Monday, 9 January 2017

मुझे शौक नहीं कि तू सराहे मेरे गजल के तरन्नुम को ये इक दिल की दास्तां हें यूं ही निकल जाने दे बस तेरी वजह से ही तो ये सब, अब मुमकिन हुआ है न जगा मुझको अभी, दिन में ख्वाब सजाने दे बस मुझे कोई शौक नहीं सनम कि हरदम जीतूं हीं मैं किसी दिन मुझको खुद से ही तू हार जाने दे बस आजकल ऐसे भी मेरे जीतने का चल रहा मौसम है जरा इस बार भी मुझे दिल से आजमाने दे बस मुझे शौक नहीं कि तू सराहे मेरे गजल के तरन्नुम को ये इक दिल की दास्तां हें यूं ही निकल जाने दे बस

No comments:

Post a Comment