भारतीय पत्रकारिता के उद्भव एवं विकास का इतिहास बहुत ही संर्घषपूर्ण एवं उज्जवल रहा है। भारत में पत्रकारिता, ब्रिटिष राज के लंबे समय से चले आ रहे दमनकारी नीतियों के खिलाफ संघर्ष का एक सह-उत्पाद थी। भारत में पत्रकारिता का उद्भव 1780 में जेम्स आगस्टस हिक्की द्वारा प्रारंभ बंगाल गजट के साथ हुआ। हालांकि जेम्स हिक्की को बाद में भारत छोड़कर वापस जाने के रूप में इसकी कीमत चुकानी पड़ी। बंगाल गजट या कलकत्ता जेनरल एडवरटाइजर को भारत के प्रथम समाचार पत्र होने को इस प्रकार गौरव प्राप्त हुआ। यहां से षुरू होकर भारतीय पत्रकारिता अपने अंतिम दौर यानि स्वतंत्रता संग्राम के दौर में पहुंची। जब भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान तमाम महत्वपूर्ण समाचारपत्रों के प्रेस की मषीने और उनके द्वारा जमा की गई सुरक्षा राषि ब्रिटानी सरकार द्वारा जब्त कर ली गई और उन खिलाफ बहुतेरे दमनकारी कानून लगाएं गए।
भारतीय पत्रकारिता कई महान्तम लोगों द्वारा उनके खून-पसीने से सिंची गई। इनमें से अधिकतर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, समाज सुधारक, बौद्धिक वर्ग और देष का विद्वत समुदाय के लोग थे। उन्होंने भारतीय पत्रकारिता के संरक्षण, संवर्धन एवं विकास के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के कुछ महानतम् प्रणेता जिनमें महात्मा गांधी, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, समाज सुधारक एवं उदारवादी नेता राजा राममोहन राय, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी और गोपाल कृष्ण गोखले आदि थे, ने या तो अपना स्वयं का अखबार प्रारंभ किया या फिर अग्रणी पंक्ति के संपादको में षुमार थे। इस कारण से यह माना जाता है कि भारतीय पत्रकारिता का गहरा संबंध राष्ट्रीय चेतना एवं स्वतंत्रता संग्राम के साथ है।
दूसरे षब्दों मे अगर कहें तो जहां एक ओर भारतीय प्रेस पत्रकारिता ने देष में राष्ट्रीय चेतना को जाग्रत करने में एवं स्वतंत्रता संग्राम को मजबूती प्रदान की वहीं स्वतंत्रता आंदोलन के द्वारा स्वयं भी सिंचित की गई।
भारतीय पत्रकारिता के प्रणेता:
भारत में वर्तमान पत्रकारिता, जिसका प्रारंभ अठारवीं सदी के उत्तरार्ध में हुआ था, ने प्रारंभ से ही सरकार का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया था। सर्वप्रथम कलकत्ता में समाचार-पत्र प्रारंभ करने का प्रयास विलियम बोल्ट नामक एक कंपनी कर्मचारी ने 1776 ई. में किया था। ईस्ट इंडिया कंपनी के अंतर्गत कर्मचारियों के निजी व्यापार पर रोक संबंधी कानून के बाद बोल्ट ने कंपनी की नौकरी से इस्तीफा दे दिया। उसने कंपनी के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करने और अपने हितों की रक्षा करने के लिए समाचार-पत्र प्रकाषन के अनछुएं क्षेत्र में प्रवेष करने का विचार किया। हालांकि कंपनी को उसकी योजना का पूर्व में ही पता लग गया था और समाचार-पत्र प्रारंभ करने के उसके प्रयास को कंपनी ने अस्वीकार कर दिया तथा उसको वापस यूरोप जाने का आदेष जारी किया गया। इस प्रकार भारत में प्रथम समाचार-पत्र के प्रारंभ का प्रयास बिना फलीभूत हुए ही समाप्त हो गया।
भारत में प्रेस का उद्भव:
जेम्स आगस्टस हिक्की ने बंगाल गजट या कलकत्ता जेनरल एडवरटाइजर के प्रारंभ के साथ ही भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में एक नए युग का सूत्रपात किया और 29 जनवरी 1780 को भारत से पहला समाचार-पत्र प्रकाषित हुआ। बंगाल गजट के प्रथम अंक में हिक्की ने अपना परिचय माननीय कंपनी के प्रथम एवं पूर्व मुद्रक के रूप में दिया, हालांकि यह प्रतीत होता है कि कंपनी में उसकी कोई खास अहमियत नहीं थी।
अपने इस साहसिक कार्य के बारे में उसने कहा कि मुझे समाचार-पत्र प्रकाषित करने का न तो कोई खास जूनून है और न ही कुछ नया करने की चाह। और न तो मैं इस कठिन काम की गुलामी भरी जिंदगी के लिए लालायित हूं। परंतु फिर भी आत्मा एवं अपने मष्तिष्क की स्वतंत्रता के लिए अपने षरीर को गुलाम बनाने में मुझे आनंद मिलता है। अखबार ने अपने परिचय एवं नीति को स्वयं ही स्पष्ट किया था-यह एक राजनीतिक एवं वाणिज्यिक समाचार पत्र है, जो सबके लिए खुला है परंतु किसी से प्रभावित नहीं है। यह 12 Û 8 आकार में प्रकाषित होता था जिसमें प्रत्येक तरफ तीन काॅलम होते थे। इसमे प्रकाषित सामग्रियों में अंग्रेजी समाचार-पत्रों से अंत......., मुफस्सिल और स्थानीय पाठकों के पत्र एवं भारत में रहने वाले योरोपियन समुदाय से जुड़े गाॅसिप तथा स्कैंडल प्रमुख होते थे। सभी सामग्रियां रूल्स एवं स्टारर्स से अलग-अलग बांटी गई होती थी। समाचार-पत्र के प्रत्येक में पठनीय सामग्रियों से ज्यादा विज्ञापन होते थे। समाचार भी ज्यादातर व्यक्तियों की निजी जिंदगी से जुड़े होते थे। अखबार में हिक्की स्वयं भी एक काॅलम लिखता था, जिसके माध्यम से वह अपने पाठकों के साथ प्रत्यक्ष संवाद किया करता था। जल्दी ही बंगाल गजट एक विटी और स्कूपलस अखबार में रूप में जाना जाने लगा और गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्ज तथा मुख्य न्यायाधीष सर एलिजा एम्पे या एक प्रकार से पूरे कंपनी प्रषासन की षत्रुता मोल ली। इस प्रकार से मात्र कुछ ही सप्ताहों में हिक्की गजट ने अच्छी-खासी लोकप्रियता अर्जित कर ली। हालांकि जिन व्यक्तियों की अखबार में पोल खोली जाती थी वह तो नाराज होते थे परंतु अन्य सभी लोग खुष होते थे। इसके पाठको में व्यापारी और गैर-षासकीय योरोपियन समुदाय के लोग ज्यादा थे। हिक्की गजट के कुछ प्रमुख नियमित काॅलम थे-पोएटर्स कार्नर, बाॅन-टाॅन और विमेन काॅलम जिसमें फैषन और नए तौर-तरीकों के बारे में ज्यादातर लिखा जाता था।
समाचार-पत्र में प्रकाषित समाचार कभी राजनीतिक, कभी व्यक्तिपरक तो कभी स्थानीय मौसम या फिर इंग्लैंड से आनेवाली किसी खूबसूरत महिला से संबंधित होते थे। साथ ही समाचार पत्र में ब्रिटिष संसद में होने वाले परिचर्चाओं का ब्यौरा और सेना की गतिविधियों एवं षासकों से संबंधित संपादकीय लेख तथा संपादक के नाम पत्र आदि भी जगह पाते थे। ऐसा प्रतीत होता है कि हिक्की को अपने पाठकों की अभिरूचि के बारे में स्पष्ट तौर पर पता था। उसके योरोपियन पाठकों को व्यक्तिगत जीवन से जुड़ी मषालेदार खबरें ज्यादा पसंद थी। ऐसे में हिक्की का मूल जोर ऐसी खबरें परोसना था। उसके अपने अनौपचारिक स्रोत थे जो इस प्रकार की खोजपरक रिपोर्टिंग किया करते थे।
उसी वर्ष में इंडियन गजट नामक अखबार का प्रारंभ हुआ जो हिक्की गजट का प्रतिस्पद्धी बना और इसके बाद जेम्स हिक्की के भाग्य के सितारे गर्दिश में जाने लगे। धीरे-धीरे बंगाल गजट अपनी लोकप्रियता एवं पाठक दोनों ही खोने लगा। हालांकि इंडियन गजट हिक्की गजट की अपेक्षा बहुत ही बेहतर समाचार-पत्र था। यह 16 इंच लंबा था और तीन काॅलम में बंटा था। संपूर्ण पृष्ठ अच्छी तरह से मुद्रित एवं सुसज्जित दिखता था। इस पत्र के प्रकाशक मेस्सिींक और रीड थे जिन्होने जेम्स हिक्की के अनुभवों का बखूबी फायदा उठाया। जब हिक्की को लगने लगा कि इंडियन गजट के कारण उसके पाठक उसका साथ छोड़ रहे है तब हिक्की ने इंडियन गजट के मालिकों पीटर रीड और नमक एजेंट बी. मेस्सिींक पर लगातार हमले करने लगा। साथ ही हिक्की ने रंगकर्मी जाॅन जेड. कियरनान्डर, जिसके बारे में हिक्की का मानना था कि वह उसके प्रेस टाइप इंडियन गजट को छिपाकर पहुंचाता है, पर भी जोरदार हमले शुरू कर दिए। हिक्की ड्रोन्ज़ के खिलाफ भी हो गया जो इंडियन गजट के प्रचार का काम देखता था। परंतु सबसे ज्यादा हिक्की तब कुपित हुआ जब कि कंपनी सरकार ने इंडियन गजट को मुफ्त डाक सेवा देना स्वीकार कर लिया और बंगाल गजट को सेवा प्रदान करने से इंकार कर दिया।
मुफ्त डाक सेवा के मुद्दे पर हिक्की ने गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्ज की पत्नी लेडी हेस्टिंग्ज की कथित भूमिका पर जोरदार हमले किए। हिक्की ने यह प्रचारित किया कि इस सेवा के लिए श्रीमती हेस्टिंग्ज ने वारेन हेस्टिंग्ज पर दबाव डाला है और पत्नी प्रेम में गवर्नर जनरल ने यहकार्य किया है। हिक्की के लेडी हेस्टिंग्ज पर इन हमलों ने गवर्नर जनरल को कुपित कर दिया और हिक्की ने कंपनी प्रशासन की बेवजह शत्रुता मोल ली। हालांकि इससे पूर्व हिक्की और वारेन हेस्टिंग्ज के बीच न मित्रता थी और न ही शत्रुता। जबकि हिक्की कंपनी अधिकारियों, कर्मचारियों, व्यापारियों एवं व्यवसायियों के बीच अलोकप्रिय बन गया था।
कलकत्ता के योरोपीय समुदाय के सामाजिक जीवन को हिक्की जिस प्रकार से प्रचारित करता था, वह कपटपूर्ण एवं परिहासपूर्ण था। विवाह समारोह और सगाई से जुड़े इस प्रकार के समाचारों का प्रयोग हिक्की अपने विरोधियों पर तीखे हमले करने के लिए करता था। इस प्रकार से अगर देखें तो हिक्की ने अपनी मिशनरी पत्रकारिता को पीत पत्रकारिता का रूप दे दिया था। हिक्की की कारगुजारियों से जून 1781 तक गवर्नर जनरल का सब्र भी जवाब दे चुका था। इसी बीच भारत के मुख्य न्यायाधीश सर एलिजा एम्पे ने 400 सैनिकों को हिक्की को पकड़ने और उसके प्रेस के टाइप को जब्त करने के लिए भेजा। हालांकि हिक्की ने किसी भी प्रकार से सैनिको को टाइप नहीं ले जाने दिया। हिक्की को अरेस्ट कर और 80 हजार के मुचलके पर उसको जमानत देने का फैसला किया गया। क्योंकि हिक्की ने जमानत की राशि जमा नहीं की ऐसे में उसे एक वर्ष के कारावास एवं 2 हजार रूपये जुर्माने की सजा सुनाई गई। हिक्की जेल से ही बंगाल गजट को प्रकाशित, संपादित करता रहा और लेख लगातार लिखता रहा क्योंकि उस समय ऐसा कोई कानून नहीं था। जिससे उसके लेखन एवं संपादन पर रोक लगाई जा सके। इस दौरान यद्यपि उसके कई लेख चैंकाने वाले और निन्दात्मक भी थे तथापि उसने कई गलत कार्यों के खुलासे भी किए। परंतु जेम्स आगस्टस हिक्की के बुरे दिन शुरू हो चुके थे और उसने कई दुश्मन इकठ्इे कर लिए थे।
मार्च 1782 में वारेन हेस्टिंग्ज ने चार महत्वपूर्ण कार्रवाईयो को अंजाम दिया और सबसे पहले हिक्की के प्रिंटिंग प्रेस को जब्त कर लिया गया। हिक्की के समस्त प्रयास एवं अनुरोध व्यर्थ गए। साथ ही हिक्की ने पूर्व में सरकार के जो मुद्रण कार्य किए था उसका बकाया पैसा भी सरकार ने देने से मना कर दिया। पहले तो कंपनी से पैसे देने में बहुत ही समय लगाया और जब पैसे दिए भी तो वह बहुत ही कम थे। इस प्रकार हिक्की घोर गरीबी के जाल में जकड़ गया। उसकी दयनीय दशा का विवरण उस पत्र से मिलता है जिसमें उसने गवर्नर जनरल से गुहार लगाते हुए अपनी दशा का वर्णन किया है। हिक्की लिखता है कि मैं और मेरे बच्चे किस विपत्ति में है, इसका एक विस्तृत विवरण पढ़ना आपके लिए बहुत ही कष्टकर होगा। आपके लिए यह जानना उपयुक्त होगा कि मेरे पास अब तक जो कुछ भी था, वह सब मैं या तो बेच चुका हूं या फिर गिरवी रख चुका हूं अपने उस परिवार के लिए जिसको मैं कभी खुशी दे ही नहीं सका। और हमें और भगवान को छोड़कर और कोई नहीं जान सकता कि हम किस प्रकार की विपत्ति से गुजर रहें है।
ऐसे में हिक्की के बारे में सच ही कहा जाता है कि वह दगाबाज था, वह रंगीन था, वह गैरजिम्मेदार था, वह किसी दबाव में आने वाला नहीं था, वह क्रोधी और अविवेकी था, वह नवोन्मेषी था, वह बहादुर था परंतु वह दुर्भाग्यशाली था। वह एक ऐसा योद्धा था जो पतन के गर्त में चला गया। पैसे में उसकी कोई रूचि नहीं थी। उसके अंदर अपने लेखन और कार्यों के परिणाम का सामना करने को साहस था। प्रेस की स्वतंत्रता का बचाव उसने जिस शब्दों के माध्यम से किया, वह एक योद्धा पत्रकार का घोषणापत्र था। जो आज के पत्रकारिता के लिए प्रेरक एवं मार्गदर्शक है। हिक्की का मानना था कि प्रेस की स्वतंत्रता अतिशय महत्वपूर्ण है अंग्रेजो के अस्तित्व एवं स्वतंत्र सरकार के लिए। जनता को पूर्ण स्वतंत्रता होनी चाहिए कि वह अपने नियमों एवं सिद्धांतों को निर्धारित कर सके और अपना मत व्यक्त कर सके।
वैसा प्रत्येक कृत्य जो इस स्वतंत्रता के मार्ग को अवरूद्ध करता है, वह निरंकुश एवं समाज के लिए खतरनाक है। भारतीय पत्रकारिता के एक अन्य युगपुरूष जेम्स सिल्क बकिंघम थे, उनका जन्म इंग्लैंड में 1786 ई. में हुआ था। बकिंघम पूरे कलकत्ता में सिद्धांत वाले व्यक्ति के रूप में ख्यातिप्राप्त थे। गवर्नर जनरल एवं बिशप भी उनको ऐसा मानते थे। पंडित जवाहर लाल नेहरू ने बकिंघम को भारत में प्रेस की स्वतंत्रता के प्रारंभिक हिमायती माना है, जिन्हें आज भी इस देश में सम्मान के साथ याद किया जाता है। वह सन् 1818 में कलकत्ता क्रानिकल के संपादक के रूप भारत आएं, जिसकी शुरूआत कलकत्ता के एक बड़े व्यापारी ने अपने विचारों के प्रचार-प्रसार एवं अपने व्यापारिक हितों के संरक्षण के लिए किया था। बकिंघम ने अखबार की कमान संभालते ही यह स्पष्ट कर दिया कि यह राजनीतिक, वाणिज्यिक और साहित्यिक समाचारों एवं विचारों का क्राॅनिकल होगा और कलकत्ता क्राॅनिकल पर एक योग्य संपादक की छाप स्पष्ट तौर पर दिखने लगी। उन्होंने आरोप-प्रत्यारोप, आक्षेप-प्रतिक्षेप, घोटाले, षड्यंत्र और छिछोरेपन भरे माहौल में स्वच्छ हवा का मानो प्रवेश करा दिया। बकिंघम ने समस्त अरब देशों की यात्राएं की। वह एक उच्चकोटि के विद्वान और अध्ययनशील प्रवृति के व्यक्ति थे जिनकी मानवशास्त्र एवं साहित्य के साथ-साथ विज्ञान और खासतौर पर वाष्पशक्ति आधारित परिवहन, अश्व विहीन परिवहन और त्वरित परिवहन के लिए हवा भरे बैलून जैसे विषयों में खासी दिलचस्पी थी। वे अपने आस-पास के माहौल के रीति-रिवाजों, प्रथाओं एवं लोगों की आदतो का गहराई से सूक्ष्म अवलोकन करते थे। उन्होंने अपने पाठकों के बीच बाॅयरन और वाल्टर स्काॅट तथा वाशिंगटन इरविन के विचारों को प्रस्तुत किया और लोकप्रिय बनाया। उनके द्वारा अक्टूबर 1818 में कलकत्ता जर्नल की शुरूआत की गई जो आठ पन्नों का द्वि-साप्ताहिक समाचार-पत्र था। इस अखबार के संपादक के कार्यों को आलोचक बताया गया जिसका मानना था कि संपादक का कार्य है कि गवर्नर को उसकी कमियों के बारे में तत्परता से बताया जाएं और वैसे सत्य को भी उजागर किया जाएं जिससे सब सहमत नहीं हो।
कुल मिलाकर संपादक एक वाॅच डाॅग की भूमिका में होगा जो सरकार एवं व्यवस्था को गलत करने से रोके। इस अखबार को काॅरेस्पाॅन्डेंस काॅलम प्रत्येक उस व्यक्ति के लिए खुला था जो अपनी बात पत्र के माध्यम से रखना चाहता था। इस ने कलकत्ता की पत्रकारिता में एक नवीन मापदंड का सृजन किया। इस पत्र में स्थानीय रिपोर्ट के साथ संवाददाताओं के पत्र भी होते थे। इन पत्रों में हिक्की के दौर के कलकत्ता के समाज में आएं बदलावों का खुलासा होता था। उसकी आलोचनाएं प्रायः निर्देशात्मक होती थी और इस दृष्टि से वह हिक्की के एकदम उलट था। बकिंघम के समाचार-पत्र की मूलतः अभिरूचि बंगाल सरकार के कानूनो एवं नीतियों, डाक सेवा, पुलिस, सेना से जुड़े मसलों एवंज न सरोकार से जुड़े विभिन्न मुद्दों के प्रति सरकार के दृष्टिकोण में थी। बकिंघम ने उस समय वर्तमान भयानक कुप्रथा सती प्रथा की जमकर आलोचना की और इस पर नियंत्रण में सरकार की नाकामी की भत्र्सना की। बकिंघम का मुख्य जोर स्थानीय परिस्थितियों से जुड़े समाचारों के कवरेज पर था न कि फैशन जैसे विषयों पर। बंगाली और फारसी जर्नलों में प्रकाशित समाचारों एवं विचारों को वह महत्ता देता था और अपने पत्र में उनके सारांश भी प्रकाशित करता था। वह भाषाई प्रेस का समर्थक और मित्र था और उसने भाषाई प्रेस के अस्तित्व के अधिकार का समर्थन किया साथ ही भारतीय जनमानस के मत और आवाज को भी बुलंद करने का कार्य किया। इस प्रकार से यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि बकिंघम भारतीय पत्रकारिता के विकास के लिए एक प्रेरणास्रोत की तरह से था। उसको सत्य में भारतीय पत्रकारिता का जनक कहा जा सकता है ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार से एलेन ओक्टेवियन ह्यूम को भारतीय राष्ट्रवाद का जनक कहा जाता है। जिन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की थी। भारत में बकिंघम के आगमन के साथ ही प्रेस में जन सरोकार से जुड़े हुए प्रश्नों पर वास्तविक बहस और विमर्श की शुरूआत हुई। भारतीय पत्रकारिता में एक छोटी अवधि में ही सही बकिंघम ने एक नई शुरूआत की नींव रखी।
वह प्रशासकों एवं अधिकारियों के सार्वजनिक आचरण पर, राज्य की कार्यकारिणी इकाइयों पर और शिक्षित जनमत पर विशेष ध्यान देता था। बकिंघम का यह दृढ़ मत था कि सुचारू रूप से व्यवस्थित कार्य करने वाला प्रेस अज्ञानता के निवारण एवं ज्ञान के प्रसार के लिए अनिवार्य आवश्यकता है। उसने लिखा कि अगर ज्ञान एक वरदान है और अज्ञानता एक अभिशाप, एक सुव्यवस्थित प्रेस जहां अज्ञानता को मिटाता है वही ज्ञान को बढ़ावा देता है। ठीक उसी प्रकार से जिस तरह स्कूल और दूसरी सामाजिक संस्थाएं समान उद्देश्यों की पूर्ति करती है। चूंकि यह सभी एक ही वृक्ष की विभिन्न शाखाएं है। यद्यपि प्रेस का प्रभाव अन्य संस्थाओं की अपेक्षा ज्यादा विस्तृत और सार्वभौमिक हो सकता है चाहें दोनों को एक समान व्यवस्थित क्यों न किया जाएं। प्रेस अन्य से ज्यादा प्रभावशाली औजार साबित हो सकता है। हालांकि दोनो का एक साथ सम्मिलन किसी भी राष्ट्र के लिए बहुत ही लाभकर हो सकता है।
वह प्रेस की स्वतंत्रता का प्रबल समर्थक था और उसको कुछ मायनों में क्रांतिकारी भी माना जा सकता है। वह लिखता है कि अगर किसी निरंकुश सत्ता या शक्ति, जो समस्त शक्तियों को संचालित करती है, से उसकी सम्मिश्रित बुराईयों को नियंत्रित करने की ऐसी कोई भी संभावित दवा नहीं है जिसकी तुलना एक स्वतंत्र प्रेस से की जा सके। बकिंघम के नेतृत्व में कलकत्ता जर्नल को एक सम्मानित समाचार पत्र का स्थान, मात्र उत्कृष्ट सामग्री ही नहीं बल्कि बेहतर प्रस्तुति के लिए भी प्राप्त हो सका। समाचार पत्र की व्यवसायिक सफलता उसका स्वयं का अपनी इमारत खड़ी हो सकी और एक बेहतर गुणवत्ता की प्रेस इंगलैंड से आयात की जा सकी। सन् 1822 में कलकत्ता जर्नल का बाजार मूल्य 40 हजार पौंड था जिसमें तीन-चैथाई हिस्सा संपादक का और एक-चैथाई हिस्सा इसके शेयर धारकों का था। सिल्क बकिंघम की अपनी सलाना आय लगभग 8 हजार पौंड थी। बकिंघम ने अपने समाचार पत्र का संचालन बिना किसी गंभीर समस्या के सफलतापूर्वक किया।
जहां उसे एक ओर कलकत्ता के सभी व्यापारिक समुदायों का संरक्षण प्राप्त था वहीं दूसरी ओर हिन्दू बौद्धिक वर्ग का समर्थन भी प्राप्त था। साथ ही उसने गवर्नर जनरल लार्ड हेस्टिंग्ज के साथ भी समन्वय स्थापित कर रखा था। ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों के साथ बकिंघम के प्रथम विवाद की शुरूआत तब हुई जब उसने 20 वीं रेजिमेंट के कर्नल रूबिसन के दमन की आलोचना की। इसके बाद इस प्रकाशन पर सवाल उठाएं गए और अभियोजन चलाएं गए। हालांकि इस मामले में बकिंघम के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई लेकिन कर्नल रूबिसन को 24 घंटे के अंदर भारत छोड़ने का हुक्म दिया गया क्योंकि ऐसी मान्यता बनी की सभी समस्याओं की जड़ में कर्नल है। हेस्टिंग्ज ने उदारवादी नीति का अनुसरण किया और उसने बकिंघम के निर्वासन के मार्ग को हमेशा अवरूद्ध किया। या एक प्रकार से कहा जाएं तो बकिंघम को संरक्षण प्रदान किया। जाॅन एडम ने बकिंघम के लेख खिलाफ आपराधिक मानहानि का मुकदमा दायर किया, जिसमें उसने लिखा था कि उन समस्याओं पर कभी ध्या नही नहीं दिया जाता है जिनको सरकार के समक्ष प्रेस के माध्यम से उठाया जाता है जबकि उनको जिनको सचिवों एवं अधिकारियों का वरदहस्त प्राप्त है, को ही मात्र औषधि मिलती है। हालांकि इस मामले में बकिंघम बरी तो हो गया परंतु इसके बदले उसके 600 रूपये खर्च हुए। एडम के बकिंघम के खिलाफ अभियान के बावजूद भी हेस्टिंग्ज ने अपने उदारवादी रवैये को नहीं छोड़ा। जब बकिंघम ने डाॅ. जेमसन की भारतीयों के लिए स्थापित मेडिकल स्कूल के अधीक्षक पद पर नियुक्ति की आलोचना की, जो कि पूर्व से ही अन्य तीन पदों पर कार्य कर रहे थे। डाॅ. जेमसन बहुत ही नाराज हुआ और एडम चाहता था कि बकिंघम को निर्वासित कर दिया जाएं। बकिंघम का अपराध बस इतना ही था कि वह उन मुद्दों के बहुत ही करीब था जो प्रशासन को जड़ों को छूती थी। कंपनी के आधिकारिक कदाचार से संबंधित उसके लगातार खुलासे और इसके बाद हुई हानि का हर्जाना भरकर माफी प्राप्त करने में सफलता ने ईस्ट इंडिया कंपनी और इसकी साख को खतरे में डाल दिया।
बकिंघम द्वारा स्थापित किए गए साहस के उदाहरण ने एक परंपरा स्थापित की और इसका बार-बार सामना सरकार की दमन और उदारवाद की नीति से हुआ। जो दोयम व्यवहार पूरे ब्रिटिश शासन के दौरान लगातार चलता रहा। इंगलैंड में बकिंघम ने ओरिएंटन हेराल्ड की शुरूआत की जिसमें वह लगातार भारत के प्रशासन की कलई खोलता रहा। उसने हर्जाने के लिए हाउस आॅफ कामन्स में मुकदमा भी दायर किया। बकिंघम ने भारत में निर्वाचित विधायिका की भी वकालत की जिसमें समान संख्या में भारतीय और अंग्रेज हो। साथ ही उसने भारतीय नागरिक सेवा में मनोनयन के बजाएं खुली प्रतियोगिता की भी वकालत की। वह प्रखर प्रभुत्ववादी और दृढ़ था, वह साहसी था और उसकी सोच उसके दौर से बहुत आगे की थी। भारतीय पत्रकारिता में बकिंघम के महत्वपूर्ण योगदान को निम्न बिंदुओं के माध्यम से अभिव्यक्त किया जा सकता है- उसने समाचार-पत्र को जनता का आईना बनाया। उसने जांच-परख और स्वस्थ आलोचना की शुरूआत की और उसने प्रेस की नेतृत्व की गुणवत्ता बतायी। उसको निर्वासित कर के प्रशासन ने दूसरों के लिए भी चेतावनी दी थी परंतु वह उस चिंगारी को धधकने से रोक नहीं सकी जो बकिंघम ने सुलगाई थी। वह उन पत्रकारों में से एक था जो जन्म से ही पत्रकार होते है न कि बनाएं जाते है।
राजा राममोहन राय, जिन्हें पंडित जवाहर लाल नेहरू ने भारतीय पत्रकारिता का जनक माना है, एक बहुभाषाविद्, विद्वान-राजनीतिज्ञ, सामाजिक सुधारक और उदारवादी विचारक थे। वह प्रेस की स्वतंत्रता के घोर समर्थक थे। राजनीतिक-धार्मिक और सामजिक सुधार के मिशन में अपने उदारवादी विचारों के प्रचार-प्रसार के माध्यम के रूप में उन्होंने मुद्रित माध्यमो की शक्ति एवं महत्व को पहचाना। एक सामाजिक सुधारक के रूप में उन्होंने सती प्रथा की कुरीति के खिलाफ अभियान छेड़ा और कानून के माध्यम से इसको समाप्त करने के लार्ड विलियम बेंटिक के प्रयासों को प्रोत्साहित किया।
उन्होंने अपनी सशक्त लेखनी का प्रयोग हिंदू समाज में व्याप्त सामाजिक कुरीतियों, यथा जाति प्रथा, मूर्ति पूजा, पशु बलि आदि के उन्मूलन के लिए किया। राय ने अंग्रेजी में ब्रह्मानिकल मैगजीन 1821 ई., बंगाली में संवाद कौमुदी 1821 ई., और फारसी में मिरात उल अखबार को प्रकाशन किया। ब्रह्मानिकल मैगजीन कुछ अंको के प्रकाशन के बाद ही बंद हो गया। संवाद कौमुदी राजनीतिक, साहित्यिक, धार्मिक और सामाजिक मुद्दों से जुड़ा एक साप्ताहिक समाचार पत्र था।
यह पत्र उदारवादी विचारधारा का समर्थक था और कानून के शासन तथा नागरिक स्वतंत्रता का कट्टर समर्थक था। इसने नस्लीय भेदभाव और अंग्रेजों के अहंकारपूर्ण व्यवहार का ख्ुालकर विरोध किया। अखबार का यह विचार था कि शिक्षा समाजिक बेहतरी और जागरूकता के लिए होनी चाहिए और इसके लिए इसने पश्चिमी चिकित्सा विज्ञान, तकनीक एवं नारी शिक्षा के प्रसार का समर्थन किया। संवाद कौमुदी जनवरी 1830 में द्वि-साप्ताहिक समाचार पत्र के रूप में प्रकाशित होने लगा और 33 वर्षों तक प्रकाशित होता रहा।
राजा राममोहन राय ने फारसी में मिरात उल अखबार का प्रकाषन आरंभ किया। इसका उद्देष्य था कि जनता के सामने ऐसे विद्वतापूर्ण लेख प्रस्तुत करना जो उनके ज्ञान एवं अनुभव में वृद्धि कर सके और उनका सामाजिक उत्थान कर सके। यद्यपि राय ने मिरात उल अखबार का प्रकाषन 1823 के अध्यादेष और कलकत्ता जर्नल के संपादक बकिंघम के साथ हुए अन्याय के खिलाफ अपना विरोध दर्ज करने के लिए बंद कर दिया। यहां यह याद करना प्रासंगिक होगा जो प्रेस की स्वतंत्रता के बारे में कहा गया है। किसी भी षासक को अपने बड़े साम्राज्य को व्यवस्थित करने की महानतम जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक होना चाहिए और इसके लिए उसे हमेषा ही उत्सुक होना चाहिए कि जिस कार्य में उसके हस्तक्षेप की आवष्यकता हो, वह करने को सदैव ही तत्पर हो। इस महानतम लक्ष्य को हासिल करने के लिए स्वतंत्र प्रकाषन बहुत ही प्रभावषाली माध्यम है जिसका प्रयोग करना चाहिए।
उन्होंने गवर्नर जनरल जाॅन एडम के 1823 के प्रेस अध्यादेष का भी मजबूती के साथ विरोध किया। इस अध्यादेष के अनुसार किसी भी समाचार पत्र के प्रकाषन से पूर्व गवर्नर जनरल से लायसेंस प्राप्त करना अनिवार्य कर दिया गया। अध्यदेष का पूरे बंगाल में जोर-षोर से विरोध हुआ। राममोहन राय ने इस अध्यादेष के खिलाफ पिटिषन दिया जिस पर द्वारिकानाथ टैगोर समेत उस समय के राजनीतिक रूप से जागरूक नेताओं के हस्ताक्षर थे। राय द्वारा तैयार किया गया यह मसौदा एक यादगार दस्तावेज है, जिसे भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज कहा जा सकता है। बंगाल भारत में पत्रकारिता और भाषाई पत्रकारिता दोनों की ही जन्मस्थली रहा है। किसी भारतीय भाषा में प्रकाषित पहला पाक्षिक दिग्दर्षन था, जो बंगाली में छपता था। इसका मासिक अंक सर्वप्रथम अप्रैल 1818 ई. में निकला। इसने विभिन्न विषयों जैसे, राजनीति, इतिहास, विज्ञान, व्यापार और अर्थषास्त्र से संबंधित आलेख प्रकाषित किए। साप्ताहिक समाचार दर्पण जो बंगाली में प्रकाषित होता था और बाद में बंाग्ला और अंग्रेजी दोनो भाषाओं में प्रकाषित होने लगा, 1818 में षुरू होकर 1890 तक प्रकाषित होता रहा।
हालांकि ये दोनो ही समाचारपत्र कलकत्ता की बैपटिस्ट मिषनरी ने प्रकाषित किए, जिनका उद्देष्य मिषनरी द्वारा धार्मिक प्रचार-प्रसार करना था। इसने नारी शिक्षा की पुरजोर वकालत की और काफी लोकप्रियता हासिल की। धीरे-धीरे कई समाचारपत्र बंबई, कलकत्ता और मद्रास से प्रकाशित होने प्रारंभ हुए। इस दौरान बंबई एक महत्वपूर्ण वाणिज्यिक केन्द्र बनकर उभरा जहां विदेशी और तटीय जहाज विभिन्न वस्तुओं का परिवहन करते थे। बंबई के भारतीय व्यापारी ज्यादातर गुजरात के थे जो विभिन्न वस्तुओं के मूल्य और जहाजों के बारे में जानने को बहुत ही उत्सुक रहते थे। उनकी जरूरतों को देखते हुए कई अंग्रेजी समाचारप़त्रों ने 1797 से गुजराती में विज्ञापन प्रकाशित करने प्रारंभ कर दिए।
सन् 1822 ई. में मर्जबान ने गुजराती साप्ताहिक बांबे समाचार का प्रकाशन प्रारंभ किया जिसमें वाणिज्यिक एवं व्यापारिक गतिविधि से संबंधित समाचारों को जगह दी जाती थी। इसको किसी भारतीय भाषा का सबसे पुराना अखबार माना जाता है जो अब तक प्रकाशित हो रहा है। इस प्रकार भारतीय पत्रकारिता के उद्भव की अवधि 19 वीं सदी के दूसरे और तीसरे दशक को माना जा सकता है। ये भाषाई पत्र बंगाली और गुजराती भाषा में शुरू किए गए। हालांकि जहां एक ओर राजा राममोहन राय का लक्ष्य जनता को हिंदू धर्मा के बारे में शिक्षित करना, सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ लोगों को जागरूक बनाना और सामाजिक सुधारों का प्रचार-प्रसार करना था वहीं मर्जबान का उद्देश्य व्यापारिक हितों के लिए कार्य करना था। इस प्रकार कहा जा सकता है कि भारत में भाषाई प्रेस के उद्भव एवं विकास के पीछे सामाजिक सुधार और व्यापारिक हितों को सहायता पहुंचाना था।
दमनकारी नीतियों के खिलाफ संघर्ष:
उन्नीसवीं सदी के प्रारंभिक दशक में भारतीय प्रेस हमेशा ही सरकार के दमनकारी अध्यादेशों के खिलाफ संघर्ष करता हुआ प्रतीत होता है जो प्रेस की स्वतंत्रता को बाधित करते थे। सर्वप्रथम प्रेस की स्वतंत्रता पर खतरा तब दिखने लगा जब लार्ड वेलेजली ने 13 मई 1799 को कलकत्ता से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्रों के लिए गाइडलाइन जारी किया, जिसके अनुसार प्रत्येक मुद्रक को अपना नाम समाचारपत्र के नीचे लिखना अनिवार्य कर दिया गया और समाचारपत्रों पर पूर्व सेंसरशिप लगा दिया गया। इस कानून के उल्लंघन पर तात्कालिक निवर्सन का दण्ड निर्धारित किया गया। इस सेंसर के द्वारा पब्लिक क्रेडिट से जुड़े विषयों के प्रकाशन पर प्रतिबंध लगा दिया गया। प्रेस के उपर एक विस्तृत अध्यादेश 1823 में कार्यकारी गवर्नर जनरल जाॅन एडम द्वारा लगाएं गए, जिसके तहत लगाएं गए प्रतिबंध बहुत अधिक कठोर थे।
इन अध्यादेशों ने किसी भी मुद्रण और प्रकाशन से पूर्व लायसेंस प्राप्त करना अनिवार्य बना दिया। एडम ने प्रेस की स्वतंत्रता को ब्रिटिश शासन के लिए एक भयानक खतरा माना। इस अध्यादेश के अनुसार सरकार किसी भी प्रिंटिंग प्रेस से लायसेंस वापस ले सकती थी और बिना लायसेंस के प्रिंंिटंग प्रेस को जब्त या बंद कर सकती थी। यह अध्यादेश और खास तौर पर प्रकाशन पूर्व लायसेंस के नियम की बहुत ही भत्र्सना हुई परंतु यह तब तक जारी रहा जब तक चाल्र्स मेटकाफ ने प्रेस कानूनों को पुनः संशोधित नहीं किया। इन प्रतिबंधों के बावजूद भी भारत में प्रेस फलता-फूलता रहा लेकिन सच्चाई यह थी कि किसी प्रकार की पत्रकारी स्वतंत्रता नहीं थी। सरकारी कर्मचारियों पर प्रेस से किसी प्रकार का संबंध रखने पर प्रतिबंध था। भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में चाल्र्स मेटकाफ का नाम बड़े ही सम्मान के साथ लिया जाता है क्योकि वह एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने उस प्रभुत्ववादी और निरंकुशता के युग में प्रेस के महत्व को समझा था। उनका मानना था कि प्रतिबंध विहीन प्रेस मात्र सूचनाओं को संप्रेषित करने का ही कार्य नहीं करती सरकार की स्वस्थ आलोचना के माध्यम से मार्गदर्शन भी करती है।
मेटकाॅफ एक राजनीतिज्ञ नहीं था और वह ईस्ट ंइडिया कंपनी का एक नियमित कर्मचारी था। वह मात्र 19 वर्ष की आयु में जनरल लेक के साथ मराठा अभियान के समय में भारत आया था। विभिन्न पदों पर उत्कृष्टता के साथ कार्य करते हुए सन् 1827 में वह गवर्नर जनरल की काउंसिल का सदस्य बना और उसने कुछ समय के लिए गवर्नर जनरल के रूप में भी कार्य किया। यह आसानी से कहा जा सकता है कि उसने ही भारत में प्रेस को स्वतंत्र बनाया और अंग्रेजी को आधिकारिक भाषा बनाया। उसने प्रेस की स्वतंत्र बनाने के लिए अभूतपूर्व प्रयास किए और प्रेस की स्वतंत्रता के लार्ड विलियम बेंटिक के विचारों को अमली जामा पहनाया।
गवर्नर जनरल लार्ड बेंटिक ने भी न केवल प्रेस के प्रति सहिष्षणुता की नीति अपनायी बल्कि सक्रिय रूप से सहयोग भी किया। जब 1835 ई. में भारतीय और यूरोपीय प्रेस के नेताओं ने प्रेस पर से प्रतिबंध हटाने के लिए बेंटिक को अनुरोध पत्र दिया, तो उन्होंने यह आश्वासन दिया कि जल्दी ही ऐसी व्यवस्था की जाऐगी, जिसके तहत प्रत्येक उस व्यक्ति को सुरक्षा मिलेगी जो स्वच्छ लोक विमर्श में शामिल होगा। बेंटिक ने कहा कि सरकार की ऐसी कोई मंशा नहीं है कि वह उनकी स्वतंत्रता पर अंकुश लगाएं। उसके बाद ही जब मेटकाॅफ एक छोटे समय के लिए गवर्नर जनरल बना तो इसी ज्ञापन के आधार पर उसने प्रेस कानून को संशोधित किया। मेटकाॅफ द्वारा प्रेस कानूनों में संशोधन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू था कि उसने एडम अध्यादेश 1823 के प्रकाशन पूर्व लायसेंस को समाप्त कर दिया और इसके बदले निबंधन कराना अनिवार्य बना दिया। जिसके तहत प्रत्येक व्यक्ति बगैर पूर्व अनुमति के प्रकाशन के लिए स्वतंत्र था लेकिन उसे दंडित किया जाएगा अगर वह बगावती या मिथ्या आरोप वाले प्रकाशन करता है।
मेटकाॅफ ऐसा एकमात्र अंग्रेज था जिसने गवर्नर जनरल के रूप में प्रेस पर लगाएं गए समस्यत प्रतिबंधात्मक अध्यादेशों, यथा 1823, 1825 और 1827 को समाप्त कर दिया। उसके इस महान्तम कार्य के लिए उसको भारतीय प्रेस के विमोचक की उपाधि से विभूषित किया जाता है। मेटकाॅफ ने प्रेस कानूनों को संशोधित करने का प्रश्न, जिसमें लायसेंस के बदले निबंधन को लागू करना था, लाॅ काउंसलर जाॅन मैकाले के पास अग्रेसित कर दिया। मैकाले ने कंपनी राज्य की संपूर्ण सीमा में एकीकृत कानून की वकालत की जिसके तहत पत्रकार बिना किसी पूर्व आज्ञा के कुछ भी प्रकाशित करने के लिए स्वतंत्र थे लेकिन उनको किसी भी उपद्रव फैलाने वाले और मानहानिपरक सामग्री के प्रकाशन पर दंडित किया जाएगा। इससे संबंधित कानून मेटकाॅफ ने लागू करके भारतीय पत्रकारिता के स्वयं के प्रति कृतज्ञ बनाया।
मेटकाॅफ का कहना था कि-
1. कानून की पुस्तकों में ऐसे कठोर कानूनों की कोई उपयोगिता नहीं है जिनका आज तक कभी प्रयोग ही नहीं किया गया।
2. उन्होंने अज्ञानता के स्थायीकरण की अपेक्षा ज्ञान के प्रसरण को प्रोत्साहित किया। उनका कहना था कि चाहें हम कुछ भी क्यों न करें ज्ञान के प्रसार को नहीं रोक सकते। इसलिए यह हमारा दायित्व है कि हम इसको प्रोत्साहित करें, चाहें परिणाम जो भी हो।
3. उसने भारतीय भाषाई प्रेस पर विशेष निगरानी के अपने सहयोगियों की सलाह को खारिज कर दिया और कहा कि अंग्रेजी और भारतीय समाचारपत्रों के बीच किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए।
4. उसकी यह दृढ़ मान्यता थी कि कोई भी शासन जो जनमत को दबाने के प्रयास में लगा रहता । कभी भी चिरस्थायी नहीं हो सकता। क्योंकि ऐसा शासन दूषित और सड़ा हुआ होता है और ऐसे प्रयास हमेशा ही असफल साबित होते है।
5. उन्होंने कहा कि प्रेस को सर्वथा स्वतंत्र होना चाहिए और इससे भारतीय साम्राज्य के स्थायित्व को कोई खतरा नहीं होगा।
6. मेटकाॅफ ने हमेशा ही प्रेस के स्वतंत्रता की वकालत की क्योंिक उसका मानना था कि इसके फायदे हमेशा ही नुकसान से ज्यादा होते है।
7. उसने यह भी कहा कि प्रेस की स्वतंत्रता को भी नागरिकों की अन्य स्वतंत्रताओं की तरह स्थगित किया जा सकता है जब प्रेस की सुरक्षा के लिए इस प्रकार का बलिदान आवश्यक हो। परिणामस्वरूप नहीं परंतु मैं स्वीकार करता हूं कि वर्तमान उदाहरण को एक अपवाद माना जाना चाहिए, न कि सरकार का रोजाना का कार्य-व्यवहार।
8. अगर राज्य पर कोई आपदा आती हो तो मेटकाॅफ ने प्रेस स्वतंत्रता पर नियंत्रण का समर्थन किया है। मैं सोचता हूं कि विचार और मतों के प्रकाशन को दबाने से बेहतर है कि वाल्व को खुला रखा जाएं, जिससे बुरी अफवाहें बाहर निकल सकें।
9. मनुष्य को सोचने और महसूस करने से रोकना असंभव है और मेरा मानना है कि उनके तात्कालिक क्रोध को बाहर निकलने देना चाहिए, अखबारों में छपे गुमनाम पत्र के रूप में, जिसके लेखक गुमनाम ही रहना चाहते है। अगर उनके क्रोध को उनके सीने में नरम होने के लिए दबाया जाता है तो वही क्रोध स्थायी बन जाता है। जो कभी भी फटने के लिए तैयार रहता है। जो सरकार अपनी खुशी से दखल देती है वह उस सभी के लिए जिम्मेदार होती है, जिसके प्रकाशन की अनुमति देती है।
10. उन्होंने कहा कि यह बेहतर है कि सेंसरशिप या किसी निश्चित नियम का धीरे-धीरे प्रयोग किया जाएं और सरकार की मनमानी इच्छा का यदा-कदा हस्तक्षेप हो।
प्रेस पर प्रतिबंधों को हल्का करने बाले कानून की घोषणा कर, जो 1856 ई. तक लागू रहा, मेटकाॅफ ने इंगलैंड में बोर्ड आॅफ डायरेक्टर्स की नाराजगी मोल ली। जिन्होंने उस पर पुराने निर्देशों के खिलाफ कार्य करने के लिए आरोपित किया। परंतु मेटकाॅफ थोड़ा भी नरम नहीं हुआ और उसने स्थायी गवर्नर जनरल बनने का मौका खो दिया। उसको पदावनत करके पहले उत्तर-पश्चिम प्रोविंस और फिर मद्रास का गवर्नर बनाया गया। उसने अपने करियर का बलिदान दे दिया परंतु भारतीय पत्रकारिता को लंबी और गौरवपूर्ण यात्रा के लिए तैयार कर दिया।
उसने प्रेस के लिए पांच अधिनियम बनाएं जो निम्नांकित हैं-
1. उसने कहा कि मुद्रक और प्रकाशक को घोषणा करनी चाहिए अपने नाम, निवास स्थान और प्रेस के स्थान की।
2. अगर नाम या फिर पता में कोई परिवर्तन होता है तो पुनः एक घोषणापत्र भरा जाना चाहिए।
3. घोषणापत्र नहीं भरने पर 5 हजार रूपये का जुर्माना तथा दो साल कैद की सजा का प्रावधान किया गया।
4. कोई भी एक साधारण घोषणापत्र के माध्यम से अपने प्रेस को बंद कर सकता है।
5. जहां तक कंपनी के कर्मचारियों या अधिकारियों पर प्रेस से संबंध का प्रश्न था मेटकाॅफ ने इसको केवल कमिशन प्राप्त कर्मियों तक ही सीमित कर दिया। भारत सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया था कि यह प्रतिबंध मात्र कंपनी के अनुबंधित एवं कमिशन प्राप्त कर्मियों पर ही लागू होगा जिनको कोर्ट आॅफ डायरेक्टर्स की बगैर सहमति के नहीं हटाया जा सकता है।
कोर्ट आॅफ डायरेक्टर्स मेटकाॅफ से नाराज था क्योंकि उसने उनकी बिना सहमति के पुराने कानून के बदले नए प्रेस कानून को लागू कर दिया था। हम यह मानने को मजबूर है कि यह कार्य बहुत अधिक अन्यायपूर्ण हैं और इसे एक अस्थायी सरकार द्वारा अधिरोपित किया गया है और वह भी उस समय में जब तीन प्रेसिडेन्सी के लिए कानून बनाने के लिए एक कमिशन की स्थापना की जा चुकी है, जो अपनी महत्वपूर्ण सुनवाई प्रारंभ ही करने जा रही है। कोर्ट आॅफ डायरेक्टर्स मेटकाॅफ को यह भी याद दिलाना नहीं भूला कि उसका यह कार्य न तो कभी भूला जा सकता है और न ही माफ किया जा सकता है।
प्रेस को पूर्व के तमाम प्रतिबंधों से आजाद करने के परिणामस्वरूप प्रसार में बहुत तेजी के साथ वृद्धि हुई और भारतीय तथा अंग्रेजी भाषा के समाचारपत्रों की संख्या, जो 1824 में 11 थी, 1830 के अंत तक 68 और 1856 ई. तक बढ़कर 104 हो गई।
इस तरह से, चाल्र्स मेटकाॅफ प्रेस की स्वतंत्रता का सबसे बड़ा हिमायती बन गया और उसने अपने पूर्व के प्रेस स्वतंत्रता के सभी हिमायतियों जैसे राजा राममोहन राय और सिल्क बकिंघम को पीछे छोड़ दिया। उसने कभी भी अपने कल्याण की फिक्र नहीं की बल्कि भारतय प्रेस को पूर्व के शासकों द्वारा आरोपित कठोर प्रतिबंधों की जंजीर से मुक्त करने का कार्य किया। एक ब्रिटिश गवर्नर जनरल के रूप में चाल्र्स मेटकाॅफ ने, भारतीय प्रेस की संरचना में आमूल-चूल परिवर्तन को दिशा देने में निर्णायक एवं अग्रणी भूमिका निभाई।
सन् 1857 ई. में भारतीय स्वतंत्रता के प्रथम संग्राम के दौर में गवर्नर जनरल लार्ड कैनिंग ने 1857 का अधिनियम लागू किया जिसको गलाघोंटू कानून भी कहा जाता है। इस कानून के द्वारा 1823 के एडम अधिनियम को फिर से लागू कर दिया गया और इसके तहत प्रिंंिटग प्रेस को कार्य करने लिए या फिर समाचारपत्र या पुस्तक प्रकाशित करने के लिए लायसेंस प्राप्त करना अनिवार्य बना दिया गया। सरकार को यह शक्ति मिल गई कि वह किसी भी समाचारपत्र, पुस्तक या प्रकाशित सामग्री के प्रसार एवं प्रकाशन पर प्रतिबंध लगा सकती थी। यह कानून अंग्रेजी और भाषाई प्रेस दोनों पर ही समान रूप से लागू किया गया। कानून लगभग एक वर्ष तक लागू रहा। इसके तहत कई समाचार पत्रों पर मुकदमा चलाया गया और उनको दंडित किया गया। यद्यपि यह गलाघोटू कानून भारतीय प्रेस को और अधिक नुकसान पहुंचाता, यह कानून स्वतः समाप्त हो गया और भारतीय प्रशासन 1 नवंबर 1858 को रानी विक्टोरिया के हाथों मे चला गया। इस प्रकार, सन् 1776 ई. से लेकर, जब कलकत्ता में पहली बार विलियम बोल्ट द्वारा समाचारपत्र प्रारंभ करने का प्रयास किया गया।
सन् 1857 तक, जब महान् स्वतंत्रता सेनानी अजीमुल्ला खान ने पयाम-ए-आजादी की शुरूआत की, जिसने मजबूती के साथ और प्रखरता से ब्रिटिश शासन के खिलाफ लिखा। साथ ही इसने राष्ट्रीय आंदोलन को दिशा प्रदान की। ब्रिटिश सरकार के पास इसकी आवाज को बंद करने के असफल प्रयास के आलावा कोई और चारा भी नहीं था। प्रथम स्वाधीनता संग्राम की असफलता ने भारत पर ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के अध्याय का पटाक्षेप कर दिया और ब्रिटिश क्राउन ने इस वादें के साथ भारत के शासन के बागडोर संभाली कि वह धार्मिक सहिष्णुता और प्रेस के स्वतंत्रता को संरक्षण एवं बढ़ावा देंगे। भारत में राजनीतिक पत्रकारिता का प्रारंभ 1861 ई. से माना जा सकता है, जब इंडियन काउंसिल ऐक्ट ने सरकार को यह अधिकार प्रदान किया कि वह विधायिका में प्रख्यात भारतीयों को मनोनित कर सकती है। कई महानतम् भारतीय समाचारपत्र जो आज तक अस्तित्व में हैं, इसी अवधि के दौरान शुरू किए गए थे। सन् 1861 में दी टाइम्स आॅफ इंडिया और 1861 में ही दी पायोनियर, सन् 1875 में दी स्टेट्समैन और सन् 1878 में दी हिन्दू की स्थापना हुई।
इस अवधि के दौरान भाषाई पत्रकारिता ने भी तेजी के साथ उड़ान भरी। प्रत्येक प्रमुख भारतीय भाषा में किसी न किसी समाचारपत्र का प्रारंभ हुआ। लगभग इसी दौरान सरकार ने सन् 1878 में वर्नाकुलर प्रेस कानून की घोषणा प्रेस को नियंत्रित करने के लिए की। इस कानून के अनुसार, भारतीय भाषाई समाचारपत्रों के मुद्रक एवं प्रकाशकों को एक बांड भरना अनिवार्य था कि वे ऐसी कोई भी सामग्री प्रकाशित नहीं करेंगे जो सरकार के खिलाफ असंतोष की भावना को उकसावा या बढ़ावा देता हो। कानून के तहत, जिला मजिस्ट्रेट या पुलिस कमिशनर किसी भी समाचारपत्र के प्रकाशक या मुद्रक को ऐसी किसी सामग्री के प्रकाशन के लिए रोक सकता था। वह मुद्रक या प्रकाशक से सुरक्षा राशि की मांग कर सकता था और ऐसे किसी भी मुद्रित सामग्री को जब्त कर सकता था जो आपत्तिजनक प्रतीत होती हो। सन् 1878 को वर्नाकुलर प्रेस एक्ट प्रेस की स्वतंत्रता के लिए सबसे बड़ा खतरा था और भाषाई समाचारपत्रों को इसके कारण तमाम परेशानियों का सामना करना पड़ा।
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