भारत में प्रेस कानूनों का इतिहास बहुत पुराना है। जिसकी जड़े उपनिवेशिक काल में तलाशी जा सकती है। विदेशी सरकार के विरूद्ध लोगों की घ्रणा और प्रतिरोध की अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध के लिए ब्रिटिश सरकार ने कुछ कानून और अध्यादेश लागू किये थे जिसका उद्देश्य था प्रेस पर सेंसरशिप लागू करना, प्रेस के लिए लाईसेंस को अनिवार्य बनाना और प्रेस की स्वतंत्रता का गला घोंटना। पहला नियामक प्रयास सन् 1799 में किया गया। और भारत में पहला प्रेस अधिनियम लागू हुआ। इस अधिनियम के अंतर्गत समाचार पत्रों को यह निर्देशित किया गया कि वे अपने मुद्रक, प्रकाशक और संपादक का नाम और पता अपने संस्करण में मुद्रित करे। हांलाकि इस अधिनियम को सन् 1813 में समाप्त कर दिया। सन् 1857 में सरकार ने एक कानून पारित किया जिसे गेगिंग एक्ट के रूप में जाना जाता है। इस कानून के अनुसार प्रिटिंग पे्रस को चलाने के लिए अनिवार्य रूप से लायसेंस लेने की व्यवस्था को लागू किया गया। इससे सरकार को यह शक्ति प्राप्त हो गई कि वह किसी भी समाचार पत्र के प्रकासन व प्रसार पर प्रेतिषेध लगा सके। निषेध का यह नियम पुस्तकों दूसरी मुद्रित सामग्रियों पर भी था। इसके द्वारा वे ऐसे समाचारों और कथनों के प्रकाशन और प्रसार पर प्रतिबंध लगा दिया गया जिससे घृण, विरोध या विद्वेश के फैंलने की आशंका थी या जिससे सरकार की अवमानना होती थी और सरकार के प्रति असंतोष तथा गैर कानूनी विरोध उत्पन्न होता था या फिर जो सरकार के गैर कानूनी शासन को कमजोर करती थी। हांलाकि इस कानून की भी समाप्ति जून 1858 में हो गई। दूसरा महत्वपूर्ण अधिनियम था सन् 1878 में पारित वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट 1 लार्ड रिटर्न द्वारा पारित कराया गया। यह अधिनियम भाषायी पे्रस की स्वतंत्रता पर ब्रिटिश सरकार का सबसे बड़ा आक्रमण था। इस कानून के अंतर्गत वैसे किसी लेखन के प्रकाशन पर सरकार प्रतिबंध लगा सकती थी जो विद्रोह को उकसाने वाला प्रतीत होता है और वैसे प्रकाशकों और मुद्रकों को दण्डात्मक प्रतिबंध की भी व्यवस्था थी जो इस नियम का पालन नहीं करेंगे, इस कानून के अंतर्गत कोई भी जिला दण्डाधिकारी और पुलिस कमिश्नर किसी भी समाचार पत्र की प्रकाशन या मुद्रक से सुरक्षा राशि की मांग कर सकता था, इस सुरक्षा राशि को जप्त कर सकता था और किसी भी मुद्रित सामग्री को जो संदेहास्पद हो को जप्त कर सकता था और इसके खिलाफ संबंधित पत्र कानून का सहारा नहीं ले सकता था वर्नाक्यूलर पेे्रस एक्ट का दमन तब तक चलता रहा, जब तक 1880 में लार्ड रिपन की वायसराय पद पर नियुक्ति ना हो गई। अपना कार्यकाल ग्रहण करते ही लार्ड रिपन ने जो सबसे पहला काम किया वह था अलोकप्रिय कानून को समाप्त करना। रिपन ने कई उदारवादी सुधारों को भी लागू किया और ऐसा करके उसने भारतीयों की सद्भावना अर्जित की।
सन् 1885 में इण्डियन नेशनल कंाग्रेस की स्थापना से भारतीय प्रेस की स्थापना में मील के पत्थर का काम किया। कांगेे्रस के जन्म ने समाचार पत्रों की राष्ट्रीय भावना की अभिव्यक्ति की मजबूती के साथ और पूरजोर तरीके से करने का अवसर प्रदान किया। ब्रिटिश शासन के खिलाफ राष्ट्रवादों आंदोलनों के बढ़ते प्रभाव व उसमें प्रेस की सहयोगी भूमिका ने ब्रिटिश शासन के कान खड़े कर दिये और इसका प्रतिफल इण्डियन प्रेस एक्ट 1910 के रूप में देखने को मिला। यह कानून जन माध्यमों पर सरकार के नियत्रंण को बढ़ाने के उद्देश्य से लागू किया गया था। इस कानून के अंतर्गत पे्रस के मालिकों को सुरक्षा निधि जमा करनी पड़ती थी जो जमा राशि कभी भी जप्त की जा सकती थी। अगर उसने किसी संवेदनशील सामग्री का प्रकाशन किया और उसके खिलाफ अगली कार्यवाही भी की जा सकती थी, जिसमंे प्रेस को जब्त किया जा सकता था अगर उसने ऐसा करना जारी रखा तो इसके तहत कस्टम और डाक अधिकारियों को यह अधिकार मिला कि वह ऐसे किसी भी डाक को रोक सकते थे जिसमें संवेदनशील सामग्री होने की संभावना हो। इसके साथ ही पुलिस को जांॅच करने और जप्त की कार्यवाही करने का व्यापक अधिकार मिला। इस कानून की भयावहता का पता इस बात से पता गलता है कि मात्र 1910 से 1914 के बीच सरकार ने 355 केस दर्ज किये।
स्वतंत्रता पूर्व की अवधि में भारतीय प्रेस को इसी तरह की तमाम परेशानियों और दबाओं का लगातार सामना करना पड़ा। समाचार पत्रों और प्रेस से प्रायः ही सुरक्षा राशि या अतिरिक्त सुरक्षा राशि जमा करने को कहा जाता। साथ ही अक्सर उनके द्वारा जमा की गई सुरक्षा राशि को जप्त कर लिया जाता और कई समाचार पत्रों को इस दौरान अपने प्रकाशन बंद करने पड़े। जैसे-जैसे राष्ट्रवादी आंदोलन अनवरत बढ़ता जा रहा था, सरकार और प्रेस के रिश्ते भी धीरे-धीरे खराब होते जा रहे थे। इसी बीच द्वितीय विश्व युद्ध आरंभ हो गया। इसके परिणाम स्वरूप नियंत्रण के लिए कई नये अध्यादेश और कानून लागू किये गये। साथ ही फ्री सेंसरशिप की व्यवस्था को फिर से लागू किया गया। राष्ट्रवादियों ने इसी दौरान महात्मा गाॅंधी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आंदोलन को फिर से आंरभ कर दिया। जिससे सरकार पर अतिरिक्त दबााव आ गया। जब 1943 में लार्ड बेबेल ने वायसराय के रूप में भारत की कमान संभाली तब यह पूर्णतः स्पष्ट हो गया था कि जल्द ही भारत को स्वतंत्रता प्रदान कर दी जायेगी और इस परिस्थति में किसी भी तरह की दमनात्मक कार्यवाही या उपाय बैकार साबित होंगे। परिणामस्वरूप जैसे ही द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति हुई सत्ता के हस्तांतरण की प्रक्रिया पूरी हो गई और प्रेस पर लगवाये गये अधिकांश नियंत्रण समाप्त हो गये।
कई ऐसे महत्वपूर्ण कानून जो ब्रिटिश व्यवस्था के अंतर्गत लागू किये गये आज भी पूर्णतः या अंशतः प्रक्रिया में है और स्वतंत्रता के बाद व्यवस्था के सफल संचालन के लिए कई कानून भी बनाये गये। कई ऐसे महत्वपूर्ण कानून है जिनके बारे में एक पत्रकार को जरूर जानना चाहिये।
1. मानहानिः- द्वितीय प्रेस आयोग द्वारा मानहानि कानून की विवेचना करते हुए कहा गया कि यह दो हितों की कहानी है। ये दो हित है, व्यक्ति की प्रतिष्ठा एवं सम्मान से जुड़ा हित और समाज में सूचना के स्वतंत्र प्रभाव का हित। अपने समाचारों के संकलन के दौरान कई बार प्रेस और सरकार आमने-सामने आ जाते है साथ ही कभी-कभी व्यक्ति साख और प्रतिष्ठा की रक्षा का अधिकार और स्वतंत्र अभिव्यक्ति तथा स्वतंत्र पेे्रस का अधिकार एक-दूसरे से टकराते है। व्यक्ति की प्रतिष्ठा के संरक्षण का अधिकार मानहानि के इस कानून के दायरे में आता है। मानहानि की इस जटिल अवधारणा को समझने के लिए सर्वप्रथम हमंे कुछ परिभाषाओं को जानना चाहियेः-
क. लाईबल:- लाईबल लिखित मानहानि को कहा जाता है। ऐसे कथन जो किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा और उसके नाम को धूमिल करते हो और उसके प्रति घृणा या विद्वेश के माध्यम से उसके व्यक्तिगत या व्यवसायिक उद्देश्यों को नुकसान पहुंचाते हो लिखित मानहानि माने जाते है इसलिये किसी भी लेखन से पूर्व यह सावधानी बरतनी चाहिये। कई मामलों में पुलिस अधिकारी किसी व्यक्ति को किसी अलग मामले के तहत हिरासत में लेता है, लेकिन जब साक्ष्यों को जाॅंच की जाती है तो साक्ष्य आरोपों की पुष्टि नहीं करते, इस कारण अधिकतर समाचार पत्रों के संपादक किसी गिरफ्तार व्यक्ति का नाम तभी प्रकाशित करना पसंद करते है जब किसी मामले के तहत आरोप दर्ज किये गये हो। दुर्भाग्य से कई बार डेडलाईन और खबरों की होड में कई समाचार पत्र किसी व्यक्ति का नाम आरोप दर्ज होने से पहले ही प्रकाशित कर देते है। इन परिस्थितियों में किसी नाम को प्रकाशित करने से पहले बहुत अधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है। अगर किसी व्यक्ति को बलात्कार के किसी आरोप में आरोपित किया जाता है और समाचार पत्र उसे बलात्कार के अभियुक्त के रूप में प्रकाशित करता है और बाद मंे उस व्यक्ति पर लगे आरोप छेड़-छाड़ के आरोप साबित होते है तो वह व्यक्ति समाचार पत्र के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर कर सकता है।
ख. स्लेंडरः-यह मौखिक मानहानि है। हांलाकि अगर किसी व्यक्ति के खिलाफ मानहानि कारक कथन प्रसारित किया जाता है तो इसका मुकदमा लिखित मानहानि के अंतर्गत दायर होता है। जबकि तकनीकी रूप से वे कथन लिखित रूप में उपलब्ध नहीं होते है। मौखिक मानहानि के अपेक्षा लिखित मानहानि ज्यादा खतरनाक होती है और इसके बदले गंभीर दण्ड देने का प्रावधान है।
ग. लाईबल पर से:- कुछ शब्द हमेशा ही मानहानि कारक होते है। झूठे लिखित आरोप जैसे किसी व्यक्ति को चोर या जालसाझ और ढोंगी या बहरूपीया लिखना स्वतः लिखित मानहानि की श्रेणी में आता है।
घ. लाईबल पर क्वेडः- कुछ शब्द जो सामान्य रूप से पूरी तरह नासमझी से भरे होते है। किन्हीं दूसरी परिस्थितियों में मानहानि कारक होते है। रिपोर्टिंग में जैसे -यदि गलती से ही यह लिख दिया जाये कि कल रात्रि के भोजन में श्रीमान् अशोक मांस खाते हुए दिखे थे तो यह तब तक हानिकर नहीं है, परन्तु अगर श्रीमान् अशोक वैश्विक शाकाहरी संगठन के प्रधान है तो यह बहुत ही हानिकर और मानहानि कारक साबित होगा।
मीडिया के खिलाफ लिखित मानहानि मामला चलाने से पहले निम्नांकित पांच बिन्दुओं की पुष्टि करनी होती हैः-
क. क्या कथन विशेष से उस व्यक्ति को कोई हानि या उसकी बदनामी वास्तविकता में हुई है?
ख. क्या किसी भी तरह उस व्यक्ति विशेष की पहंचान को किसी तरिके से उजागर किया गया?
ग. क्या मानहानि कारक किसी कथन से विशेष से प्रकाशित किया गया।
घ. क्या इसमें सत्य में मिडिया की गलती थी या यह जानबूझकर की गई।
ड़. क्या प्रकाशित या प्रसारित कोई सामग्री झूठी थी ?
हालाकि प्रत्येक गलती जो प्रकाशित की जाती है या हो जाती है मानहानिकारक नहीं होती। गलती से यह लिख देना कि किसी व्यक्ति की मृत्यु हो गई, मानहानिकारक नहीं है। वास्तविक हानि तब होती है जब किसी मानहानिकारक टिप्पणी से भौतिक असुविधा, आय में हानि या किसी कार्य को करने में परेशानियों का सामना करना पड़ता है। लाईबल के अंतर्गत किसी मुकदमें को जीतने के लिए यह प्रमाणित करना होता है कि मीडिया संगठन द्वारा गलती या असावधानी की वजह से ऐसा हुआ।
ड़. लाईबल सूट डिफेंसेसः- लाईबल या लिखित तीन परंपरागत बचाव है- सत्य, विशेषाधिकार और स्वच्छ टिप्पणी या आलोचना। इनमें से प्रथम सत्य है कि, किसी भी लिखित मानहानि का सबसे बेेहतर बचाव का आधार सत्य है। हांलाकि सत्य को जानना अलग बात है और इसे प्रमाणित करना अलग। जो रिपोर्ट किया जाता है उसे सत्य प्रमाणित करना पड़ता है तब मानहानि का मामला नहीं बनता। हांलाकि इस बचाव का प्रयोग कभी-कभार ही किया जाता है क्योंकि किसी कथन की सत्यता को प्रमाणित करना बहुत ही कठिन कार्य है। दूसरा महत्वपूर्ण बचाव विशेषाधिकार है। कुछ विशेष परिस्थितियों में न्यायालय का यह मानना है कि जनता के जानने का अधिकार किसी व्यक्ति के प्रतिष्ठा के संरक्षण के अधिकार से ज्यादा महत्वपूर्ण है। न्यायालयीन प्रक्रियाएॅं गिरफ्तारी वारंट, विधायी प्रकियाएॅं ऐसी परिस्थितियों के अंतर्गत आते है जो विशेषाधिकार की श्रेणी में होते है। अगर एक रिपोर्ट इन घटनाओं की स्वच्छ एवं वास्तविक रिपोर्ट देता है तो किसी कानून के तहत उसे दण्डित नहीं किया जा सकता चाहे प्रकाशित सामग्री में मानहानिकारक कथन क्यों न हो। तीसरा महत्वपूर्ण बचाव है, स्वच्छ टिप्पणी एवं आलोचना। कोई भी व्यक्ति जो सार्वजनिक जीवन व्यतीत करता है उसकी स्वच्छ आलोचना की जा सकती है। इसका अर्थ यह है कि सरकारी अधिकारी और व हर व्यक्ति जो सार्वजनिक जीवन में हो स्वच्छ आलोचना का पात्र है। हांलाकि यह बचाव केवल विचारों और आलोचनाओं तक ही सीमित होता है न कि तथ्यों की गलत प्रस्तुति तक इस प्रकार आप तभी तक सुरक्षित है जब तक आप उन तथ्यों के साथ छेड़-छाड नहीं करते जिन पर आपकी आलोचना या टिप्पणी आधारित है।
दण्डः- भारतीय दण्ड संहिता की धारा 500 के तहत मानहानि के लिए दण्ड का प्रावधान किया गया है। इस धारा के अनुसार अगर कोई किसी दूसरे को बदनाम करता है तो उसे दो साल सामान्य कारावास की सजा या जुर्माना या फिर सजा तथा जुर्माना दोनों दिया जाए। एक पत्रकार के लिए यह दण्ड और भी गंभीर हो सकता है क्यांेकि उसके द्वारा प्रकाशित वाक्य विस्तृत ढ़ंग से प्रचारित होते है।
न्यायालय अवमानना कानून 1971
प्रथम पे्रस आयोग ने न्यायालय अवमानना कानून 1952 में किसी भी संस्था समिति ने अवमानना से जुड़े कानूनांे का विस्तृत अध्ययन किया इसकी संस्तुतियों के आधार पर न्यायालय अवमानना अधिनियम कानून को रद्द कर दिया गया। अवमानना कानून 1971 में पहली बार न्यायालय अवमानना की संपूर्ण परिभाषा दी गई और इसमें अनुच्छेद 2 में न्यायालयीन निर्णयों के परिणामों को सूचीबद्ध किया गया। अनुच्छेद 2 के परिच्छेद ‘ए’ के तहत अवमानना दो दो वर्गो में विभाजित किया गया है:-(1) दीवानी अवमानना (2) फौजदारी अवमानना
अनुच्छेद 2 के परिछेद ‘बी’ के अंतर्गत न्यायालय के किसी निर्णय निर्देश आदेश डिक्री रिट एवं अन्य दूसरी प्रक्रियाओं की जानबूझकर अवमानना और न्यायालय के समक्ष किए गए किसी घोषणा से मुकरना दिवानी अवमानना के अंतर्गत आता है।
अनुच्छेद 2 के परिच्छेद ‘सी’ के तहत कोई भी प्रकाशन जो न्याय के शासन या न्यायिक प्रशासन का अवमुलयन करता है और न्यायालय के कार्यो में हस्तक्षेप करता है या करने की प्रवृत्ति है इस धारा के अंतर्गत फौजदारी अवमानना हेतु आरोपित किया जाएगा। परिच्छेद ‘सी’ अनुसार फौजदारी अवमानना से तात्पर्य ऐसे प्रकाशन चाहे वो शब्द रूप में हो, लिखित या मौखिक हो, प्रतिक के रूप में हो, दृश्य प्रतिनिधिक रूप में हो या अन्य किसी रूप में हो या कोई भी अन्य सामग्री या अन्य किसी भी कार्य जो-
1. न्यायालय की सत्ता को नाराज करती है या नाराज करने की प्रवृत्ति हो तथा न्यायालय की गरीमा को कम करती हो या कम करने की प्रवृत्ति हो।
2. और पूर्वाग्रह ग्रस्त हो या हस्तक्षेप करती हो या करने की प्रवृत्ति हो किसी भी न्यायालयीन प्रक्रिया में बाधा डालती हो या बाधा डालने की प्रवृत्ति हो, किसी भी प्रकार से न्यायालय के प्रशासन में,
इस धारा के अंतर्गत न्यायालय की फौजदारी अवमानना के लिए आरोपित किया जा सकता है। ऐसी कोई भी सामग्री जिसका प्रशासन जनता के दिमाग में न्यायाधीशों की योग्यता, ईमानदारी, और सत्यनिष्ठा के प्रति शंका उत्पन्न करता है और कोर्ट के न्याय के प्रशासन के प्रति किसी भी वादी के मन में अविश्वास उत्पन्न करता है, न्यायालय की अवमानना के लिए आरोपित किया जा सकता है। कोई भी प्रकाशन जो किसी न्यायाशीध के मन में अपने आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन के लिए उलझन उत्पन्न करता है, न्यायालय की अवमानना करता है। लेकिन मगर यह प्रमाणित होता हैं कि संबंधित लेखन ने न्यायालय की सत्ता एवं प्रतिष्ठा का अवमूल्यन किया है और इससे न्यायालय के प्रशासन में जनता का विश्वास कम हुआ है तब यह अवमानना का मामला बतना है। चाहे यह निदांपरक आलोचना न्यायाधीयों के गैर न्यायालयीन कार्यो से क्यों न जुड़ा हुआ हो किसी मामले में निर्णय में गलत मंशा से लांघन लगाना भी स्पष्ट रूप से न्यायालय की अवमानना है। प्रेस को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी भी आलोचना को या किसी पक्ष का समर्थन करे। न्याय के प्रशासन समेत सार्वजनिक क्षेत्र से जुड़े प्रत्येक विषय निडर और आलोचनात्मक टिप्पणी के परिक्षेत्र में आते हो। प्रेस की सार्वजनिक कार्य एवं भूमिका से यह बाध्यता भी जुुड़ी हुई है कि वह सभी का सम्मान करते हुए अपने दायित्वाऐं का निर्वाहन करें। इस प्रकार के दायित्व बोध के बिना एक स्वतंत्र प्रेस अन्याय का एक शक्तिशाली हथियार बन जाता है। न्यायालय की यह जिम्मेदारी है कि वह अपनी सत्ता को व्यवस्थित रखते हुए प्रेस की स्वतंत्रता और सार्वजनिक हित के मुद्दों पर टिप्पणी करने के प्रेस के अधिकार के बीच एक सांमजस्य स्थापित करे। क्योंकि बिना स्वतंत्र पे्रस के स्वतंत्र समाज की कल्पना नहीं की जा सकती। प्रेस की स्वतंत्रता यद्य िस्वयं में कोई लक्ष्य नहीं है। बल्कि यह स्वतंत्र समाज की स्थापना के लक्ष्य का एक साधन मात्र है। ठीक उसी प्रकार न्यायापालिका की स्वतंत्रता भी स्वतंत्र समाज की स्थापना के लक्ष्य का माध्यम है और यह सत्य है कि स्वतंत्र न्यायपालिका का सुचारू रूप से कार्य करना प्रेस की स्वतंत्रता की स्थापना के लिए एक अनिवार्य शर्त है। हांलाकि एक स्वतंत्र न्यायपालिका से अधिक स्वतंत्र प्रेस को महत्ता नहीं दी जा सकती। ठीक उसी प्रकार एक स्वतंत्र न्यायपालिका को एक स्वतंत्र प्रेस से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं माना जा सकता। इस प्रकार दोनों एक दूसरे के पूरक है। और सहयोगी है। यद्यपि न्यायाधीश भी मानव होते है और उनके मानवीय भूलों की अपेक्षा लाजमी है। अपराध से जुड़े समाचारों का प्रकाशन समाचार पत्रों की नियमित विशेषता है। इस प्रकार की सामग्री जनरूचि और जन सरोकार से जुड़ी होती है लेकि यह स्पष्ट है कि इन अपराधों पर मुकदमा जल्दी या देेरी से चलता ही है। अपराध की एक रिपोर्ट चाहे किनती भी स्टीक क्यों न हो एक ऐसे सत्य को प्रदर्शित करता है जिस पर मुकदमें के दौरान गर्म विवाद होना लाजमी है। या चाहे पहचान का एक प्रश्न हो सकता है या एक छोटा सा संक्षिप्त विवरण हो सकता है। लेकिन कभी-कभार यह मुकदमें के रूप को पलट देता है। एक रिपोर्ट तैयार करने के लिए सामान्यतः गवाहों को साक्षात्कार करना आावश्यक होता है जिनका मुकदमें के दौरान भी बयान लिया जाता है। एक रिपोर्टर किसी घटना का पूरा ब्यूरा प्राप्त करने में सफल हो सकता है और ऐसी महत्वपूर्ण सामग्री प्रकाशित करने की स्थिति में हो सकता है तो बाद में मुकदमें के दौरान साक्ष्य का कार्य कर सकते है। लेकिन उनमें प्रकाशन के कई खतरे भी है। खासतौर पर ऐसी स्थिति में जब अपराध में शक की सूई किसी खास व्यक्ति की ओर घुमी हो। एक आरोपी की तस्वीरों का प्रकाशन भी बहुत बारिकी का विषय हो सकता है क्योंकि कई अपराधिक मुकदमों में आरोपी की पहचान करना अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दा होता है। एक गवाह जो किसी आरोपी की अपनी याददास्त के आधार ईमानदारी से तस्वीर नहीं बनवा सकता लेकिन अगर उसने आरोपी की तस्वीर समाचार पत्रों में देखी है तो वह उसे आजादी से पहचान सकता है। हांलाकि इस प्रकार का प्रकाशन अभियोजन पक्ष के साक्षियों की पहचान के बारे में शंका उत्पन्न करा सकता है और आरोपी को खतरे में डाल सकता है दूसरी ओर वांछित व्यक्ति की तस्वीर कभी-कभी पुलिस के अनुरोध पर प्रकाशित की जाती है जिससे उसकी गिरफ्तारी में मदद मिल सके या लोगों को उसके खिलाफ सावधान किया जा सकें या फिर दोनों ही कार्य किये जा सके। इसलिये यह प्रश्न उन तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है कि कौन सा प्रकाशन किसी खास मासले में कानून की अवमानना करता है और पत्रकार अक्सर की संभावित अपराधों, कदाचार और दुव्र्यवहार की जांच करते है और साक्ष्य इक्कठा करते है। एक ओर जहां इस तरह की सामग्रियों का प्रसारण सार्वजनिक हित में होता है वहीं यह समाचार पत्रों को अपना प्रसार बढ़ाने में मदद भी करता है। न्यायालय अवमानना कानून ऐसे किसी इक्कठा किये गये साक्ष्य के प्रकाशन में बाधा नहीं डाल सकता जिसमें आरोपी पहले ही गिरफ्तार हो चुका है और उस पर आरोप गठित हो गये है लेकिन जब न्यायिक प्रक्रिया चलती रहती है, प्रेस को साक्ष्यांे को प्रकाशित नहीं करना चाहिये। जब किसी व्यक्ति पर अपराध के लिए मुकदमा चलता है और प्रेस के पास यह साक्ष्य हो कि कोई दूसरा व्यक्ति उस अपराध के लिए दोषी है, प्रेस को उन साक्ष्यों को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना चाहिये। इस प्रकार की प्रक्रिया को अपनाते हुए प्रेस अपने इस खोजी प्रयास के लिउ क्रेडिट प्राप्त कर सकता है और अपने इस प्रयास का अपना प्रसार विशेष काॅलम का प्रकाशन कर बढ़ा भी सकता है। हांलाकि न्यायालय को नाराज करने के लिए दण्ड देने की शक्ति कोर्ट को होती है। फिर भी इसका प्रयोग बहुुत ही किफायत से ओर न्याय के शासन की मर्यादा के लिए किया जाना चाहिये। इसका प्रयोग किसी न्यायाधीश का व्यक्तिगत रूप से अपमान कर नहीं करना चाहिये। प्रमाणिक आलोचना जिसमें न्यायालयीन कार्यो की स्वच्छ और तर्क संगत आलोचना हो और जिसमें सार्वजनिक हित छुपा हो अवमानना के अंतर्गत नहीं आता है। लेकिन न्यायाधीशों के प्रति गलत उद्देश्य से आरोप लगाया जाता है तब यह प्रमाणिक माना जाता है। न्यायालय के किसी फैसले के गलत होने पर उसकी आलोचना की जा सकती है परन्तु इस फैसले के लिए किसी न्यायाधीश पर बेईमानी का आरेाप नहीं लगाया जा सकता है।
अगर कोई कथन पूर्वाग्रह से पूर्ण हो और न्याय की प्रक्रिया में हस्तक्षेप हो तब तथ्यों की सत्यता जिस पर यह टिका हुआ है कोई बचाव नहीें होता। समाचार पत्रों द्वारा ट्रायल या मिडिया ट्रायल न्यायालय के न्यायिक प्रशासन में हस्तक्षेप माना जाता है। यद्यपि न्याय की प्रक्रिया में हस्तक्षेप या बांधा डालने के लिए दण्डित किया जा सकता है, अगर ऐसा हस्तक्षेप वास्तविक तौर पर डाला गया हो उसी प्रकार एक व्यक्ति को अनभिज्ञता में किये गये प्रकाशन और उसमें वितरण के लिए न्यायालय अवमान का आरोपी नहीं बनाया जा सकता, चाहे वह मामला अपमान प्रतीत क्यों न होता हो।
न्यायालय अवमानना की सीमाएॅंः- अज्ञानता में किया गया प्रकाशन या विवतरण जो इस कानूनी की किसी भी धारा के अंतर्गत आता हो न्यायालयीन प्रक्रियाओं की स्वच्छ एवं वास्तविक रिपोर्ट विचाराधीन न्यायिक प्रक्रियाओं की स्वच्छा एवं वास्तविक रिपोर्ट को जो इस कानून की धारा 4 के अंतर्गत संरक्षित है लेकिन धारा 7 के अंतर्गत इस प्रकार के प्रकाशन पर कोई निषेध नहीं है। धारा 7 केवल उस प्रकार के प्रकाशनों पर निषेध लगाती है जब किसी न्यायालय ने उस प्रकाशन पर किसी निश्चित आधार पर प्रतिबंध लगाया हो जैसेः-
राष्ट्र की सुरक्षा एवं सार्वजनिक आदेश से संबंधित विषय न्यायिक विधानों की स्व्च्छ आलोचना, न्यायिक विधानों और न्यायिक फेसलों की स्वच्छ आलोचना का प्रकाशन जो धारा 5 के अंतर्गत संरक्षित है। क्योंकि जनता का हित न्याय के सुचारू प्रकाशन से जुड़ा है। न्यायाधीश और न्यायालयों आलोचना की जा सकती है। अगर उसके लिए पर्याप्त तर्क हो कि कोई भी न्यायिक कानून विधान और जनता के हित के विरूद्ध है। इस प्रकार की आलोचना संरक्षित होती है और न्यायालय अवमान के अंतर्गत नहीं आती। किसी न्यायालय के फेसले पर स्वच्छ टिप्पणी के लिए कोई वाद लगाना उपयोगी नहीं होता। अगर यह टिप्पणी केस की सुनवाई और निर्णय से पहले की गई हो अनुच्छेद 3 के परिच्छेद ‘ए’ के स्पष्टीकरण में यह कहा गया है कि एक मामले को तब तक पूर्णतः निर्णित नहीं माना जा सकता जब तक उस फेसले के खिलाफ अपील या पुनर्विचार की अवधि समाप्त नहीं हो जाती, अगर अपील या पुनर्विचार दायर किया जा चुका है तब अपील और पुनर्विचार सुनने के बाद ही मामल पूर्णतः समाप्त माना जाता है।
किसी की अधीनस्थ न्यायालय के अधिकारियों के खिलाफ प्रमाणिक शिकायत करना न्यायालय अवमानना के अंतर्गत नहीं आता है। कई लिखित शब्द कभी-कभी न्यायालय की अवमानना एवं मानहानि दोनों से जुड़े होते है। किसी न्यायाधीश को धोखेबाज या जालसाझ के रूप में वर्णित करना मानहानि या न्यायालय अवमानना दोनों के अंतर्गत आता है। दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 129 और 215 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय और अवर न्यायालय को यह शक्ति दी गई है कि वह किसी संस्थान, संगठन व्यक्ति या सरकारी अधिकारी को न्यायालय की अवमानना के आरोप में दण्डित कर सकता है।
दण्डः- दीवानी अवमानना के मामले में, अवमानना के आरोपी को साधारण कैद की सजा नहीं दी जा सकती उसे किसी दीवानी जेल में 6 महीने से अधिक नहीं रखा जा सकता। सामान्यतः इस अपराध के लिए जुर्माने को पर्याप्त माना जाता है। फौजदारी अवमानना के मामले में आरोपी को अधिकतम 6 महीने साधारण कारावास की सजा दी जा सकती है या अधिकतक 2000/- रूपये का जुर्माना लगाया जा सकता है या दोनों ही लागू होते है। अगर आरोपी संतोष जनक क्षमा याचना करता है तो उसे छोड़ा जा सकता है और दिया गया दण्ड समाप्त किया जा सकता है। न्यायालय अवमानना के अंतर्गत आरोपी द्वारा किये गये अवमान के एक वर्ष के अंदर ही कार्यवाही की जा सकती है।
श्रमजीवी पत्रकार एवं समाचार पत्र कर्मी सेवा शर्त कानून 1955
यह कानून श्रमजीवी पत्रकारों एवं समाचार प्रतिष्ठान में कार्यरत दूसरे कर्मचारियों की सेवा शर्तो को नियमित करता है। प्रथम प्रेस आयोग ने यह पाया कि पत्रकारों द्वारा प्राप्त मेहनताना पूरी तरह से असंतोषजनक है। इसमें विभिन्न वर्गो के कर्मचारियों के वेतन को तय करने के लिए विस्तृत प्रयास नहीं किये गये है लेकिन प्रयास नहीं किये गये है लेकिन इसने यह माना है कि पत्रकारों एवं अन्य कर्मचारियों के लिए न्यूनतम वेतन तय करने की आवश्यकता है और उन्हें न्यूनतम वेतन देने से संबंधित अनुसंसाएॅं की। इसके बाद 1955 में श्रमजीवी पत्रकार (सेवा शर्ते) एवं विविध प्रावधान कानून 1955 को लागू किया गया और औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 को पत्रकारों के लिए भी प्रयोजय बनाया गया है। विभिन्न वेज बोर्डो के द्वारा समय-समय पर वेतनतर के पुनरिक्षण के द्वारा, जीवन संबंधी खर्च में वृद्धि से सांमजस्य और सेवा सुरक्षा के नियम, समाचार पत्र कर्मचारियों की सेवा शर्तो एवं अवधि में वांछित सुधार आया। इस कानून के कुछ महत्वपूर्ण नियम निम्नांकित हैः-
1. यह नियम जो औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 के अंतर्गत श्रमिकों पर लागू होते है श्रमजीवी पत्रकारों पर भी लागू होंगे।
2. श्रमजीवी पत्रकारों से तात्पर्य है वैसे पत्रकार जो किसी समाचार पत्र प्रतिष्ठान में लगातार तीन वर्षो तक सेवा कर चुके है। को 15 दिन के औसत वेतन के बराबर एक वर्ष की सेवा के बदले गे्रज्यूटी प्रदान की जायेगी। हांलाकि यह ग्रेज्यूटी सेवा से इस्तीफा मृत्यु, त्याग पत्र और बर्खास्तगी पर धारा 3 के अंतर्गत जो अधिकतम 6 महीने के वेतन से अधिक नहीं होगी प्रदान की जावेगी।
3. किसी भी श्रमजीवी पत्रकार से यह चार लगातार सप्ताहों में 144 घंटे से अधिक कार्य नहीं किया जावेगा जिसमें भोजन की अवधि शामिल नहीं होगी किसी भी श्रमजीवी पत्रकार को एक सप्ताह में लगातार 7 दिन तक काम करने पर कम से कम 24 घंटे का विश्राम दिया जायेगा जिसमंे रात्रि 10 बजे से प्रातः 6 बजे तक का समय शामिल होगा।
4. प्रत्येक श्रमजीवी पत्रकार 11 दिनों के कार्य के बाद एक दिन के अर्जित अवकाश प्राप्त करने का अधिकारी होगा और इस दौरान उसे पूर्ण वेतन प्राप्त होगा साथ ही आधे वेतन पर 18 दिन पर एक दिन स्वास्थ प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने पर अवकाश का अधिकारी होगा।
5. केन्द्रीय सरकार द्वारा वेज बोर्ड का गठन किया जावेगा जो श्रमजीवी पत्रकारों के संशोधित वेतन दर को निश्चित करेगा इस वेज बोर्ड में -
क. समाचार पत्र कर्मचारियों के दो प्रतिनिधि शामिल होगे।
ख. श्रमजीवी पत्रकारों के दो प्रतिनिधि शामिल होंगे।
ग. तीन स्वतंत्र व्यक्ति होंगे जिसमें से एक उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश होंगे और जिनकी नियुक्ति सरकार द्वारा वेज बोर्ड के अध्यक्ष पद पर की जायेगी।
इस कानून की धारा 12 केन्द्रिय सरकार को यह शक्ति देती है कि वह वेज बोर्ड की संस्तुतियों को लागू कराये और अगर आवश्यक हो तो इन संस्तुतियों में आवश्ययक सुधार करे।
6. धारा 13‘ए’ के अनुसार केन्द्र सरकार अतंरिम दरे वेज बोर्ड की सलाह से तय करे।
7. केन्द्र सरकार द्वारा धारा 13‘बी’ के अंतर्गत गैर पत्रकार, समाचार पत्र कर्मियों के वेतन की दरे और भत्तों को तय एवं संशोधित करने के लिए वेज बोर्ड का गठन किया जायेगा जिसमें निम्नांकित सदस्य शामिल होंगे -
क. समाचार पत्र कर्मचारियों के दो प्रतिनिधि।
ख. गैर पत्रकार समाचार पत्र कर्मियों के दो प्रतिनिधि।
ग. तीन स्वतंत्र व्यक्ति जिनमें से एक उच्च या उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश होगा और जिसको सरकार बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त करेंगी।
8. इस कानून के नियम उन सभी समाचार पत्रों पर समान रूप से लागू होंगे जिसमें 20 या अधिक लोग कार्य करते हों-
क. औद्योगिक रोजगार (स्टेंडिंग आर्डर) कानून 1946
ख. कर्मचारी भविष्य निधि कानून 1952
9. अगर कोई नियोक्ता किसी भी प्रावधान का उल्लंघन करता है तो उसे जुर्माने से दण्डित किया जावेगा जो रूपये 200/- से अधिक नहीं होगा यदि यह उल्लंघन दूसरी बार किया जाता है तो जुर्माने की राशि बढ़कर रूपये 500/- हो जायेगी।
विधायिका की अवमानना
विशेषाधिकार प्रत्येक सदन के ऐसे मौखिक अधिकार है जिन्हें संवैधानिक प्रक्रियाओं के सफल संचालन के लिए सर्वमान्यता प्राप्त है। संविधान के अनुच्छेद 105 और 194 के तहत संसद और विधान मण्डलों को कुछ शक्तियाॅं, विशेषाधिकार और उनमुक्तियाॅं प्राप्त है परिच्छेद 2 संसदीय प्रक्रियाओं, पत्रों आदि के प्रकाशन से उनमुक्ति प्रदान करता है। सदन से संबंधित कोई प्रकाशन तभी किया जा सकता है जब यह कार्य सदन स्वयं करे या अपने अंतर्गत किसी को अधिकृत करें। सदन की प्रक्रियाओं से संबंधित सत्य आधारित रिपोर्ट को भी इस परिच्छेद के अंतर्गत प्रकाशन का अधिकार नहीं है।
परिच्छेद 3 मूल रूप से उन सभी नियमों, शक्तियों, विशेषाधिकारों और उनमुक्तियों से संबंधित है जो पूर्व के नियमों के अंतर्गत नहीं आते। जब तक कोई नया कानून, कोई नई व्याख्या नहीं करता है तब तक ये इग्लेण्ड के हाऊस आॅफ काॅमनस को मिले अधिकारों के समान और संविधान के लागे होने के वक्त मिले अधिकारों के समान अधिकार संसद को प्राप्त होगे। संविधान के 44वे संशोधन के द्वारा इस परिच्छेद में संक्षिप्त संशोधन हुआ और हाऊस आॅफ काॅमन शब्द के संदर्भ को हटा दिया गया लेकिन इस परिच्छेद का मूल अपरिवर्तित रहा। इस प्रकार स्थिति यह है कि अगर किसी से पूछा जाये कि भारत में सांसद और विधान मण्डलों को अनुच्छेद 105 और 194 के अलावा और कौन से विशेषाधिकार प्राप्त है तो उत्तर होगा कि वही विशेषाधिकार जो 26 जनवरी 1950 के दिन तक हाऊस आॅफ काॅमन को प्राप्त थे। प्रथम पेे्रस आयोग ने यह संस्तुति दी कि संसद और विधान मण्डलों को अपने विशेषाधिकार और उनमुक्तियों को जो उन्हें अवमानना के खिलाफ मिली हुई है एक विधेयक के द्वारा परिभाषित करना चाहियें। यह प्रश्न वर्षो से सार्वजनिक वाद विवाद का विषय रहा है और कुछतर विशेषाधिकारों के सूचिकरण का विरोध करते है। विशेषाधिकारों को कूटबद्ध करने के विरोध में स्थापित तर्क इस पर जोर देता है कि अगर संसद या विधान मण्डलों द्वारा इन कानूनों को कूटबद्ध किया जाता है तो यह कानून स्वतः संविधान के भाग 3 में वर्णित मूल अधिकारों का विषय बन जाता है और न्याय संगत विषय बन जाता है। न्यायालय को विशेषाधिकारों के प्रश्न पर निर्णय देने की शक्ति प्रदान करना संसद की प्रतिष्ठा एवं गरिमा को कम करना है। ऐसा कहा गया कि इन विशेषाधिकारों का संहिताकरण संसद और राज्य विधान मण्डलों को इसके प्रतिकूल संगठन, न्यायपालिक के सामने अनावरत करना होगा। द्वितीय प्रेस आयोग ने यह वर्णन किया कि न्याय पालिका संविधान की अनुसंगी है जिस प्रकार सांसद और राज्य विधान मण्डल, ऐसे में भारतीय संविधान के अंतर्गत ये एक- दूसरे के प्रतिकूल संगठन नहींे है। सत्य में, संसद और विधान मण्डलों द्वारा बनाये गये कानून कई अवसरों पर न्यायालय द्वारा प्रभावित किये जाते है जब वे संवैधानिक नियमों द्वारा प्रमाणित ठहराये जाते है और इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि इससे संसद या विधान मण्डल की प्रतिष्ठा प्रभावित नहीं होती उसी तरह से उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशोें को कार्यपालिका द्वारा नियुक्त किया जाता है और इस तर्क के आधार पर कोई यह नहीं कह सकता कि उनकी स्वतंत्रता प्रतिष्ठा प्रभावित होती है। वे इसे प्रेस स्वतंत्रता के नजरिये से देखते है। यह अनिवार्य है कि सांसद और विधान मण्डलों के विशेषाधिकारों का जितनी जल्दी हो सके संहिताकरण किया जाना चाहिये। एक पत्रकार या संपादक को कारावास चेतावनी, भत्र्सना और धिक्कार के माध्यम से सांसद के विशेषाधिकारों के लिए दण्डित किया जा सकता है। सदन के प्रक्षेप में उसके प्रवेश के विशेषाधिकार और संसदीय प्रक्रियाओं को कवर करने की उसकी सुविधाएॅं समाप्त की जा सकती है या उससे क्षमा याचना प्रकाशित काने के लिए कहा जा सकता है। यद्यति इसके तहत किसी तरह के जुर्माने का प्रावधान नहीं है। अवमान विशेषाधिकार भंग करने की अपेेक्षा ज्यादा विस्तृत होता है। अवमानना को एक कानून के माध्यम से और एक अभिव्यक्ति के माध्यम से जो सदन की प्रतिष्ठा का अवमूल्यन करती हो बिना इसके विशेषाधिकारों का हनन करते हुए परिभाषित किया जा सकता है लेकिन सदन की कार्यवाही का निष्पक्ष सत्य एवं दुर्भावना से परे रिपोर्ट प्रकाशित करना चाहे यह मानहानि, बगावती या अश्लील प्रकृति का क्यों न हो, संसदीय विशेषाधिकारों का उल्लंघन नहीं है। ऐसी रिपोर्ट के प्रकाशन पर किसी सक्षम न्यायालय में कोई दीवानी या फौजदारी वाद नहीं चलाया जा सकता जब तक यह शासकीय गुप्त बात अधिनियम, मानहानि, राजद्रोह, अश्लीलता या दण्डसंहिता के अंतर्गत किसी दण्डात्मक अपराध के अंतर्गत न आता हो, भारत में विधायिका ने अपने विशेषाधिकारों से संबंधित किसी भी कानून को संहिताबद्ध नहीं किया है क्योंकि ऐसा कोई भी कानून नागरिकों के अधिकार, मौलिक अधिकार के कारण न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ जायेगा। हांलाकि संसदीय कार्यवाही का अपुष्ट, विकृत, अस्वच्छ, स्वेच्छाचारी, प्रस्तुतिकरण के खिलाफ कार्यवाही की जा सकती है।
सन् 1885 में इण्डियन नेशनल कंाग्रेस की स्थापना से भारतीय प्रेस की स्थापना में मील के पत्थर का काम किया। कांगेे्रस के जन्म ने समाचार पत्रों की राष्ट्रीय भावना की अभिव्यक्ति की मजबूती के साथ और पूरजोर तरीके से करने का अवसर प्रदान किया। ब्रिटिश शासन के खिलाफ राष्ट्रवादों आंदोलनों के बढ़ते प्रभाव व उसमें प्रेस की सहयोगी भूमिका ने ब्रिटिश शासन के कान खड़े कर दिये और इसका प्रतिफल इण्डियन प्रेस एक्ट 1910 के रूप में देखने को मिला। यह कानून जन माध्यमों पर सरकार के नियत्रंण को बढ़ाने के उद्देश्य से लागू किया गया था। इस कानून के अंतर्गत पे्रस के मालिकों को सुरक्षा निधि जमा करनी पड़ती थी जो जमा राशि कभी भी जप्त की जा सकती थी। अगर उसने किसी संवेदनशील सामग्री का प्रकाशन किया और उसके खिलाफ अगली कार्यवाही भी की जा सकती थी, जिसमंे प्रेस को जब्त किया जा सकता था अगर उसने ऐसा करना जारी रखा तो इसके तहत कस्टम और डाक अधिकारियों को यह अधिकार मिला कि वह ऐसे किसी भी डाक को रोक सकते थे जिसमें संवेदनशील सामग्री होने की संभावना हो। इसके साथ ही पुलिस को जांॅच करने और जप्त की कार्यवाही करने का व्यापक अधिकार मिला। इस कानून की भयावहता का पता इस बात से पता गलता है कि मात्र 1910 से 1914 के बीच सरकार ने 355 केस दर्ज किये।
स्वतंत्रता पूर्व की अवधि में भारतीय प्रेस को इसी तरह की तमाम परेशानियों और दबाओं का लगातार सामना करना पड़ा। समाचार पत्रों और प्रेस से प्रायः ही सुरक्षा राशि या अतिरिक्त सुरक्षा राशि जमा करने को कहा जाता। साथ ही अक्सर उनके द्वारा जमा की गई सुरक्षा राशि को जप्त कर लिया जाता और कई समाचार पत्रों को इस दौरान अपने प्रकाशन बंद करने पड़े। जैसे-जैसे राष्ट्रवादी आंदोलन अनवरत बढ़ता जा रहा था, सरकार और प्रेस के रिश्ते भी धीरे-धीरे खराब होते जा रहे थे। इसी बीच द्वितीय विश्व युद्ध आरंभ हो गया। इसके परिणाम स्वरूप नियंत्रण के लिए कई नये अध्यादेश और कानून लागू किये गये। साथ ही फ्री सेंसरशिप की व्यवस्था को फिर से लागू किया गया। राष्ट्रवादियों ने इसी दौरान महात्मा गाॅंधी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आंदोलन को फिर से आंरभ कर दिया। जिससे सरकार पर अतिरिक्त दबााव आ गया। जब 1943 में लार्ड बेबेल ने वायसराय के रूप में भारत की कमान संभाली तब यह पूर्णतः स्पष्ट हो गया था कि जल्द ही भारत को स्वतंत्रता प्रदान कर दी जायेगी और इस परिस्थति में किसी भी तरह की दमनात्मक कार्यवाही या उपाय बैकार साबित होंगे। परिणामस्वरूप जैसे ही द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति हुई सत्ता के हस्तांतरण की प्रक्रिया पूरी हो गई और प्रेस पर लगवाये गये अधिकांश नियंत्रण समाप्त हो गये।
कई ऐसे महत्वपूर्ण कानून जो ब्रिटिश व्यवस्था के अंतर्गत लागू किये गये आज भी पूर्णतः या अंशतः प्रक्रिया में है और स्वतंत्रता के बाद व्यवस्था के सफल संचालन के लिए कई कानून भी बनाये गये। कई ऐसे महत्वपूर्ण कानून है जिनके बारे में एक पत्रकार को जरूर जानना चाहिये।
1. मानहानिः- द्वितीय प्रेस आयोग द्वारा मानहानि कानून की विवेचना करते हुए कहा गया कि यह दो हितों की कहानी है। ये दो हित है, व्यक्ति की प्रतिष्ठा एवं सम्मान से जुड़ा हित और समाज में सूचना के स्वतंत्र प्रभाव का हित। अपने समाचारों के संकलन के दौरान कई बार प्रेस और सरकार आमने-सामने आ जाते है साथ ही कभी-कभी व्यक्ति साख और प्रतिष्ठा की रक्षा का अधिकार और स्वतंत्र अभिव्यक्ति तथा स्वतंत्र पेे्रस का अधिकार एक-दूसरे से टकराते है। व्यक्ति की प्रतिष्ठा के संरक्षण का अधिकार मानहानि के इस कानून के दायरे में आता है। मानहानि की इस जटिल अवधारणा को समझने के लिए सर्वप्रथम हमंे कुछ परिभाषाओं को जानना चाहियेः-
क. लाईबल:- लाईबल लिखित मानहानि को कहा जाता है। ऐसे कथन जो किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा और उसके नाम को धूमिल करते हो और उसके प्रति घृणा या विद्वेश के माध्यम से उसके व्यक्तिगत या व्यवसायिक उद्देश्यों को नुकसान पहुंचाते हो लिखित मानहानि माने जाते है इसलिये किसी भी लेखन से पूर्व यह सावधानी बरतनी चाहिये। कई मामलों में पुलिस अधिकारी किसी व्यक्ति को किसी अलग मामले के तहत हिरासत में लेता है, लेकिन जब साक्ष्यों को जाॅंच की जाती है तो साक्ष्य आरोपों की पुष्टि नहीं करते, इस कारण अधिकतर समाचार पत्रों के संपादक किसी गिरफ्तार व्यक्ति का नाम तभी प्रकाशित करना पसंद करते है जब किसी मामले के तहत आरोप दर्ज किये गये हो। दुर्भाग्य से कई बार डेडलाईन और खबरों की होड में कई समाचार पत्र किसी व्यक्ति का नाम आरोप दर्ज होने से पहले ही प्रकाशित कर देते है। इन परिस्थितियों में किसी नाम को प्रकाशित करने से पहले बहुत अधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है। अगर किसी व्यक्ति को बलात्कार के किसी आरोप में आरोपित किया जाता है और समाचार पत्र उसे बलात्कार के अभियुक्त के रूप में प्रकाशित करता है और बाद मंे उस व्यक्ति पर लगे आरोप छेड़-छाड़ के आरोप साबित होते है तो वह व्यक्ति समाचार पत्र के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर कर सकता है।
ख. स्लेंडरः-यह मौखिक मानहानि है। हांलाकि अगर किसी व्यक्ति के खिलाफ मानहानि कारक कथन प्रसारित किया जाता है तो इसका मुकदमा लिखित मानहानि के अंतर्गत दायर होता है। जबकि तकनीकी रूप से वे कथन लिखित रूप में उपलब्ध नहीं होते है। मौखिक मानहानि के अपेक्षा लिखित मानहानि ज्यादा खतरनाक होती है और इसके बदले गंभीर दण्ड देने का प्रावधान है।
ग. लाईबल पर से:- कुछ शब्द हमेशा ही मानहानि कारक होते है। झूठे लिखित आरोप जैसे किसी व्यक्ति को चोर या जालसाझ और ढोंगी या बहरूपीया लिखना स्वतः लिखित मानहानि की श्रेणी में आता है।
घ. लाईबल पर क्वेडः- कुछ शब्द जो सामान्य रूप से पूरी तरह नासमझी से भरे होते है। किन्हीं दूसरी परिस्थितियों में मानहानि कारक होते है। रिपोर्टिंग में जैसे -यदि गलती से ही यह लिख दिया जाये कि कल रात्रि के भोजन में श्रीमान् अशोक मांस खाते हुए दिखे थे तो यह तब तक हानिकर नहीं है, परन्तु अगर श्रीमान् अशोक वैश्विक शाकाहरी संगठन के प्रधान है तो यह बहुत ही हानिकर और मानहानि कारक साबित होगा।
मीडिया के खिलाफ लिखित मानहानि मामला चलाने से पहले निम्नांकित पांच बिन्दुओं की पुष्टि करनी होती हैः-
क. क्या कथन विशेष से उस व्यक्ति को कोई हानि या उसकी बदनामी वास्तविकता में हुई है?
ख. क्या किसी भी तरह उस व्यक्ति विशेष की पहंचान को किसी तरिके से उजागर किया गया?
ग. क्या मानहानि कारक किसी कथन से विशेष से प्रकाशित किया गया।
घ. क्या इसमें सत्य में मिडिया की गलती थी या यह जानबूझकर की गई।
ड़. क्या प्रकाशित या प्रसारित कोई सामग्री झूठी थी ?
हालाकि प्रत्येक गलती जो प्रकाशित की जाती है या हो जाती है मानहानिकारक नहीं होती। गलती से यह लिख देना कि किसी व्यक्ति की मृत्यु हो गई, मानहानिकारक नहीं है। वास्तविक हानि तब होती है जब किसी मानहानिकारक टिप्पणी से भौतिक असुविधा, आय में हानि या किसी कार्य को करने में परेशानियों का सामना करना पड़ता है। लाईबल के अंतर्गत किसी मुकदमें को जीतने के लिए यह प्रमाणित करना होता है कि मीडिया संगठन द्वारा गलती या असावधानी की वजह से ऐसा हुआ।
ड़. लाईबल सूट डिफेंसेसः- लाईबल या लिखित तीन परंपरागत बचाव है- सत्य, विशेषाधिकार और स्वच्छ टिप्पणी या आलोचना। इनमें से प्रथम सत्य है कि, किसी भी लिखित मानहानि का सबसे बेेहतर बचाव का आधार सत्य है। हांलाकि सत्य को जानना अलग बात है और इसे प्रमाणित करना अलग। जो रिपोर्ट किया जाता है उसे सत्य प्रमाणित करना पड़ता है तब मानहानि का मामला नहीं बनता। हांलाकि इस बचाव का प्रयोग कभी-कभार ही किया जाता है क्योंकि किसी कथन की सत्यता को प्रमाणित करना बहुत ही कठिन कार्य है। दूसरा महत्वपूर्ण बचाव विशेषाधिकार है। कुछ विशेष परिस्थितियों में न्यायालय का यह मानना है कि जनता के जानने का अधिकार किसी व्यक्ति के प्रतिष्ठा के संरक्षण के अधिकार से ज्यादा महत्वपूर्ण है। न्यायालयीन प्रक्रियाएॅं गिरफ्तारी वारंट, विधायी प्रकियाएॅं ऐसी परिस्थितियों के अंतर्गत आते है जो विशेषाधिकार की श्रेणी में होते है। अगर एक रिपोर्ट इन घटनाओं की स्वच्छ एवं वास्तविक रिपोर्ट देता है तो किसी कानून के तहत उसे दण्डित नहीं किया जा सकता चाहे प्रकाशित सामग्री में मानहानिकारक कथन क्यों न हो। तीसरा महत्वपूर्ण बचाव है, स्वच्छ टिप्पणी एवं आलोचना। कोई भी व्यक्ति जो सार्वजनिक जीवन व्यतीत करता है उसकी स्वच्छ आलोचना की जा सकती है। इसका अर्थ यह है कि सरकारी अधिकारी और व हर व्यक्ति जो सार्वजनिक जीवन में हो स्वच्छ आलोचना का पात्र है। हांलाकि यह बचाव केवल विचारों और आलोचनाओं तक ही सीमित होता है न कि तथ्यों की गलत प्रस्तुति तक इस प्रकार आप तभी तक सुरक्षित है जब तक आप उन तथ्यों के साथ छेड़-छाड नहीं करते जिन पर आपकी आलोचना या टिप्पणी आधारित है।
दण्डः- भारतीय दण्ड संहिता की धारा 500 के तहत मानहानि के लिए दण्ड का प्रावधान किया गया है। इस धारा के अनुसार अगर कोई किसी दूसरे को बदनाम करता है तो उसे दो साल सामान्य कारावास की सजा या जुर्माना या फिर सजा तथा जुर्माना दोनों दिया जाए। एक पत्रकार के लिए यह दण्ड और भी गंभीर हो सकता है क्यांेकि उसके द्वारा प्रकाशित वाक्य विस्तृत ढ़ंग से प्रचारित होते है।
न्यायालय अवमानना कानून 1971
प्रथम पे्रस आयोग ने न्यायालय अवमानना कानून 1952 में किसी भी संस्था समिति ने अवमानना से जुड़े कानूनांे का विस्तृत अध्ययन किया इसकी संस्तुतियों के आधार पर न्यायालय अवमानना अधिनियम कानून को रद्द कर दिया गया। अवमानना कानून 1971 में पहली बार न्यायालय अवमानना की संपूर्ण परिभाषा दी गई और इसमें अनुच्छेद 2 में न्यायालयीन निर्णयों के परिणामों को सूचीबद्ध किया गया। अनुच्छेद 2 के परिच्छेद ‘ए’ के तहत अवमानना दो दो वर्गो में विभाजित किया गया है:-(1) दीवानी अवमानना (2) फौजदारी अवमानना
अनुच्छेद 2 के परिछेद ‘बी’ के अंतर्गत न्यायालय के किसी निर्णय निर्देश आदेश डिक्री रिट एवं अन्य दूसरी प्रक्रियाओं की जानबूझकर अवमानना और न्यायालय के समक्ष किए गए किसी घोषणा से मुकरना दिवानी अवमानना के अंतर्गत आता है।
अनुच्छेद 2 के परिच्छेद ‘सी’ के तहत कोई भी प्रकाशन जो न्याय के शासन या न्यायिक प्रशासन का अवमुलयन करता है और न्यायालय के कार्यो में हस्तक्षेप करता है या करने की प्रवृत्ति है इस धारा के अंतर्गत फौजदारी अवमानना हेतु आरोपित किया जाएगा। परिच्छेद ‘सी’ अनुसार फौजदारी अवमानना से तात्पर्य ऐसे प्रकाशन चाहे वो शब्द रूप में हो, लिखित या मौखिक हो, प्रतिक के रूप में हो, दृश्य प्रतिनिधिक रूप में हो या अन्य किसी रूप में हो या कोई भी अन्य सामग्री या अन्य किसी भी कार्य जो-
1. न्यायालय की सत्ता को नाराज करती है या नाराज करने की प्रवृत्ति हो तथा न्यायालय की गरीमा को कम करती हो या कम करने की प्रवृत्ति हो।
2. और पूर्वाग्रह ग्रस्त हो या हस्तक्षेप करती हो या करने की प्रवृत्ति हो किसी भी न्यायालयीन प्रक्रिया में बाधा डालती हो या बाधा डालने की प्रवृत्ति हो, किसी भी प्रकार से न्यायालय के प्रशासन में,
इस धारा के अंतर्गत न्यायालय की फौजदारी अवमानना के लिए आरोपित किया जा सकता है। ऐसी कोई भी सामग्री जिसका प्रशासन जनता के दिमाग में न्यायाधीशों की योग्यता, ईमानदारी, और सत्यनिष्ठा के प्रति शंका उत्पन्न करता है और कोर्ट के न्याय के प्रशासन के प्रति किसी भी वादी के मन में अविश्वास उत्पन्न करता है, न्यायालय की अवमानना के लिए आरोपित किया जा सकता है। कोई भी प्रकाशन जो किसी न्यायाशीध के मन में अपने आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन के लिए उलझन उत्पन्न करता है, न्यायालय की अवमानना करता है। लेकिन मगर यह प्रमाणित होता हैं कि संबंधित लेखन ने न्यायालय की सत्ता एवं प्रतिष्ठा का अवमूल्यन किया है और इससे न्यायालय के प्रशासन में जनता का विश्वास कम हुआ है तब यह अवमानना का मामला बतना है। चाहे यह निदांपरक आलोचना न्यायाधीयों के गैर न्यायालयीन कार्यो से क्यों न जुड़ा हुआ हो किसी मामले में निर्णय में गलत मंशा से लांघन लगाना भी स्पष्ट रूप से न्यायालय की अवमानना है। प्रेस को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी भी आलोचना को या किसी पक्ष का समर्थन करे। न्याय के प्रशासन समेत सार्वजनिक क्षेत्र से जुड़े प्रत्येक विषय निडर और आलोचनात्मक टिप्पणी के परिक्षेत्र में आते हो। प्रेस की सार्वजनिक कार्य एवं भूमिका से यह बाध्यता भी जुुड़ी हुई है कि वह सभी का सम्मान करते हुए अपने दायित्वाऐं का निर्वाहन करें। इस प्रकार के दायित्व बोध के बिना एक स्वतंत्र प्रेस अन्याय का एक शक्तिशाली हथियार बन जाता है। न्यायालय की यह जिम्मेदारी है कि वह अपनी सत्ता को व्यवस्थित रखते हुए प्रेस की स्वतंत्रता और सार्वजनिक हित के मुद्दों पर टिप्पणी करने के प्रेस के अधिकार के बीच एक सांमजस्य स्थापित करे। क्योंकि बिना स्वतंत्र पे्रस के स्वतंत्र समाज की कल्पना नहीं की जा सकती। प्रेस की स्वतंत्रता यद्य िस्वयं में कोई लक्ष्य नहीं है। बल्कि यह स्वतंत्र समाज की स्थापना के लक्ष्य का एक साधन मात्र है। ठीक उसी प्रकार न्यायापालिका की स्वतंत्रता भी स्वतंत्र समाज की स्थापना के लक्ष्य का माध्यम है और यह सत्य है कि स्वतंत्र न्यायपालिका का सुचारू रूप से कार्य करना प्रेस की स्वतंत्रता की स्थापना के लिए एक अनिवार्य शर्त है। हांलाकि एक स्वतंत्र न्यायपालिका से अधिक स्वतंत्र प्रेस को महत्ता नहीं दी जा सकती। ठीक उसी प्रकार एक स्वतंत्र न्यायपालिका को एक स्वतंत्र प्रेस से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं माना जा सकता। इस प्रकार दोनों एक दूसरे के पूरक है। और सहयोगी है। यद्यपि न्यायाधीश भी मानव होते है और उनके मानवीय भूलों की अपेक्षा लाजमी है। अपराध से जुड़े समाचारों का प्रकाशन समाचार पत्रों की नियमित विशेषता है। इस प्रकार की सामग्री जनरूचि और जन सरोकार से जुड़ी होती है लेकि यह स्पष्ट है कि इन अपराधों पर मुकदमा जल्दी या देेरी से चलता ही है। अपराध की एक रिपोर्ट चाहे किनती भी स्टीक क्यों न हो एक ऐसे सत्य को प्रदर्शित करता है जिस पर मुकदमें के दौरान गर्म विवाद होना लाजमी है। या चाहे पहचान का एक प्रश्न हो सकता है या एक छोटा सा संक्षिप्त विवरण हो सकता है। लेकिन कभी-कभार यह मुकदमें के रूप को पलट देता है। एक रिपोर्ट तैयार करने के लिए सामान्यतः गवाहों को साक्षात्कार करना आावश्यक होता है जिनका मुकदमें के दौरान भी बयान लिया जाता है। एक रिपोर्टर किसी घटना का पूरा ब्यूरा प्राप्त करने में सफल हो सकता है और ऐसी महत्वपूर्ण सामग्री प्रकाशित करने की स्थिति में हो सकता है तो बाद में मुकदमें के दौरान साक्ष्य का कार्य कर सकते है। लेकिन उनमें प्रकाशन के कई खतरे भी है। खासतौर पर ऐसी स्थिति में जब अपराध में शक की सूई किसी खास व्यक्ति की ओर घुमी हो। एक आरोपी की तस्वीरों का प्रकाशन भी बहुत बारिकी का विषय हो सकता है क्योंकि कई अपराधिक मुकदमों में आरोपी की पहचान करना अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दा होता है। एक गवाह जो किसी आरोपी की अपनी याददास्त के आधार ईमानदारी से तस्वीर नहीं बनवा सकता लेकिन अगर उसने आरोपी की तस्वीर समाचार पत्रों में देखी है तो वह उसे आजादी से पहचान सकता है। हांलाकि इस प्रकार का प्रकाशन अभियोजन पक्ष के साक्षियों की पहचान के बारे में शंका उत्पन्न करा सकता है और आरोपी को खतरे में डाल सकता है दूसरी ओर वांछित व्यक्ति की तस्वीर कभी-कभी पुलिस के अनुरोध पर प्रकाशित की जाती है जिससे उसकी गिरफ्तारी में मदद मिल सके या लोगों को उसके खिलाफ सावधान किया जा सकें या फिर दोनों ही कार्य किये जा सके। इसलिये यह प्रश्न उन तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है कि कौन सा प्रकाशन किसी खास मासले में कानून की अवमानना करता है और पत्रकार अक्सर की संभावित अपराधों, कदाचार और दुव्र्यवहार की जांच करते है और साक्ष्य इक्कठा करते है। एक ओर जहां इस तरह की सामग्रियों का प्रसारण सार्वजनिक हित में होता है वहीं यह समाचार पत्रों को अपना प्रसार बढ़ाने में मदद भी करता है। न्यायालय अवमानना कानून ऐसे किसी इक्कठा किये गये साक्ष्य के प्रकाशन में बाधा नहीं डाल सकता जिसमें आरोपी पहले ही गिरफ्तार हो चुका है और उस पर आरोप गठित हो गये है लेकिन जब न्यायिक प्रक्रिया चलती रहती है, प्रेस को साक्ष्यांे को प्रकाशित नहीं करना चाहिये। जब किसी व्यक्ति पर अपराध के लिए मुकदमा चलता है और प्रेस के पास यह साक्ष्य हो कि कोई दूसरा व्यक्ति उस अपराध के लिए दोषी है, प्रेस को उन साक्ष्यों को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना चाहिये। इस प्रकार की प्रक्रिया को अपनाते हुए प्रेस अपने इस खोजी प्रयास के लिउ क्रेडिट प्राप्त कर सकता है और अपने इस प्रयास का अपना प्रसार विशेष काॅलम का प्रकाशन कर बढ़ा भी सकता है। हांलाकि न्यायालय को नाराज करने के लिए दण्ड देने की शक्ति कोर्ट को होती है। फिर भी इसका प्रयोग बहुुत ही किफायत से ओर न्याय के शासन की मर्यादा के लिए किया जाना चाहिये। इसका प्रयोग किसी न्यायाधीश का व्यक्तिगत रूप से अपमान कर नहीं करना चाहिये। प्रमाणिक आलोचना जिसमें न्यायालयीन कार्यो की स्वच्छ और तर्क संगत आलोचना हो और जिसमें सार्वजनिक हित छुपा हो अवमानना के अंतर्गत नहीं आता है। लेकिन न्यायाधीशों के प्रति गलत उद्देश्य से आरोप लगाया जाता है तब यह प्रमाणिक माना जाता है। न्यायालय के किसी फैसले के गलत होने पर उसकी आलोचना की जा सकती है परन्तु इस फैसले के लिए किसी न्यायाधीश पर बेईमानी का आरेाप नहीं लगाया जा सकता है।
अगर कोई कथन पूर्वाग्रह से पूर्ण हो और न्याय की प्रक्रिया में हस्तक्षेप हो तब तथ्यों की सत्यता जिस पर यह टिका हुआ है कोई बचाव नहीें होता। समाचार पत्रों द्वारा ट्रायल या मिडिया ट्रायल न्यायालय के न्यायिक प्रशासन में हस्तक्षेप माना जाता है। यद्यपि न्याय की प्रक्रिया में हस्तक्षेप या बांधा डालने के लिए दण्डित किया जा सकता है, अगर ऐसा हस्तक्षेप वास्तविक तौर पर डाला गया हो उसी प्रकार एक व्यक्ति को अनभिज्ञता में किये गये प्रकाशन और उसमें वितरण के लिए न्यायालय अवमान का आरोपी नहीं बनाया जा सकता, चाहे वह मामला अपमान प्रतीत क्यों न होता हो।
न्यायालय अवमानना की सीमाएॅंः- अज्ञानता में किया गया प्रकाशन या विवतरण जो इस कानूनी की किसी भी धारा के अंतर्गत आता हो न्यायालयीन प्रक्रियाओं की स्वच्छ एवं वास्तविक रिपोर्ट विचाराधीन न्यायिक प्रक्रियाओं की स्वच्छा एवं वास्तविक रिपोर्ट को जो इस कानून की धारा 4 के अंतर्गत संरक्षित है लेकिन धारा 7 के अंतर्गत इस प्रकार के प्रकाशन पर कोई निषेध नहीं है। धारा 7 केवल उस प्रकार के प्रकाशनों पर निषेध लगाती है जब किसी न्यायालय ने उस प्रकाशन पर किसी निश्चित आधार पर प्रतिबंध लगाया हो जैसेः-
राष्ट्र की सुरक्षा एवं सार्वजनिक आदेश से संबंधित विषय न्यायिक विधानों की स्व्च्छ आलोचना, न्यायिक विधानों और न्यायिक फेसलों की स्वच्छ आलोचना का प्रकाशन जो धारा 5 के अंतर्गत संरक्षित है। क्योंकि जनता का हित न्याय के सुचारू प्रकाशन से जुड़ा है। न्यायाधीश और न्यायालयों आलोचना की जा सकती है। अगर उसके लिए पर्याप्त तर्क हो कि कोई भी न्यायिक कानून विधान और जनता के हित के विरूद्ध है। इस प्रकार की आलोचना संरक्षित होती है और न्यायालय अवमान के अंतर्गत नहीं आती। किसी न्यायालय के फेसले पर स्वच्छ टिप्पणी के लिए कोई वाद लगाना उपयोगी नहीं होता। अगर यह टिप्पणी केस की सुनवाई और निर्णय से पहले की गई हो अनुच्छेद 3 के परिच्छेद ‘ए’ के स्पष्टीकरण में यह कहा गया है कि एक मामले को तब तक पूर्णतः निर्णित नहीं माना जा सकता जब तक उस फेसले के खिलाफ अपील या पुनर्विचार की अवधि समाप्त नहीं हो जाती, अगर अपील या पुनर्विचार दायर किया जा चुका है तब अपील और पुनर्विचार सुनने के बाद ही मामल पूर्णतः समाप्त माना जाता है।
किसी की अधीनस्थ न्यायालय के अधिकारियों के खिलाफ प्रमाणिक शिकायत करना न्यायालय अवमानना के अंतर्गत नहीं आता है। कई लिखित शब्द कभी-कभी न्यायालय की अवमानना एवं मानहानि दोनों से जुड़े होते है। किसी न्यायाधीश को धोखेबाज या जालसाझ के रूप में वर्णित करना मानहानि या न्यायालय अवमानना दोनों के अंतर्गत आता है। दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 129 और 215 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय और अवर न्यायालय को यह शक्ति दी गई है कि वह किसी संस्थान, संगठन व्यक्ति या सरकारी अधिकारी को न्यायालय की अवमानना के आरोप में दण्डित कर सकता है।
दण्डः- दीवानी अवमानना के मामले में, अवमानना के आरोपी को साधारण कैद की सजा नहीं दी जा सकती उसे किसी दीवानी जेल में 6 महीने से अधिक नहीं रखा जा सकता। सामान्यतः इस अपराध के लिए जुर्माने को पर्याप्त माना जाता है। फौजदारी अवमानना के मामले में आरोपी को अधिकतम 6 महीने साधारण कारावास की सजा दी जा सकती है या अधिकतक 2000/- रूपये का जुर्माना लगाया जा सकता है या दोनों ही लागू होते है। अगर आरोपी संतोष जनक क्षमा याचना करता है तो उसे छोड़ा जा सकता है और दिया गया दण्ड समाप्त किया जा सकता है। न्यायालय अवमानना के अंतर्गत आरोपी द्वारा किये गये अवमान के एक वर्ष के अंदर ही कार्यवाही की जा सकती है।
श्रमजीवी पत्रकार एवं समाचार पत्र कर्मी सेवा शर्त कानून 1955
यह कानून श्रमजीवी पत्रकारों एवं समाचार प्रतिष्ठान में कार्यरत दूसरे कर्मचारियों की सेवा शर्तो को नियमित करता है। प्रथम प्रेस आयोग ने यह पाया कि पत्रकारों द्वारा प्राप्त मेहनताना पूरी तरह से असंतोषजनक है। इसमें विभिन्न वर्गो के कर्मचारियों के वेतन को तय करने के लिए विस्तृत प्रयास नहीं किये गये है लेकिन प्रयास नहीं किये गये है लेकिन इसने यह माना है कि पत्रकारों एवं अन्य कर्मचारियों के लिए न्यूनतम वेतन तय करने की आवश्यकता है और उन्हें न्यूनतम वेतन देने से संबंधित अनुसंसाएॅं की। इसके बाद 1955 में श्रमजीवी पत्रकार (सेवा शर्ते) एवं विविध प्रावधान कानून 1955 को लागू किया गया और औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 को पत्रकारों के लिए भी प्रयोजय बनाया गया है। विभिन्न वेज बोर्डो के द्वारा समय-समय पर वेतनतर के पुनरिक्षण के द्वारा, जीवन संबंधी खर्च में वृद्धि से सांमजस्य और सेवा सुरक्षा के नियम, समाचार पत्र कर्मचारियों की सेवा शर्तो एवं अवधि में वांछित सुधार आया। इस कानून के कुछ महत्वपूर्ण नियम निम्नांकित हैः-
1. यह नियम जो औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 के अंतर्गत श्रमिकों पर लागू होते है श्रमजीवी पत्रकारों पर भी लागू होंगे।
2. श्रमजीवी पत्रकारों से तात्पर्य है वैसे पत्रकार जो किसी समाचार पत्र प्रतिष्ठान में लगातार तीन वर्षो तक सेवा कर चुके है। को 15 दिन के औसत वेतन के बराबर एक वर्ष की सेवा के बदले गे्रज्यूटी प्रदान की जायेगी। हांलाकि यह ग्रेज्यूटी सेवा से इस्तीफा मृत्यु, त्याग पत्र और बर्खास्तगी पर धारा 3 के अंतर्गत जो अधिकतम 6 महीने के वेतन से अधिक नहीं होगी प्रदान की जावेगी।
3. किसी भी श्रमजीवी पत्रकार से यह चार लगातार सप्ताहों में 144 घंटे से अधिक कार्य नहीं किया जावेगा जिसमें भोजन की अवधि शामिल नहीं होगी किसी भी श्रमजीवी पत्रकार को एक सप्ताह में लगातार 7 दिन तक काम करने पर कम से कम 24 घंटे का विश्राम दिया जायेगा जिसमंे रात्रि 10 बजे से प्रातः 6 बजे तक का समय शामिल होगा।
4. प्रत्येक श्रमजीवी पत्रकार 11 दिनों के कार्य के बाद एक दिन के अर्जित अवकाश प्राप्त करने का अधिकारी होगा और इस दौरान उसे पूर्ण वेतन प्राप्त होगा साथ ही आधे वेतन पर 18 दिन पर एक दिन स्वास्थ प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने पर अवकाश का अधिकारी होगा।
5. केन्द्रीय सरकार द्वारा वेज बोर्ड का गठन किया जावेगा जो श्रमजीवी पत्रकारों के संशोधित वेतन दर को निश्चित करेगा इस वेज बोर्ड में -
क. समाचार पत्र कर्मचारियों के दो प्रतिनिधि शामिल होगे।
ख. श्रमजीवी पत्रकारों के दो प्रतिनिधि शामिल होंगे।
ग. तीन स्वतंत्र व्यक्ति होंगे जिसमें से एक उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश होंगे और जिनकी नियुक्ति सरकार द्वारा वेज बोर्ड के अध्यक्ष पद पर की जायेगी।
इस कानून की धारा 12 केन्द्रिय सरकार को यह शक्ति देती है कि वह वेज बोर्ड की संस्तुतियों को लागू कराये और अगर आवश्यक हो तो इन संस्तुतियों में आवश्ययक सुधार करे।
6. धारा 13‘ए’ के अनुसार केन्द्र सरकार अतंरिम दरे वेज बोर्ड की सलाह से तय करे।
7. केन्द्र सरकार द्वारा धारा 13‘बी’ के अंतर्गत गैर पत्रकार, समाचार पत्र कर्मियों के वेतन की दरे और भत्तों को तय एवं संशोधित करने के लिए वेज बोर्ड का गठन किया जायेगा जिसमें निम्नांकित सदस्य शामिल होंगे -
क. समाचार पत्र कर्मचारियों के दो प्रतिनिधि।
ख. गैर पत्रकार समाचार पत्र कर्मियों के दो प्रतिनिधि।
ग. तीन स्वतंत्र व्यक्ति जिनमें से एक उच्च या उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश होगा और जिसको सरकार बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त करेंगी।
8. इस कानून के नियम उन सभी समाचार पत्रों पर समान रूप से लागू होंगे जिसमें 20 या अधिक लोग कार्य करते हों-
क. औद्योगिक रोजगार (स्टेंडिंग आर्डर) कानून 1946
ख. कर्मचारी भविष्य निधि कानून 1952
9. अगर कोई नियोक्ता किसी भी प्रावधान का उल्लंघन करता है तो उसे जुर्माने से दण्डित किया जावेगा जो रूपये 200/- से अधिक नहीं होगा यदि यह उल्लंघन दूसरी बार किया जाता है तो जुर्माने की राशि बढ़कर रूपये 500/- हो जायेगी।
विधायिका की अवमानना
विशेषाधिकार प्रत्येक सदन के ऐसे मौखिक अधिकार है जिन्हें संवैधानिक प्रक्रियाओं के सफल संचालन के लिए सर्वमान्यता प्राप्त है। संविधान के अनुच्छेद 105 और 194 के तहत संसद और विधान मण्डलों को कुछ शक्तियाॅं, विशेषाधिकार और उनमुक्तियाॅं प्राप्त है परिच्छेद 2 संसदीय प्रक्रियाओं, पत्रों आदि के प्रकाशन से उनमुक्ति प्रदान करता है। सदन से संबंधित कोई प्रकाशन तभी किया जा सकता है जब यह कार्य सदन स्वयं करे या अपने अंतर्गत किसी को अधिकृत करें। सदन की प्रक्रियाओं से संबंधित सत्य आधारित रिपोर्ट को भी इस परिच्छेद के अंतर्गत प्रकाशन का अधिकार नहीं है।
परिच्छेद 3 मूल रूप से उन सभी नियमों, शक्तियों, विशेषाधिकारों और उनमुक्तियों से संबंधित है जो पूर्व के नियमों के अंतर्गत नहीं आते। जब तक कोई नया कानून, कोई नई व्याख्या नहीं करता है तब तक ये इग्लेण्ड के हाऊस आॅफ काॅमनस को मिले अधिकारों के समान और संविधान के लागे होने के वक्त मिले अधिकारों के समान अधिकार संसद को प्राप्त होगे। संविधान के 44वे संशोधन के द्वारा इस परिच्छेद में संक्षिप्त संशोधन हुआ और हाऊस आॅफ काॅमन शब्द के संदर्भ को हटा दिया गया लेकिन इस परिच्छेद का मूल अपरिवर्तित रहा। इस प्रकार स्थिति यह है कि अगर किसी से पूछा जाये कि भारत में सांसद और विधान मण्डलों को अनुच्छेद 105 और 194 के अलावा और कौन से विशेषाधिकार प्राप्त है तो उत्तर होगा कि वही विशेषाधिकार जो 26 जनवरी 1950 के दिन तक हाऊस आॅफ काॅमन को प्राप्त थे। प्रथम पेे्रस आयोग ने यह संस्तुति दी कि संसद और विधान मण्डलों को अपने विशेषाधिकार और उनमुक्तियों को जो उन्हें अवमानना के खिलाफ मिली हुई है एक विधेयक के द्वारा परिभाषित करना चाहियें। यह प्रश्न वर्षो से सार्वजनिक वाद विवाद का विषय रहा है और कुछतर विशेषाधिकारों के सूचिकरण का विरोध करते है। विशेषाधिकारों को कूटबद्ध करने के विरोध में स्थापित तर्क इस पर जोर देता है कि अगर संसद या विधान मण्डलों द्वारा इन कानूनों को कूटबद्ध किया जाता है तो यह कानून स्वतः संविधान के भाग 3 में वर्णित मूल अधिकारों का विषय बन जाता है और न्याय संगत विषय बन जाता है। न्यायालय को विशेषाधिकारों के प्रश्न पर निर्णय देने की शक्ति प्रदान करना संसद की प्रतिष्ठा एवं गरिमा को कम करना है। ऐसा कहा गया कि इन विशेषाधिकारों का संहिताकरण संसद और राज्य विधान मण्डलों को इसके प्रतिकूल संगठन, न्यायपालिक के सामने अनावरत करना होगा। द्वितीय प्रेस आयोग ने यह वर्णन किया कि न्याय पालिका संविधान की अनुसंगी है जिस प्रकार सांसद और राज्य विधान मण्डल, ऐसे में भारतीय संविधान के अंतर्गत ये एक- दूसरे के प्रतिकूल संगठन नहींे है। सत्य में, संसद और विधान मण्डलों द्वारा बनाये गये कानून कई अवसरों पर न्यायालय द्वारा प्रभावित किये जाते है जब वे संवैधानिक नियमों द्वारा प्रमाणित ठहराये जाते है और इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि इससे संसद या विधान मण्डल की प्रतिष्ठा प्रभावित नहीं होती उसी तरह से उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशोें को कार्यपालिका द्वारा नियुक्त किया जाता है और इस तर्क के आधार पर कोई यह नहीं कह सकता कि उनकी स्वतंत्रता प्रतिष्ठा प्रभावित होती है। वे इसे प्रेस स्वतंत्रता के नजरिये से देखते है। यह अनिवार्य है कि सांसद और विधान मण्डलों के विशेषाधिकारों का जितनी जल्दी हो सके संहिताकरण किया जाना चाहिये। एक पत्रकार या संपादक को कारावास चेतावनी, भत्र्सना और धिक्कार के माध्यम से सांसद के विशेषाधिकारों के लिए दण्डित किया जा सकता है। सदन के प्रक्षेप में उसके प्रवेश के विशेषाधिकार और संसदीय प्रक्रियाओं को कवर करने की उसकी सुविधाएॅं समाप्त की जा सकती है या उससे क्षमा याचना प्रकाशित काने के लिए कहा जा सकता है। यद्यति इसके तहत किसी तरह के जुर्माने का प्रावधान नहीं है। अवमान विशेषाधिकार भंग करने की अपेेक्षा ज्यादा विस्तृत होता है। अवमानना को एक कानून के माध्यम से और एक अभिव्यक्ति के माध्यम से जो सदन की प्रतिष्ठा का अवमूल्यन करती हो बिना इसके विशेषाधिकारों का हनन करते हुए परिभाषित किया जा सकता है लेकिन सदन की कार्यवाही का निष्पक्ष सत्य एवं दुर्भावना से परे रिपोर्ट प्रकाशित करना चाहे यह मानहानि, बगावती या अश्लील प्रकृति का क्यों न हो, संसदीय विशेषाधिकारों का उल्लंघन नहीं है। ऐसी रिपोर्ट के प्रकाशन पर किसी सक्षम न्यायालय में कोई दीवानी या फौजदारी वाद नहीं चलाया जा सकता जब तक यह शासकीय गुप्त बात अधिनियम, मानहानि, राजद्रोह, अश्लीलता या दण्डसंहिता के अंतर्गत किसी दण्डात्मक अपराध के अंतर्गत न आता हो, भारत में विधायिका ने अपने विशेषाधिकारों से संबंधित किसी भी कानून को संहिताबद्ध नहीं किया है क्योंकि ऐसा कोई भी कानून नागरिकों के अधिकार, मौलिक अधिकार के कारण न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ जायेगा। हांलाकि संसदीय कार्यवाही का अपुष्ट, विकृत, अस्वच्छ, स्वेच्छाचारी, प्रस्तुतिकरण के खिलाफ कार्यवाही की जा सकती है।
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