन समाचारपत्रों में कोई विज्ञापन प्रकाशित नहीं होता था परंतु इनका प्रसार बहुत ही व्यापक था। बलिदान एवं अवज्ञा के बारे में उनके विचार ने प्रेस को सत्याग्रह के एक शस्त्र के रूप में उभरने को प्रेरित किया।
वर्तमान में जब चारो तरफ मीडिया पर बाजार की ताकतों के प्रभाव की चर्चा हो रही है और यह खेद जताया जा रहा है कि अब पत्रकारिता समाज सेवा का पेशा नहीं है। गांधीजी ने कहा था कि ऐसा प्रायः माना जाता है कि समाचारपत्र वैसी कोई भी सामग्री प्रकाशित करते है जो उनके पास उपलब्ध होता है, मात्र स्थान को भरने के लिए। इसका कारण यह है कि ज्यादातर अखबारों की नजर लाभ पर टिकी हुई है। पश्चिमी देशों मे ऐसे कई समाचारपत्र हैं जो बकवास से इतने ज्यादा पटे रहते है कि उनको छूना भी पाप की तरह है। ऐसे में वे अलग-अलग परिवारों और समुदायों के बीच कटुता शत्रुता उत्पन्न कर रहे है। इस प्रकार समाचारपत्र मात्र इस आधार पर आलोचना से नहीं बच सकते कि वे लोगों की सेवा का कार्य करते है।
द्वितीय विश्वयुद्ध ने अखबारों के प्रति सरकार के नजरीए में परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया। क्योंकि पहली बार सरकार ने समाचारपत्र संगठनों द्वारा स्व-नियंत्रण लागू करने पर अपनी सहमति प्रदान की, जिससे उस कटुता को नियंत्रित किया जा सके जो सरकार के नियंत्रण के कारण उत्पन्न होती है। समाचारपत्रों के दो महत्वपूर्ण संगठनों की स्थापना की गई जो थे-इंडियन एण्ड ईस्टर्न न्यूजपेपर सोसायटी तथा आॅल इंडिया न्यूजपेपर एडिटर्स कान्फ्रेंस। ए आई एन ई सी की सहायता से एक प्रेस सलाहकार समिति का गठन किया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि प्रेस पर पिछले कुछ वर्षो से जिस प्रकार के प्रतिबंध लागू थे अब वे इन प्रेस नियामक संस्थाओं और अन्य स्वायत्त निकायों के द्वारा सरकार के स्थान पर स्वयं देखें जाने लगे। अगस्त 1947 में भारत स्वतंत्रता अधिनियम के पारित होने के बाद प्रेस की भूमिका पूरी तरह बदल गई। अब उसके कंधो पर राष्ट्र के पुनर्निमाण की महती जिम्मेदारी आ गई। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू प्रेस की स्वतंत्रता के स्वयं बहुत बड़े पौरोकार थे।
भारतीय प्रेस को सशक्त बनाने में पंडित नेहरू की भूमिका एवं महत्व के बारे में एम. चलपति राव ने लिखा कि स्वतंत्रता के बाद के दौर में नेहरू ने प्रेस के बारे में लोगों की विचारधारा के निर्माण में महती भूमिका अदा की, जैसा कि गांधीजी ने स्वतंत्रता के पूर्व किया था। हालांकि प्रेस के एक प्रभावशाली गुट ने उनका विरोध किया लेकिन वे आगे बढ़ते रहे क्योकि वह एक निर्वाचित सरकार के मुखिया थे और जनता के बीच बहुत अधिक लोकप्रिय थे जबकि प्रेस अभी भी समाज के एक छोटे से वर्ग की विचारधारा का प्रतिनिधित्व कर रहा था। उन्होंने हमेशा ही प्रेस के साथ सहिष्णुता स्थापित करने का प्रयास किया और यह स्वीकार किया कि एक सशक्त प्रेस लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण भाग है। ऐसा माना जाता है कि पंडित नेहरू का प्रेस के प्रति हमेशा ही सद्भावपूर्ण रूख रहा क्योंकि वे स्वयं भी एक पत्रकार थे।
हाल के वर्षो में, भारत में प्रिंट मीडिया ने बहुत ही तेज गति के साथ विकास किया हैं और अब इसकी तुलना विश्व के किसी भी सर्वोत्कृष्ट देश की मीडिया से की जा सकती है। प्रेस की स्वतंत्रता अब हमारा एक मौलिक अधिकार भी है क्योंकि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 क के तहत इसे मान्यता प्रदान की गई है और लोगों ने संविधान प्रदत्त इस अधिकार का निर्बाध प्रयोग किया है। प्रिंट मीडिया ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भी बहुत ही निर्णायक एवं महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। भारत की मुख्यधारा की पत्रकारिता ने मुद्दों पर आधारित अन्वेषनात्मक, व्याख्यात्मक और विकास रिपोर्टिंग में हमेशा ही अग्रणी रहा है।
भारत के सभी महानतम् समाज सुधारकों, नेताओं और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने अपने विचारों एवं मुद्दों को उठाने के लिए प्रेस का सहारा लिया। इनमे से कुछ प्रमुख थे- अरविंदो घोष, एनी बेसेंट, लाजपत राय, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी, बालगंगाधर तिलक और महात्मा गांधी। तिलक ने प्रेस के माध्यम से देश की स्वतंत्रता के संघर्ष को आगे बढ़ाने का कार्य किया। उन्होंने मराठी साप्ताहिक केसरी और अंग्रेजी साप्ताहिक मराठा के माध्यम से जनता को जागरूक एवं शिक्षित बनाने के लिए सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक मसलों पर जमकर लिखा। तिलक ने पत्रकारिता का प्रयोग लोकप्रिय शिक्षा एवं जन आंदोलन के लिए किया।
गांधी-एक महान् संचारक एवं पत्रकार:
भारतीय राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम में गांधी जी के आगमन ने भारतीय इतिहास के संपूर्ण चरित्र को ही बदल दिया। उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन को एक नई दिशा दी और इसके स्वरूप को परिवर्तित किया साथ ही विभिन्न मुद्दों पर जनता के मत को प्रभावित किया। चलपति राव के अनुसार गांधीजी संभवतः सर्वकालिक महानतम् पत्रकार थे और जिन साप्ताहिकों को उन्होंने प्रारंभ किया या संपादित किया वे साप्ताहिक दुनिया में ज्ञात महानतम् साप्ताहिक समाचारपत्र थे। उन्होंने विज्ञापन प्रकाशित नहीं किए परंतु वह यह भी नहीं चाहते थे कि उनका अखबार घाटे में चले। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में पर्याप्त अनुभव अर्जित किए, जहां उन्होंने 1904 ई. में इंडियन ओपिनियन का संपादकत्व ग्रहण किया और इसे अंग्रेजी, तमिल और गुजराती में प्रकाशित कराया। यंग इंडिया और हरिजन, प्रत्येक विषय पर उनके विचारों की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बना। वह बहुत ही सामान्य, स्पष्ट लेकिन प्रभावशाली तरीके से लिखते थे। जैसा कि उन्होंने कहा कि समाचारपत्र का पहला महत्वपूर्ण उद्देश्य हैं कि वह लोकप्रिय भावनाओं को समझे और उसे अभिव्यक्ति दे। दूसरा कि वह जनता के बीच कुछ वांछनीय भावनाओं का उद्रेक करें और तीसरा कि वह बिना किसी भय के कमियों को उजागर करें। हालांकि गांधीजी के समाचारपत्रों ने कोई भी विज्ञापन प्रकाशित नहीं किया फिर भी उनका प्रसार बहुत अधिक था। पत्रकारिता के प्रति उनका दृष्टिकोण था कि यह महत्वांकांक्षाओं से परे होनी चाहिए। उनके लिए पत्रकारिता जीविका कमाने का पेशा नहीं है, यह जनता की सेवा करने का एक माध्यम है। यंग इंडिया में उन्होंने 2 जुलाई 1925 में लिखा कि मैने पत्रकारिता को उसकी वजह से नहीं अपनाया बल्कि एक सहायक के रूप में अपनाया जो मेरे जीवन के लक्ष्यों की प्राप्ति मे सहायक बन सकें। मेरा मिशन है उदाहरणों के माध्यम से लोगों को शिक्षित करना और कठिनतम परिस्थितियों में भी सत्याग्रह रूपी शस्त्र का प्रयोग करना जो अहिंसा का प्रत्यक्ष सहयोगी है।
इसी कारण मैं न तो कभी क्रोध में लिखता हूं और न ही किसी दुर्भावना के साथ और न मैं मात्र लोगों की भावनाओं को उद्वेलित करने के लिए लिखता हूं। गांधीजी का यह स्पष्ट मानना था कि पत्रकारिता जनता की सेवा का एक माध्यम है जैसा कि उन्होंने अपनी जीवनी में लिखा हैः पत्रकारिता का एकमात्र और अंतिम उद्देश्य जनता की सेवा है। समाचारपत्र एक महानतम् शक्ति है, परंतु जैसे अनियंत्रित जल का प्रवाह अपने किनारे और आस-पास की फसलों को तो नष्ट करता हैं, ठीक उसी प्रकार एक अनियंत्रित कलम विध्वंस का कार्य करती है। अगर नियंत्रण बाहर से लगा होता है तो यह नियंत्रण की हाच से ज्यादा जहरीला होता है। यह तभी फायदेमंद हो सकता है जब नियंत्रण अंदर से ही हो। अगर यह तर्क उचित है तो विश्व के कितने ऐसे समाचारपत्र है जो इस मानदंड पर खड़े उतरते हैं।
महात्मा गांधी एक राष्ट्रीय नेता और समाज सुधारक होने के साथ-साथ एक महान् संचारक भी थे। उनका यह दृढ़ मत था कि संचार जनमत निर्माण एवं जनता को गतिशीन बनाने का सबसे प्रभावशाली उपकरण है। वे सफल हुए क्योंकि उनके अंदर संचार की अंतर्निहित क्षमता थी जो दक्षिण अफ्रीका में वकालत करने के दौरान और अधिक उभर कर बाहर आई। लोगों से संचार और संवाद करने का अभ्यास तो उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में ही प्रारंभ कर दिया था जिसने उनको इतना बल प्रदान किया कि जब वे वापस भारत आएं तो उन्होंने लाखों देशवासियों को संगठित किया। गांधीजी कुल छः पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े थे जिनमें से दो के वे स्वयं संपादक थे। उनका पहला समाचारपत्र इंडियन ओपिनियन दक्षिण अफ्रीका में प्रारंभ हुआ। भारतीयों की समस्याओं और मांगों को अभिव्यक्त करने के लिए तथा जनमत को उन मांगों के पक्ष में संगठित करने के लिए गांधीजी ने समाचारपत्रों को साक्षात्कार देना एवं उनके लिए लिखना प्रारंभ किया।
प्रारंभ में उन्होंने खुले पत्रों और संपादक के नाम पत्र के माध्यम से अपनी मांगों को रखा परंतु उन्हें जल्दी ही इस बात का एहसास हो गया कि कभी-कभार लिखने से उन्होंने जिस राजनीतिक अभियान को प्रारंभ किया है, को कोई विशेष लाभ नहीं मिलनेवाला है साथ ही यह अपर्याप्त भी है। उन्होंने लोगों तक अपनी बात को पहुंचाने के लिए एक मुखपत्र की आवश्यकता का अनुभव किया, इस कारण जून 1903 में इंडियन ओपिनियन की शुरूआत की। इसने एक साप्ताहिक न्यूज लेटर के उद्देश्यों को भी पूरा किया जो भारतीय समुदाय के बीच सप्ताह भर की खबरों को पहुचाता था। एक जनता की शिक्षा का भी एक बंहतर माध्यम साबित हुआ। समाचारपत्र के काॅलम के माध्यम से गांधीजी पाठकों को साफ-सफाई, स्व अनुशासन और अच्छा नागरिक बनने के लिए शिक्षित करते थे।
गांधीजी ने जलियांवाला बाग हत्याकांड एवं राॅलेट एक्ट के खिलाफ सत्याग्रह की शुरूआत की। उन्होंने अपने दक्षिण अफ्रीका प्रवास के दौरान ही यह जाना था कि राजनीति में जनमत और प्रेस की कितनी महत्वपूर्ण भूमिका है और उन्होंने स्वयं प्रयास कर के ही यह सीख लिया था कि लिखित शब्दों को कैसे प्रभावशाली तरीके से लिखा जाएं। यंग इंडिया और नवजीवन को प्रयोग उन्होंने अपने विचारों को अभिव्यक्त करने और जनता को सत्याग्रह के लिए शिक्षित करने के लिए किया। सन् 1933 में गांधीजी ने अंग्रेजी में हरिजन, गुजराती में हरिजनबंधु एवं हिन्दी में हरिजनसेवक की शुरूआत की। ये समाचारपत्र छूआछूत और ग्रामीण क्षेत्रों में फैली गरीबी के खिलाफ उनके अभियान के साधन बनें। यद्यपि इन समाचारपत्रों में कोई विज्ञापन प्रकाशित नहीं होता था परंतु इनका प्रसार बहुत ही व्यापक था। बलिदान एवं अवज्ञा के बारे में उनके विचार ने प्रेस को सत्याग्रह के एक शस्त्र के रूप में उभरने को प्रेरित किया।
वर्तमान में जब चारो तरफ मीडिया पर बाजार की ताकतों के प्रभाव की चर्चा हो रही है और यह खेद जताया जा रहा है कि अब पत्रकारिता समाज सेवा का पेशा नहीं है। गांधीजी ने कहा था कि ऐसा प्रायः माना जाता है कि समाचारपत्र वैसी कोई भी सामग्री प्रकाशित करते है जो उनके पास उपलब्ध होता है, मात्र स्थान को भरने के लिए। इसका कारण यह है कि ज्यादातर अखबारों की नजर लाभ पर टिकी हुई है। पश्चिमी देशों मे ऐसे कई समाचारपत्र हैं जो बकवास से इतने ज्यादा पटे रहते है कि उनको छूना भी पाप की तरह है। ऐसे में वे अलग-अलग परिवारों और समुदायों के बीच कटुता शत्रुता उत्पन्न कर रहे है। इस प्रकार समाचारपत्र मात्र इस आधार पर आलोचना से नहीं बच सकते कि वे लोगों की सेवा का कार्य करते है।
द्वितीय विश्वयुद्ध ने अखबारों के प्रति सरकार के नजरीए में परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया। क्योंकि पहली बार सरकार ने समाचारपत्र संगठनों द्वारा स्व-नियंत्रण लागू करने पर अपनी सहमति प्रदान की, जिससे उस कटुता को नियंत्रित किया जा सके जो सरकार के नियंत्रण के कारण उत्पन्न होती है। समाचारपत्रों के दो महत्वपूर्ण संगठनों की स्थापना की गई जो थे-इंडियन एण्ड ईस्टर्न न्यूजपेपर सोसायटी तथा आॅल इंडिया न्यूजपेपर एडिटर्स कान्फ्रेंस। ए आई एन ई सी की सहायता से एक प्रेस सलाहकार समिति का गठन किया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि प्रेस पर पिछले कुछ वर्षो से जिस प्रकार के प्रतिबंध लागू थे अब वे इन प्रेस नियामक संस्थाओं और अन्य स्वायत्त निकायों के द्वारा सरकार के स्थान पर स्वयं देखें जाने लगे। अगस्त 1947 में भारत स्वतंत्रता अधिनियम के पारित होने के बाद प्रेस की भूमिका पूरी तरह बदल गई। अब उसके कंधो पर राष्ट्र के पुनर्निमाण की महती जिम्मेदारी आ गई। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू प्रेस की स्वतंत्रता के स्वयं बहुत बड़े पौरोकार थे।
भारतीय प्रेस को सशक्त बनाने में पंडित नेहरू की भूमिका एवं महत्व के बारे में एम. चलपति राव ने लिखा कि स्वतंत्रता के बाद के दौर में नेहरू ने प्रेस के बारे में लोगों की विचारधारा के निर्माण में महती भूमिका अदा की, जैसा कि गांधीजी ने स्वतंत्रता के पूर्व किया था। हालांकि प्रेस के एक प्रभावशाली गुट ने उनका विरोध किया लेकिन वे आगे बढ़ते रहे क्योकि वह एक निर्वाचित सरकार के मुखिया थे और जनता के बीच बहुत अधिक लोकप्रिय थे जबकि प्रेस अभी भी समाज के एक छोटे से वर्ग की विचारधारा का प्रतिनिधित्व कर रहा था। उन्होंने हमेशा ही प्रेस के साथ सहिष्णुता स्थापित करने का प्रयास किया और यह स्वीकार किया कि एक सशक्त प्रेस लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण भाग है। ऐसा माना जाता है कि पंडित नेहरू का प्रेस के प्रति हमेशा ही सद्भावपूर्ण रूख रहा क्योंकि वे स्वयं भी एक पत्रकार थे।
हाल के वर्षो में, भारत में प्रिंट मीडिया ने बहुत ही तेज गति के साथ विकास किया हैं और अब इसकी तुलना विश्व के किसी भी सर्वोत्कृष्ट देश की मीडिया से की जा सकती है। प्रेस की स्वतंत्रता अब हमारा एक मौलिक अधिकार भी है क्योंकि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 क के तहत इसे मान्यता प्रदान की गई है और लोगों ने संविधान प्रदत्त इस अधिकार का निर्बाध प्रयोग किया है। प्रिंट मीडिया ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भी बहुत ही निर्णायक एवं महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। भारत की मुख्यधारा की पत्रकारिता ने मुद्दों पर आधारित अन्वेषनात्मक, व्याख्यात्मक और विकास रिपोर्टिंग में हमेशा ही अग्रणी रहा है।

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