Saturday, 23 March 2019

एन. राम का वैचारिक खोखलापन



यह पत्रकारिता के सिद्धांतों पर आघात है। पत्रकार सूचनायें एकत्रित जरूर करता है परंतु फाइलें चोरी नहीं कराता और सूत्र के गोपनीयता की आड़ में राजनीतिक एजेंडा सेट नहीं करता। एन. राम का यह कार्य निंदा के योग्य है। एक सच, एन राम ने कहा था बोफोर्स के वक्त और उस दौर में विश्वनाथ प्रताप से इनकी मित्रता थी और कम्यूनिस्ट लाॅबी के यह पसंदीदा थे। न्यायालय में बोफोर्स की दलाली और राजीव गांधी की भूमिका कभी साबित नहीं हुई परंतु एन राम ने उनके राजनीतिक भविष्य को दागदार बना दिया और एक बार फिर राम मैदान में हैं राफेल को फेल करने के लिए और मोदी जी के राजनीतिक भविष्य का खात्मा करने को। इनका कम्यूनिस्ट एजेंडा सभी जानते हैं। द हिन्दू विश्वसनीय अखबार है परंतु एन राम वही सच बोलते हैं जो उनके एजेंडे के तहत होता है। वो अपनी और हिन्दू की विश्वसनीयता का नाजायज फायदा सरकार बनाने और बिगाड़ने में बखूबी करना जानते हैं।
द हिन्दू भारत में बड़े ही सम्मान के साथ पढ़ा जाता है और देष के विष्वसनीय अखबारों में षुमार है। उसी तरह इसके मालिक एवं संपादक एन. राम जी की भी अपनी विष्वसनीयता है। यह वही एन. राम है जिन्होंने भारत की सबसे बड़ी रक्षा दलाली यानि बोफोर्स का षिगूफा छोड़ा था। बोफोर्स कांड को इस तरह से एक्सपोज किया की राजीव गांधी जैसे षख्स को सत्ता से बेदखल होना पड़ा। बोफोर्स कांड को उजागर करते हुए तब भी महानतम एन. राम जी ने कहा था कि उनके पास और हिन्दू कार्यालय में इसको लेकर पुख्ता प्रमाण हैं परंतु मुझ जैसे अल्प बुद्धि को आजतक यह नहीं समझ में आया कि वो प्रमाण एन. राम जी कभी न्यायालय को उपलब्ध नहीं करा सके। अब ऐसा ही एक महान् धमाका उन्होंने राफेल लेकर को लेकर किया और एक लंबा-चैड़ा लेख लिख डाला और इस बार भी सारे प्रमाण उनके पास है। चाहे वो क्राॅनि कैपिटलिज्म के हो या भी प्राइस हाइक के या फिर दसां कंपनी के या फिर अनौपचारिक फेवर या दलाली के। हालांकि ये भी सच है कि एन राम एक सम्माननीय पत्रकार है परंतु यह भी झूठ नहीं कि उनका लगाव साम्यवाद से है। ये वही कम्यूनिज्म है जो भारत कि स्वतंत्रता के वक्त अंग्रेजों के साथ था क्योंकि इसकी नीतियां रूस के हिसाब से तय होती थी और अब चीन के हिसाब से तय होती हैं। राजीव गांधी भी इंदिरा जी की हत्या के कारण उत्पन्न हालात में प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आएं थे परंतु एन राम की बेबाक लेखनी ने राजीव गांधी को जमीन पर ला दिया। परंतु अगर 20 वर्षों के बाद बोफोर्स कांड का हश्र देखें, इसकी कानूनी बारीकियों को समझे और इसको लेकर माननीय न्यायालय के निर्णय को देखें तो बोफोर्स कांड एक प्लांन्टेड रक्षा दलाली के कांड से ज्यादा कुछ नहीं साबित हो सका। क्योंकि इस मामले में किसी को अभी तक सजा नहीं मिली न ही इस मामला न्यायालय में पूर्णरूपेन प्रमाणित हो सका। दलाली को लेकर संदेह है परंतु इस तरह की दलाली जिसको फेवर कहते हैं को प्रमाणित नहीं किया जा सकता। हालांकि इस मामले के कारण कई राजनीतिक व्यक्तित्व अर्ष से फर्ष और फर्ष से अर्ष तक पहुंच गए। विष्वनाथ प्रताप सिंह देष के प्रधानमंत्री बन गए और भारत में पहली बार अस्थिर संघीय षासन की षुरूआत हुई। जब रूस विष्वयुद्ध में मित्र देषों के साथ था तो भारतीय कम्यूनिस्ट भी भारत को भूलकर मित्रता निभाने में मषगूल थे। ऐसे कम्यूनिज्म मित्रता के लिए कुछ भी कर सकता है जैसा विष्वनाथ प्रताप से अपनी मित्रता के लिए बोफोर्स का खुलासा किया तो इस बार राफेल पे कलम चली। यह है पत्रकारिता में अपनी पूर्वस्थापित साख के बदौलत सत्ता बनाने और बिगाड़ने का खेल और राम साहब इसके पुराने और परखे हुए खिलाड़ी हैं। पर यह देष उनसे पूछना चाहता है कि 
1. जब आपने बोफोर्स के वक्त कहा था कि ऐसी दलाली आजतक नहीं हुई, यह देषहित के साथ खिलवाड़ है और इसके सारे सबूत आपके पास हैं तो आजतक वो सबूत न्यायालय तक क्यों नहीं पहुंचे? 
2. प्राइस हाइक, दलाली, क्राॅनि कैपिटलिज्म, आॅफसेट डील, दसां के साथ डील को लेकर नियमों को लचीला बनाना जैसे तमाम सबूत जब आपके पास हैं ही तो एक जिम्मेदार नागरिक की तरह से आप न्यायालय में सरकार के विरूद्ध कब जायेंगे? या फिर न्यायालय को सभी सबूत जो आपके पास बोफोर्स की ही तरह उपलब्ध है कब भेजेंगे। या मात्र अपने कलम की ताकत से वर्तमान सरकार को बदनाम कर एक बार फिर देष को अस्थिर सरकार देने का महान् कार्य ही करेंगे।