मुझे शौक नहीं कि तू सराहे मेरे गजल के तरन्नुम को
ये इक दिल की दास्तां हें यूं ही निकल जाने दे बस
तेरी वजह से ही तो ये सब, अब मुमकिन हुआ है
न जगा मुझको अभी, दिन में ख्वाब सजाने दे बस
मुझे कोई शौक नहीं सनम कि हरदम जीतूं हीं मैं
किसी दिन मुझको खुद से ही तू हार जाने दे बस
आजकल ऐसे भी मेरे जीतने का चल रहा मौसम है
जरा इस बार भी मुझे दिल से आजमाने दे बस
मुझे शौक नहीं कि तू सराहे मेरे गजल के तरन्नुम को
ये इक दिल की दास्तां हें यूं ही निकल जाने दे बस
No comments:
Post a Comment