Saturday, 17 February 2018

भारत के मान्य प्रेस संगठन

प्रेस परिषद्: नई दिल्ली में कुछ वर्ष पहले प्रेस काउंसिल पर तीसरा अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित हुआ था। सम्मेलन में यह निर्णय हुआ कि प्रेस परिषदों को एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन बनाया जाए।  भारत और स्वीडन ने मतदान से अलग रहना स्वीकार किया यद्यपि इन्होंने इस प्रस्ताव को अनुमोदित भी नहीं किया था। स्वीडन ने इस आधार पर मतदान से दूर रहने का फैसला किया कि टीम के सदस्यों के पास मतदान करने का अधिकार था ही नहीं। जबकि भारत ने दूसरे कारणों से मतदान से खुद को अलग रखा। भारतीय प्रेस परिषद ने यह महसूस किया कि एक औपचारिक संगठन से एक अनौपचारिक संगठन ही बेहतर है। इस कारण से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सव्रमान्य आचार संहिता बनाने को प्रसताव वापस ले लिया गया तथा इसके बदले सदस्य देशों से कहा गया कि वे अपने स्वयं के नियम बनाएं।
सर्वप्रथम प्रेस काउंसिल की स्थापना स्वीडन में 1916 ई. में की गई थी जिसे कोर्ट आॅफ आॅनर के नाम से जाना जाता था। आज 40 से अधिक देशों में प्रेस परिषदों की स्थापना की जा चुकी है। इटली और हाॅलैंड को छोड़कर, इन सभी देशों में प्रेस परिषदो की स्थापना स्वैच्छिक रूप से हुई। एक देश से दूसरे देश के प्रेस परिषद् की कार्यप्रणाली में बहुत सारे अंतर होते है। सन् 1953 में ब्रिटेन में प्रेस परिषद् अस्तित्व में आया और इसने कई दूसरे देशों के लिए एक माॅडल का काम किया। भारत में यह स्वायत्त, गैर सरकारी परंतु एक वैधानिक निकाय है। प्रथम प्रेस आयोग ने 1954 ई. में एक वैधानिक प्रेस परिषद् के गठन का प्रस्ताव दिया था जो कि समाचार पत्रों की संपादकीय स्वतंत्रता की देखरेख कर सके। समाचारों की वस्तुनिष्ठता, प्रस्तुति और आलोचनाओं के स्वच्छता की जांच कर सके।



प्रेस आयोग के अनुसार यह प्रेस काउंसिल भारत में प्रेस के विकास को प्रोत्साहित करेगा और बाहरी दबाव से इसे संरक्षण प्रदान करेगा एवं प्रेस के कार्य-व्यवहार तथा चरित्र को नियमित करेगा। इन संस्तुतियों के आलोक में भारत सरकार द्वारा प्रेस परिषद् का गठन प्रेस परिषद् अधिनियम 1965 के तहत सन् 1966 में किया गया। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति जे. आर. मधोलकर को इसका प्रथम अध्यक्ष बनाया गया। बाद में प्रेस परिषद् अधिनियम को संशोधित किया गया। प्रथम अध्यक्ष न्यायमूर्ति मधोलकर के बाद परिषद् की कमान न्यायमूर्ति एन. राजागोपाल अयंगर के हाथों में आ गई। परिषद् के पुनर्गठन के बाद, न्यायमूर्ति ए. एन. ग्रोवर, न्यायमूर्ति ए. एन. सेन, न्यायमूर्ति आर. एस. सरकारिया, न्यायमूर्ति पी. बी. सावंत जैसे कई प्रख्यात नाम प्रेस परिषद् के साथ अध्यक्ष के रूप में जुड़े। परिषद् के वर्तमान अध्यक्ष न्यायमूर्ति मार्कण्डेय काटजू है। आंतरिक आपातकाल के दौरान 31 दिसंबर 1975 को प्रेस परिषद् को भंग कर दिया गया और प्रेस परिषद् अधिनियम को रद्द कर दिया गया। इसे रद्द करते हुए यह कहा गया कि परिषद् अपने कार्यों को प्रभावशाली तरीके से करने में सक्षम साबित नहीं हुई है, जिससे यह अपने स्थापना के उद्देश्यों को प्राप्त कर सके। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने अपने 1975-76 की वार्षिक रिपोर्ट में कहा कि अपने 9 वर्षो के अस्तित्व के दौरान परिषद् उन प्रवृतियों पर अंकुश लगाने में असफल रही है और प्रेस के उत्तेजक एवं अनियंत्रित लेखन को नियंत्रित नहीं कर सकी है। यह संपादको के लिए आचरण के नियम बनाने में भी असमर्थ रही है और इसने छोटी-छोटी शिकायतों पर अपना ध्यान केन्द्रित किया है। इस प्रकार से 31 दिसंबर 1975 को कार्यकाल समाप्ति के बाद 1 जनवरी 1976 को परिषद् को भंग कर दिया गया। सन् 1978 में प्रेस परिषद् के गठन के लिए नई सरकार ने एक नया विधेयक पारित किया जो 1 मार्च 1979 को लागू हुआ। पुनर्गठित प्रेस परषिद् के उद्देश्य थे-ः
प्रेस की स्वतंत्रता का संरक्षण करना।


देश में समाचार पत्रों एवं समाचार समितियों की गुणवत्ता एवं स्तर में सुधार लाना।
प्रेस परिषद् का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है प्राप्त शिकायतों की जांच करना और समाचार पत्रों, समाचार समितियों और पत्रकारों के लिए उच्च मापदंडो वाली आचार संहिता का निर्माण करना।
कार्यकाल: प्रेस परिषद् के सदस्यों का कार्यकाल 3 वर्षों का होता है और तीन वर्षो के बाद परिषद् में नए सदस्य नियुक्त किए जाते है।
प्रेस परिषद् की संरचना:
                       कुल सदस्य-ः 28।
                           अध्यक्ष-ः 01।
अध्यक्ष का मनोनयन एक समिति के द्वारा किया जाता है जिसमें राज्यसभा के उपसभापति, लोकसभा के अध्यक्ष और परिषद् के सदस्यों का एक निर्वाचित प्रतिनिधि शामिल होता है। परिषद् का अध्यक्ष उच्चतम न्यायालय का सेवानिवृत्त न्यायाधीश ही होता है। परिषद् के 28 सदस्यों में-
विभिन्न समाचार पत्रों के संपादक 06
संपादक के अलावा श्रमजीवी पत्रकार 07
बड़े, मध्यम एवं छोटे समाचार पत्रों के प्रबंधन के प्रतिनिधि 06
समाचार समितियों के प्रतिनिधि 01
अध्यक्ष द्वारा मनोनित संसद सदस्य (3 लोकसभा एवं 2 राज्यसभा से) 05
विभिन्न विशिष्ट क्षेत्रों से जुड़े प्रख्यात एवं विषय विशेषज्ञ
अ. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा नामित विज्ञान या शिक्षा से जुड़ी हस्ती।
ब. बार काउंसिल आॅफ इंडिया द्वारा नामित कानून या साहित्य विशेषज्ञ।
स. साहित्य अकादमी द्वारा नामित संस्कृति से जुड़ी हस्ती। 03

प्रेस परिषद् अधिनियम के अनुसार, परिषद् को अपने कार्यों के संपादन एवं शिकायतो की जांच करने के लिए भारत की दीवानी अदालतांे के ही समान अधिकार एवं शक्तियां सिविल प्रोसिजर कोड 1908 के अनुरूप प्राप्त है। इस प्रकार से परिषद् किसी भी व्यक्ति को सम्मन जारी कर सकता है, उसको अपने समक्ष उपस्थित होने का आदेश दे सकता है, किसी व्यक्ति या संस्था से घोषणापत्र भरवा सकता है, किसी व्यक्ति या संगठन से दस्तावेजोें की मांग कर सकता है, सार्वजनिक दस्तावेजों की किसी सरकारी कार्यालय या न्यायालय से मांग कर सकता है, किसी भी व्यक्ति या संगठन के दस्तावेज की जांच कर सकता है और कुछ भी ऐसा कर सकता है  जो अधिनियम में वर्णित है। यद्यपि इस अधिनियम के अंतर्गत पत्रकारों को अपने सूचना स्रोत को प्रकट करने से संरक्षण  प्राप्त है। अपनी पुस्तक जर्नलिस्ट हैंडबुक में एम. वी. कामथ लिखते हैं कि यह याद रखना बहुत ही महत्वपूर्ण है कि प्रेस परिषद् कोई न्यायालय नहीं है। इसके फैसले न्यायिक घोषणा की श्रेणी में नहीं आते है इसलिए नियम विरूद्ध कार्य करने वाले किसी पत्रकार या समाचार पत्र को दंडित करने का प्रश्न ही नहीं उठता है। ठीक उसी तरह से परिषद् किसी भी पीड़ित व्यक्ति को हर्जाना भी नहीं दे सकता। जैसा कि न्यायमूर्ति मधोलकर ने कहा कि परिषद् का एकमात्र हथियार इसका नैतिक प्रभाव है। इसकी संपूर्ण ताकत अंतरात्मा और विवके पर टिकी है। परिषद् में कोई भी व्यक्ति किसी भी समाचार पत्र या फिर पत्रकार के खिलाफ शिकायत दर्ज करा सकता है। हालांकि परिषद् किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा दर्ज कराएं गए शिकायतों पर ही निर्भर नहीं है बल्कि यह किसी भी मामले पर स्व विवेक के आधार पर स्वतः संज्ञान ले सकता है। यहां यह भी जरूरी नहीं कि शिकायतकर्ता का शिकायत से किसी प्रकार का व्यक्तिगत हित जुड़ा होना चाहिए। शिकायतकर्ता को अगर यह लगता है और यह मानने के पर्याप्त कारण है कि किसी समाचार पत्र ने पत्रकारिता आचार संहिता के मानदंडों का उल्लंघन किया है या जनरूचि का तिरस्कार किया है।



या फिर किसी संपादक या श्रमजीवी पत्रकार ने कोई गलत व्यवसायिक आचरण किया है या पत्रकारिता की आचार संहिता को तोड़ा है तो वह शिकायत दर्ज करा सकता है।

प्रेस परिषद के उद्देश्य एवं कार्य:
प्रेस परिषद के प्रमुख उद्देश्यों की चर्चा करना यहां प्रासंगिक होगा। इसमें से सबसे महत्वपूर्ण है कि परिषद् प्रेस की स्वतंत्रता का संरक्षण एवं उसकी रक्षा करेगा और भारत में समाचार पत्र एवं समाचार समितियों की गुणवत्ता एवं उनके स्तर में सुधार करेगा।
समाचार पत्रों एवं समाचार समितियों को अपनी स्वतंत्रता को कायम रखने में हर संभव सहायता प्रदान करना।
उच्च व्यवसायिक गुणवत्ता एवं स्तर के अनुरूप समाचार पत्रों, समाचार समितियों एवं पत्रकारों के लिए आचार संहिता का निर्माण करना।
यह सुनिश्चित करना कि समाचार पत्र, समाचार समिति एवं पत्रकार जनरूचि के उच्चतर स्तर के अनुरूप कार्य कर रहे है या नहीं। नागरिक एवं नागरिकता के अधिकार एवं दायित्वों के पालन की प्रवृति एवं भावना को प्रोत्साहित करना।
पत्रकारिता के व्यवसाय से जुड़े सभी लोगों के बीच दायित्वबोध एवं जनसेवा की भावना को बढ़ाना।

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