बीसवीं सदी के अंत में, भारत में भाषाई प्रेस का विकास देश की धनी भाषाई और सांस्कृतिक विरासत की विविधता एवं अनेकता को प्रदर्शित करता है। भारतीय संविधान में 19 अधिकारिक भाषाएं होने के साथ ही 1971 की जनगणना भारत के सांस्कृतिक प्रचुरता एवं विविधता को अभिव्यक्त करती है। आधुनिक जनमाध्यमों में और साथ ही पारंपरिक संचार में भी विविध भाषाओं की उपलब्धता फायदेमंद है। इंटरनेशनल कमिशन फाॅर दी स्टडी आॅफ कम्यूनिकेशन प्राॅब्लमस जिसे मेनी वायसेज वन वल्र्ड के नाम से भी जाना जाता है, ने 16 ऐसी भाषाओं को अपनी सूची में शामिल किया जिसे 50 मिलियन से ज्यादा लोग बोलते है। इनमें से पांच ऐसी भाषाएं है जिनमें भारत में समाचारपत्र प्रकाशित किए जाते है। ये पांच भाषाएं है-हिंदी, बंगाली, उर्दू, तेलगू तथा तमिल। जिला केन्द्रों से निकलने वाले छोटे समाचारपत्र और जिनका जमीनी स्तर पर संबंध होता है, ज्यादातर हिंदी और भारतीय भाषाओं में प्रकाशित होते है। भारतीय प्रेस का एक दूसरा महत्वपूर्ण अनुभाग है। इन समाचारपत्रों की आकांक्षा और मांग सुस्पष्ट होती है और ये अपने पाठको की कठिनाइयों और समस्याओं से जुड़े रहते है। इस प्रकार से ये पाठक के साथ मजबूत भावनात्मक संबंध बनाते है। भारतीय भाषाई पत्रकारिता ने केवल देश में पत्रकारिता के विकास एवं उत्थान में ही महती भूमिका नहीं अदा की है बल्कि स्वतंत्रता संग्राम में भी अभूतपूर्व भूमिका निभाई। उन्नीसवीं सदी के प्रारंभिक दशकों में स्वयं को सामाजिक सुधारों एवं उस समय की धार्मिक समस्याओं से भी जोड़ा।
भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में महात्मा गाांधी के आगमन के बाद और उनके असहयोग आंदोलन को भी भाषाई प्रेस ने अपना नैतिक समर्थन प्रदान कर मजबूत बनाने का कार्य किया। अपनी पुस्तक जर्नलिज्म इन इंडिया में रंगास्वामी पार्थसारथी ने भाषाई पत्रकारिता के गौरवपूर्ण योगदान को रेखांकित करते हुए लिखा है कि बगैर किसी साधन के या कम साधनों में लगभग तीन दशकों तक विदेशी शासकों के प्रतिबंधों, प्रताड़ना और अत्याचारों के बीच उन्होंने अपने अस्तित्व को बचाएं रखा और बहुत सारे ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अपने न्यून जीवन एक ऐतिहासिक अध्याय को लिखा और नष्ट हो गए। जिन्होंने इन पत्रों को संचालित किया या इसके साथ जुड़े हुए थे, उन्होंने देशभक्ति, साहस और बलिदान की एक मिशाल कायम की। वे एक निश्चित कारण के लिए पूर्णतः समर्पित थे और कोई भी बाधा उन्हें इस मिशन को पूरा करने से नहीं रोक सकती थी। उन्हें हानि भी उठानी पड़ी और दरिद्रता में भी जीना पड़ा। कई को भयानक कैद से गुजरना पड़ा और इतनी कुर्बानी से जीती जंग के फायदे लेने के लिए आज वो हमारे साथ नहीं है परंतु उनकी आत्मा इसी लड़ाई के मैदान के आस-पास भटकती होगी जहां उन्होंने अपनी शहादत दी, हमे खुशी देने के लिए। स्वतंत्रता संग्राम में हिंदी और उर्दू पत्रकारिता का अवदान और जनता में राजनीतिक जागरूकता के प्रसार में उनकी भूमिका अविस्मरणीय है।
पूर्व और उत्तर-पूर्व के भाषाई प्रेस की एक अनुपम विशेषता थी कि ये त्योहारो और खासतौर पर दुर्गापूजा, रंगोली और बिहू के अवसर पर अपने विशेष अंक प्रकाशित करते थे। बंगाली, उड़िया और असमिया प्रेस की यह खास विशेषता थी। ये विशेष अंक बड़ी संख्या में निकाले जाते थे जिनमें लघु कथाएं, कविताएं, सृजनात्मक लेख और उपन्यास प्रकाशित होते है। ये समाचारपत्र पाठकों को उत्कृष्ट कोटि के साहित्यिक एवं सांस्कृतिक सौंदर्यबोध से रूबरू कराते और उनके विचारों को परिष्कृत करते थे। भाषाई प्रेस के उड़ीसा में अवदान की चर्चा करते हुए भट्ट ने लिखा कि उड़ीसा के विकास एवं खासतौर पर इसके सांस्कृतिक पुनर्निमाण में पत्रकारिता ने महती भूमिका निभाई। प्रेस ने साहित्य को कुलिन वर्गो से आम जन के बीच पहुंचाया और इसका परिणाम सभी के सामने स्पष्ट है कि उड़ीया साहित्य ने अपनी कविताओं एवं दूसरी साहित्यिक कृतियों के लिए प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त किया। उड़ीसा का प्रजामित्र समूह अपने अंग्रेजी साप्ताहिक दी ईस्टर्न टाइम्स और अपने मासिक झंकार में गुणवत्तापूर्ण साहित्यिक सामग्री प्रकाशित की एवं वह पुरस्कृत लेखकों को इसके लिए पुरस्कार प्रदान करती थी।
दक्षिण भारत का भाषाई प्रेस का इतिहास भी बहुत ही उज्जवल एवं आकर्षक रहा है। कुछ समाचारपत्रों और खासतौर पर आंध्रप्रदेश का ईनाडु तथा केरल में मलयाला मनोरमा ने विविधतापूर्ण पत्रकारिता की एक नई विधा का सूत्रपात किया। तेलगू दैनिक ईनाडु का प्रकाशन सन् 1974 में विशाखापट्टनम से प्रारंभ किया गया और बाद में हैदराबाद से तथा उसके बाद आंध्रप्रदेश के प्रत्येक जिले से इसके संस्करण प्रकाशित होने लगे। क्रमशः इसका प्रसार 4 लाख की सीमा को पार कर गया। जनता की सूचना प्राप्ति की बढ़ती मांग ने ईनाडु की सफलता का मार्ग प्रशस्त किया। ईनाडु के संस्थापक रामोजी राव ने 1983 में एन टी रामाराव की तेलगूदेशम पार्टी के विजय में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। इस समाचारपत्र ने अपने दायरे को और अधिक विस्तृत करते हुए अपना स्वयं का क्षेत्रिय टेलीविजन चैनल प्रारंभ किया और हैदराबाद से अंग्रेजी दैनिक न्यूजटाइम्स की प्रकाशन में सहायता की। कुछ अन्य भारतीय भाषाई समाचारपत्रों ने भी आर्थि विकास के विविध आयामों के सृजन, समाजिक जागरूकता एवं सांस्कृतिक नवोत्थान में महत्वपूर्ण एवं निर्णायक भूमिका का निर्वहन किया। यहां पर भारतीय भाषाई प्रेस के विकास पर एक संक्षिप्त चर्चा प्रस्तुत की गई है जिसके बारे में बीबीसी के प्रख्यात पत्रकार मार्क टुली ने अपनी पुस्तक राज टू राजीव में 1989 में लिखा कि एक तरफ जहां भारतीय प्रेस तीसरी दुनिया का सबसे अधिक स्वतंत्र एवं जीवंत प्रेस है। यह सरकार पर हमेशा ही पैनी नजर रखें रहती है जो लोकतंत्र के लिए अनिवार्य है और अगर भारत में लोकतंत्र को अस्तित्व में रहना है तो भी।
पिछले 15 वर्षों में भारत में अंग्रेजी एवं भाषाई समाचारपत्रों एवं पत्रिकाओं की बाढ़ सी आ गई है और पत्रकारिता बहुत अधिक सशक्त हुई है। देश के प्रत्येक भाग के लाखों लोगों तक पहुंचने के भाषाई प्रेस सबसे महत्वपूर्ण साधन है। यह जमीनी स्तर पर आम जनता योजनाकारों और प्रशासकों के बीच संबंध की एक महत्वपूर्ण कड़ी है और यह साक्षरता के प्रचार-प्रसार, सामाजिक जागरूकता एवं विकास का एक व्यवहारिक माध्यम है। यद्यपि यह बड़े ही स्पष्ट तौर पर कहा जा सकता है कि भाषाई प्रेस अपने अस्तित्व के संघर्ष में कभी-कभी सत्यता और उत्तरदायित्व, वस्तुनिष्ठता एवं निष्पक्षता जैसे पत्रकारिता के मूल्यों से विमुख हो जाता है। विकास और साक्षरता से जुड़ी हुई खबरें दूर-दूर तक उनके दिमाग में नहीं होती है। उनका मूल उद्देश्य अपनी बिक्री बढ़ाना होता है। इन समाचारपत्रों की सामग्री और प्रस्तुति में मनोरंजन, नकारात्मक समाचारों, हिंसा से परिपूर्ण खबरों, चोरी, राजनीतिक अस्थिरता और घोटाले को ज्यादा तरजीह दी जाती है। इसमें कोई शक नहीं कि इस प्रकार के समाचारों को भी बड़े स्तर पर प्रसारित किया जाना चाहिए परंतु मानव जीवन एवं समाज के सकारात्मक पहलुओं से संबंधित समाचारों का कवरेज भी जरूर होना चाहिए।
भाषाई प्रेस की समस्याएं:
भाषाई प्रेस को कुलिन वर्ग एवं सरकार द्वारा मात्र उपेक्षित ही नहीं किया गया बल्कि तिरस्कृत भी किया गया। ऐसा प्रतीत होता है कि भाषाई प्रेस को अंग्रेजी और राष्ट्रीय दैनिकों के साथ भारतीय प्रेस का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनने के लिए लगातार कई वर्षों तक सतत् संघर्ष करना पड़ा। भाषाई प्रेस की रिपोर्टिंग एवं कवरेज के दौरान कई ऐसी समस्याएं प्रकट होती है क्योंिक उनका मुख्य सरोकार स्थानीय होता है और कुछ हद तक क्षेत्रिय और राष्ट्रीय। ऐसे में छोटे लक्षित पाठक समूह, आर्थिक समस्याएं, सूचनाओं की उपलब्धता एवं उनकी प्रामाणिकता, संरचनात्मक सुविधाएं, जोखिम और भय वह भी खासतौर पर जाति, धर्म समुदाय एवं गुटबाजी के कारण इनको कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। भाषाई प्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती है, उन उच्च वर्गीय पाठकों को विकासात्मक मुद्दों के प्रति संवेदनशील बनाना जो भारतीय जनता को प्रभावित करते है। जिसका अधिकांश भाग अब भी गांवों में निवास करता है। विकासात्मक योजनाओं पर अपना ध्यान केन्द्रित कर के भाषाई प्रेस के द्वारा निरक्षरता, गरीबी और खराब स्वास्थ्य का संबंध आसानी से तोड़ा जा सकता है। स्वयंसेवी संगठनों को प्रोत्साहित कर के विकास एवं कल्याणकारी योजनाओं पर से प्रशासनिक बंधनों की गांठ को खोला जा सकता है। ऐसा देखा गया है कि भाषाई प्रेस में काम करने वाले पत्रकारों में इस बहुआयामी जिम्मेदारी को निभाने के लिए आवश्यक प्रशिक्षण का आभाव पाया जाता है।
ऐसे में अगर भाषा संस्थानों एवं कृषि संस्थानों के द्वारा इनके प्रशिक्षण के लिए प्रशिक्षण पाठ्यक्रम चलाएं जाएं तो भाषा संबंधी इन कमियों को आसानी से दूर किया जा सकता है। भाषाई प्रेस पोषण, स्वास्थ्य और स्वास्थ्य विज्ञान संबंधी शिक्षा, परिवार नियोजन, साक्षरता, उन्नत कृषि और अन्य विकास संबंधी योजनाओं के प्रसार का सबसे सशक्त एवं बेहतर माध्यम है। इस प्रकार यह अत्यंत ही महत्वपूर्ण है कि भाषाई प्रेस के अस्तित्व एवं विकास हेतु विविध उपाय किए जाने चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण है कि भाषाई प्रेस को भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल बनाया जाएं। वर्तमान में इसमें न तो भारतीय संस्कृति के विविध पहलुओं के दर्शन होते है और न ही ग्रामीण जनता और परित्यक्त जनों की आवाज को प्रतिनिधित्व मिल पाता है। आज ये वक्त की आवश्यकता है कि इसके द्वारा प्रकाशित सामग्रियों में एक शिल्पकार की जीवनी, एक किसान के सफलता की कहानी, अशिक्षित महिलाएं, साक्षरता से जुड़े कर्मियों, कृषि उत्पादों के विपणन में होने वाली समस्याओं, सामाजिक अंधविश्वासों और कुप्रथाओं, आर्थिक वृद्धि और उत्पदकता जैसे विषयों को शामिल किया जाना चाहिए। इस प्रकार का भाषाई प्रेस भारतीय जनता के वास्तविक जीवन आईना नहीं हो सकता और न ही उनका सही चित्रण कर सकता है। भाषाई प्रेस को समाज के विविध आयामों को स्थान देना चाहिए और योजनाकारों एवं नीति नियंताओं को साक्षरता एवं विकास के माध्यम से जनता के जीवन स्तर को सुधारने के लिए मार्ग सुझाना चाहिए। अब वक्त आ गया है कि जब भाषाई प्रेस को सूचना केन्द्र की भूमिका को ग्रहण करना चाहिए और सरकार की विभिन्न योजनाओं, नियमों, प्रोजेक्ट, मौसम पूर्वनुमान की रिपोर्ट और ऋण, साख, बीज, उवर्रक, नए विकास प्रोजेक्ट और सूदूर क्षेत्र में सड़क और पुल के निर्माण से संबंधित मसलों को स्थान देना चािहए।
विकास एवं साक्षरता के लिए भाषाई प्रेस को प्रोत्साहन:
कुछ महत्वपूर्ण नीतियां एवं उपचारात्मक उपाय निम्नांकित है जो भाषाई प्रेस के अस्तित्व एवं उत्थान में सहायक साबित हो सकते हैं-
ऽ स्थानीय समाचार पत्रों को सरकारी प्रेस में सरकारी दर पर मुद्रण की अनुमति प्रदान की जाएं।
ऽ बड़े समाचार पत्रों की ही तरह से भाषाई पत्रों के संपादको को निःशुल्क बस एवं रेलवे पास की सुविधा उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
ऽ भाषाई समाचार पत्रों के पत्रकारों को निःशुल्क बीमा एवं न्यायिक संरक्षण उपलब्ध कराया जाना चाहिए। उनके लिए उचित पुलिस संरक्षण की भी व्यवस्था की जानी चाहिए।
ऽ इन समाचार पत्रों को कागज का कोटा सरकार को रियायती दर पर उपलब्ध कराना चाहिए।
ऽ दूसरे अन्य कुटिर उद्योगों की ही तरह से इनको सरकार की विभिन्न योजनाओं के तहत ऋण उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
ऽ विभिन्न सरकारी विभागों, बैंको, सार्वजनिक क्षेत्र के निकायों के विज्ञापन डी. पी. आर. ओ. के माध्यम से दिए जाने चाहिए, जिसको समुचित ढ़ंग से एवं अनुपातिक तरीके से स्थानीय प्रेस के बीच वितरीत किया जाना चाहिए।
ऽ स्थानीय प्रशासन के द्वारा स्थानीय समाचार पत्रों को हतोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए बल्कि उनके कवरेज को समुचित महत्व दिया जाना चाहिए। उनको प्रोत्साहित करना और समय-समय पर वर्कशाॅप, कैंप आयोजित करने के लिए उन्हें सकारात्मक निर्देश देना चाहिए।
ऽ यह भाषाई प्रेस का प्रयास होना चाहिए कि वह भारतीय समाज व्यवस्था में अंतर्गत कार्यरत विभागों एवं संगठनों से स्वयं को जोड़ सके।
ऽ भाषाई प्रेस को स्थानीय निकायो जैसे ग्राम पंचायत, प्रखंड आदि से स्वयं को जोड़ना चाहिए और नजदीकी संबंध स्थापित करना चाहिए, साथ ही उसको ग्रामीण क्षेत्र के मत निर्माताओं से संबंध बनाना चाहिए जिससे भारतीय परिस्थितियों में विकास को प्रोत्साहित किया जा सके।
ऽ भारतीय भाषा प्रेस आयोग की स्थापना की जानी चाहिए जो भाषाई प्रेस की संपूण्र कार्यप्रणाली को देख और समझ सके तथा कुछ मूर्त संस्तुतियां प्रदान कर सके।
ऽ भाषाई प्रेस का लक्ष्य समुदाय की सेवा एवं उसका विकास होना चाहिए और इसे समकालिन समाज के वास्तविक जीवन का आईना बनना चाहिए। इसे सरकार और नीति नियंताओ के लिए जनता का फीडबैक प्राप्त करने का वास्तविक स्रोत बनना चाहिए लेकिन एक ही साथ अगर हम भाषाई प्रेस से इतनी अपेक्षाएं पालते है तो प्रेस की भी यह अपेक्षा होती है कि सरकार एवं जनता से उसको बृहत स्तर पर सहयोग मिलना चाहिए।
भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में महात्मा गाांधी के आगमन के बाद और उनके असहयोग आंदोलन को भी भाषाई प्रेस ने अपना नैतिक समर्थन प्रदान कर मजबूत बनाने का कार्य किया। अपनी पुस्तक जर्नलिज्म इन इंडिया में रंगास्वामी पार्थसारथी ने भाषाई पत्रकारिता के गौरवपूर्ण योगदान को रेखांकित करते हुए लिखा है कि बगैर किसी साधन के या कम साधनों में लगभग तीन दशकों तक विदेशी शासकों के प्रतिबंधों, प्रताड़ना और अत्याचारों के बीच उन्होंने अपने अस्तित्व को बचाएं रखा और बहुत सारे ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अपने न्यून जीवन एक ऐतिहासिक अध्याय को लिखा और नष्ट हो गए। जिन्होंने इन पत्रों को संचालित किया या इसके साथ जुड़े हुए थे, उन्होंने देशभक्ति, साहस और बलिदान की एक मिशाल कायम की। वे एक निश्चित कारण के लिए पूर्णतः समर्पित थे और कोई भी बाधा उन्हें इस मिशन को पूरा करने से नहीं रोक सकती थी। उन्हें हानि भी उठानी पड़ी और दरिद्रता में भी जीना पड़ा। कई को भयानक कैद से गुजरना पड़ा और इतनी कुर्बानी से जीती जंग के फायदे लेने के लिए आज वो हमारे साथ नहीं है परंतु उनकी आत्मा इसी लड़ाई के मैदान के आस-पास भटकती होगी जहां उन्होंने अपनी शहादत दी, हमे खुशी देने के लिए। स्वतंत्रता संग्राम में हिंदी और उर्दू पत्रकारिता का अवदान और जनता में राजनीतिक जागरूकता के प्रसार में उनकी भूमिका अविस्मरणीय है।
पूर्व और उत्तर-पूर्व के भाषाई प्रेस की एक अनुपम विशेषता थी कि ये त्योहारो और खासतौर पर दुर्गापूजा, रंगोली और बिहू के अवसर पर अपने विशेष अंक प्रकाशित करते थे। बंगाली, उड़िया और असमिया प्रेस की यह खास विशेषता थी। ये विशेष अंक बड़ी संख्या में निकाले जाते थे जिनमें लघु कथाएं, कविताएं, सृजनात्मक लेख और उपन्यास प्रकाशित होते है। ये समाचारपत्र पाठकों को उत्कृष्ट कोटि के साहित्यिक एवं सांस्कृतिक सौंदर्यबोध से रूबरू कराते और उनके विचारों को परिष्कृत करते थे। भाषाई प्रेस के उड़ीसा में अवदान की चर्चा करते हुए भट्ट ने लिखा कि उड़ीसा के विकास एवं खासतौर पर इसके सांस्कृतिक पुनर्निमाण में पत्रकारिता ने महती भूमिका निभाई। प्रेस ने साहित्य को कुलिन वर्गो से आम जन के बीच पहुंचाया और इसका परिणाम सभी के सामने स्पष्ट है कि उड़ीया साहित्य ने अपनी कविताओं एवं दूसरी साहित्यिक कृतियों के लिए प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त किया। उड़ीसा का प्रजामित्र समूह अपने अंग्रेजी साप्ताहिक दी ईस्टर्न टाइम्स और अपने मासिक झंकार में गुणवत्तापूर्ण साहित्यिक सामग्री प्रकाशित की एवं वह पुरस्कृत लेखकों को इसके लिए पुरस्कार प्रदान करती थी।
दक्षिण भारत का भाषाई प्रेस का इतिहास भी बहुत ही उज्जवल एवं आकर्षक रहा है। कुछ समाचारपत्रों और खासतौर पर आंध्रप्रदेश का ईनाडु तथा केरल में मलयाला मनोरमा ने विविधतापूर्ण पत्रकारिता की एक नई विधा का सूत्रपात किया। तेलगू दैनिक ईनाडु का प्रकाशन सन् 1974 में विशाखापट्टनम से प्रारंभ किया गया और बाद में हैदराबाद से तथा उसके बाद आंध्रप्रदेश के प्रत्येक जिले से इसके संस्करण प्रकाशित होने लगे। क्रमशः इसका प्रसार 4 लाख की सीमा को पार कर गया। जनता की सूचना प्राप्ति की बढ़ती मांग ने ईनाडु की सफलता का मार्ग प्रशस्त किया। ईनाडु के संस्थापक रामोजी राव ने 1983 में एन टी रामाराव की तेलगूदेशम पार्टी के विजय में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। इस समाचारपत्र ने अपने दायरे को और अधिक विस्तृत करते हुए अपना स्वयं का क्षेत्रिय टेलीविजन चैनल प्रारंभ किया और हैदराबाद से अंग्रेजी दैनिक न्यूजटाइम्स की प्रकाशन में सहायता की। कुछ अन्य भारतीय भाषाई समाचारपत्रों ने भी आर्थि विकास के विविध आयामों के सृजन, समाजिक जागरूकता एवं सांस्कृतिक नवोत्थान में महत्वपूर्ण एवं निर्णायक भूमिका का निर्वहन किया। यहां पर भारतीय भाषाई प्रेस के विकास पर एक संक्षिप्त चर्चा प्रस्तुत की गई है जिसके बारे में बीबीसी के प्रख्यात पत्रकार मार्क टुली ने अपनी पुस्तक राज टू राजीव में 1989 में लिखा कि एक तरफ जहां भारतीय प्रेस तीसरी दुनिया का सबसे अधिक स्वतंत्र एवं जीवंत प्रेस है। यह सरकार पर हमेशा ही पैनी नजर रखें रहती है जो लोकतंत्र के लिए अनिवार्य है और अगर भारत में लोकतंत्र को अस्तित्व में रहना है तो भी।
पिछले 15 वर्षों में भारत में अंग्रेजी एवं भाषाई समाचारपत्रों एवं पत्रिकाओं की बाढ़ सी आ गई है और पत्रकारिता बहुत अधिक सशक्त हुई है। देश के प्रत्येक भाग के लाखों लोगों तक पहुंचने के भाषाई प्रेस सबसे महत्वपूर्ण साधन है। यह जमीनी स्तर पर आम जनता योजनाकारों और प्रशासकों के बीच संबंध की एक महत्वपूर्ण कड़ी है और यह साक्षरता के प्रचार-प्रसार, सामाजिक जागरूकता एवं विकास का एक व्यवहारिक माध्यम है। यद्यपि यह बड़े ही स्पष्ट तौर पर कहा जा सकता है कि भाषाई प्रेस अपने अस्तित्व के संघर्ष में कभी-कभी सत्यता और उत्तरदायित्व, वस्तुनिष्ठता एवं निष्पक्षता जैसे पत्रकारिता के मूल्यों से विमुख हो जाता है। विकास और साक्षरता से जुड़ी हुई खबरें दूर-दूर तक उनके दिमाग में नहीं होती है। उनका मूल उद्देश्य अपनी बिक्री बढ़ाना होता है। इन समाचारपत्रों की सामग्री और प्रस्तुति में मनोरंजन, नकारात्मक समाचारों, हिंसा से परिपूर्ण खबरों, चोरी, राजनीतिक अस्थिरता और घोटाले को ज्यादा तरजीह दी जाती है। इसमें कोई शक नहीं कि इस प्रकार के समाचारों को भी बड़े स्तर पर प्रसारित किया जाना चाहिए परंतु मानव जीवन एवं समाज के सकारात्मक पहलुओं से संबंधित समाचारों का कवरेज भी जरूर होना चाहिए।
भाषाई प्रेस की समस्याएं:
भाषाई प्रेस को कुलिन वर्ग एवं सरकार द्वारा मात्र उपेक्षित ही नहीं किया गया बल्कि तिरस्कृत भी किया गया। ऐसा प्रतीत होता है कि भाषाई प्रेस को अंग्रेजी और राष्ट्रीय दैनिकों के साथ भारतीय प्रेस का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनने के लिए लगातार कई वर्षों तक सतत् संघर्ष करना पड़ा। भाषाई प्रेस की रिपोर्टिंग एवं कवरेज के दौरान कई ऐसी समस्याएं प्रकट होती है क्योंिक उनका मुख्य सरोकार स्थानीय होता है और कुछ हद तक क्षेत्रिय और राष्ट्रीय। ऐसे में छोटे लक्षित पाठक समूह, आर्थिक समस्याएं, सूचनाओं की उपलब्धता एवं उनकी प्रामाणिकता, संरचनात्मक सुविधाएं, जोखिम और भय वह भी खासतौर पर जाति, धर्म समुदाय एवं गुटबाजी के कारण इनको कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। भाषाई प्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती है, उन उच्च वर्गीय पाठकों को विकासात्मक मुद्दों के प्रति संवेदनशील बनाना जो भारतीय जनता को प्रभावित करते है। जिसका अधिकांश भाग अब भी गांवों में निवास करता है। विकासात्मक योजनाओं पर अपना ध्यान केन्द्रित कर के भाषाई प्रेस के द्वारा निरक्षरता, गरीबी और खराब स्वास्थ्य का संबंध आसानी से तोड़ा जा सकता है। स्वयंसेवी संगठनों को प्रोत्साहित कर के विकास एवं कल्याणकारी योजनाओं पर से प्रशासनिक बंधनों की गांठ को खोला जा सकता है। ऐसा देखा गया है कि भाषाई प्रेस में काम करने वाले पत्रकारों में इस बहुआयामी जिम्मेदारी को निभाने के लिए आवश्यक प्रशिक्षण का आभाव पाया जाता है।
ऐसे में अगर भाषा संस्थानों एवं कृषि संस्थानों के द्वारा इनके प्रशिक्षण के लिए प्रशिक्षण पाठ्यक्रम चलाएं जाएं तो भाषा संबंधी इन कमियों को आसानी से दूर किया जा सकता है। भाषाई प्रेस पोषण, स्वास्थ्य और स्वास्थ्य विज्ञान संबंधी शिक्षा, परिवार नियोजन, साक्षरता, उन्नत कृषि और अन्य विकास संबंधी योजनाओं के प्रसार का सबसे सशक्त एवं बेहतर माध्यम है। इस प्रकार यह अत्यंत ही महत्वपूर्ण है कि भाषाई प्रेस के अस्तित्व एवं विकास हेतु विविध उपाय किए जाने चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण है कि भाषाई प्रेस को भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल बनाया जाएं। वर्तमान में इसमें न तो भारतीय संस्कृति के विविध पहलुओं के दर्शन होते है और न ही ग्रामीण जनता और परित्यक्त जनों की आवाज को प्रतिनिधित्व मिल पाता है। आज ये वक्त की आवश्यकता है कि इसके द्वारा प्रकाशित सामग्रियों में एक शिल्पकार की जीवनी, एक किसान के सफलता की कहानी, अशिक्षित महिलाएं, साक्षरता से जुड़े कर्मियों, कृषि उत्पादों के विपणन में होने वाली समस्याओं, सामाजिक अंधविश्वासों और कुप्रथाओं, आर्थिक वृद्धि और उत्पदकता जैसे विषयों को शामिल किया जाना चाहिए। इस प्रकार का भाषाई प्रेस भारतीय जनता के वास्तविक जीवन आईना नहीं हो सकता और न ही उनका सही चित्रण कर सकता है। भाषाई प्रेस को समाज के विविध आयामों को स्थान देना चाहिए और योजनाकारों एवं नीति नियंताओं को साक्षरता एवं विकास के माध्यम से जनता के जीवन स्तर को सुधारने के लिए मार्ग सुझाना चाहिए। अब वक्त आ गया है कि जब भाषाई प्रेस को सूचना केन्द्र की भूमिका को ग्रहण करना चाहिए और सरकार की विभिन्न योजनाओं, नियमों, प्रोजेक्ट, मौसम पूर्वनुमान की रिपोर्ट और ऋण, साख, बीज, उवर्रक, नए विकास प्रोजेक्ट और सूदूर क्षेत्र में सड़क और पुल के निर्माण से संबंधित मसलों को स्थान देना चािहए।
विकास एवं साक्षरता के लिए भाषाई प्रेस को प्रोत्साहन:
कुछ महत्वपूर्ण नीतियां एवं उपचारात्मक उपाय निम्नांकित है जो भाषाई प्रेस के अस्तित्व एवं उत्थान में सहायक साबित हो सकते हैं-
ऽ स्थानीय समाचार पत्रों को सरकारी प्रेस में सरकारी दर पर मुद्रण की अनुमति प्रदान की जाएं।
ऽ बड़े समाचार पत्रों की ही तरह से भाषाई पत्रों के संपादको को निःशुल्क बस एवं रेलवे पास की सुविधा उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
ऽ भाषाई समाचार पत्रों के पत्रकारों को निःशुल्क बीमा एवं न्यायिक संरक्षण उपलब्ध कराया जाना चाहिए। उनके लिए उचित पुलिस संरक्षण की भी व्यवस्था की जानी चाहिए।
ऽ इन समाचार पत्रों को कागज का कोटा सरकार को रियायती दर पर उपलब्ध कराना चाहिए।
ऽ दूसरे अन्य कुटिर उद्योगों की ही तरह से इनको सरकार की विभिन्न योजनाओं के तहत ऋण उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
ऽ विभिन्न सरकारी विभागों, बैंको, सार्वजनिक क्षेत्र के निकायों के विज्ञापन डी. पी. आर. ओ. के माध्यम से दिए जाने चाहिए, जिसको समुचित ढ़ंग से एवं अनुपातिक तरीके से स्थानीय प्रेस के बीच वितरीत किया जाना चाहिए।ऽ स्थानीय प्रशासन के द्वारा स्थानीय समाचार पत्रों को हतोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए बल्कि उनके कवरेज को समुचित महत्व दिया जाना चाहिए। उनको प्रोत्साहित करना और समय-समय पर वर्कशाॅप, कैंप आयोजित करने के लिए उन्हें सकारात्मक निर्देश देना चाहिए।
ऽ यह भाषाई प्रेस का प्रयास होना चाहिए कि वह भारतीय समाज व्यवस्था में अंतर्गत कार्यरत विभागों एवं संगठनों से स्वयं को जोड़ सके।
ऽ भाषाई प्रेस को स्थानीय निकायो जैसे ग्राम पंचायत, प्रखंड आदि से स्वयं को जोड़ना चाहिए और नजदीकी संबंध स्थापित करना चाहिए, साथ ही उसको ग्रामीण क्षेत्र के मत निर्माताओं से संबंध बनाना चाहिए जिससे भारतीय परिस्थितियों में विकास को प्रोत्साहित किया जा सके।
ऽ भारतीय भाषा प्रेस आयोग की स्थापना की जानी चाहिए जो भाषाई प्रेस की संपूण्र कार्यप्रणाली को देख और समझ सके तथा कुछ मूर्त संस्तुतियां प्रदान कर सके।
ऽ भाषाई प्रेस का लक्ष्य समुदाय की सेवा एवं उसका विकास होना चाहिए और इसे समकालिन समाज के वास्तविक जीवन का आईना बनना चाहिए। इसे सरकार और नीति नियंताओ के लिए जनता का फीडबैक प्राप्त करने का वास्तविक स्रोत बनना चाहिए लेकिन एक ही साथ अगर हम भाषाई प्रेस से इतनी अपेक्षाएं पालते है तो प्रेस की भी यह अपेक्षा होती है कि सरकार एवं जनता से उसको बृहत स्तर पर सहयोग मिलना चाहिए।
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